भारत में वायु प्रदूषण से 12 लाख लोगों की मौत

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Apr 30 2019 03:26 pm
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( रिपोर्ट - प्रदीप श्रीवास्तव ) दिल्ली। पर्यावरण परिवर्तन, तीव्र गति से होता शहरीकरण, बढ़ता प्रदूषण और उपेक्षित सरकारी व सामाजिक गतिविधियों के कारण विगत दशकों में सांस संबंधी बीमारियां के मरीजों की संख्या में कई गुने की वृद्धि हुई है। कुछ सालों से गैर संक्रामक रोग महामारी की तरह फैल रहे हैं। सबसे ज्यादा असर वायु प्रदूषण पर पड़ा है। दिन प्रतिदिन जहरीली होती हवा और शहरों का गैस चैम्बर में तब्दील होना सांस से जुड़े मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि कर रहा है। हालत यह है कि अस्थमा, सांस संबंधी बीमारियां और सीओपीडी आदि के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। हर वर्ष वायु प्रदूषण से देश में 35 लाख लोगों की जान जाती है, जबकि एचआईवी, टीबी, और मलेरिया से मरने वालों की तुलना में यह संख्या तीन गुना है। बावजूद इसके, सरकारें वायु प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। 

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019 के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण के कारण 2017 में 12 लाख लोगों की मौत हुई। इस वैश्विक शोध की मानें तो वर्तमान में वायु प्रदूषण के उच्च स्तर के कारण दक्षिण एशिया में बच्चों की औसत जीवन प्रत्याशा में ढाई साल की कमी आएगी, जबकि वैश्विक जीवन प्रत्याशा में 20 महीने की कमी आएगी। रिपोर्ट बताती है कि भारत ने प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, भारत चरण-4 स्वच्छ वाहन मानक और नए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम जैसे बड़े कदम उठाए हैं, जो काफी फायदे मंद हैं। लेकिन, लोगों के बीच में जागरूकता के अभाव के कारण छोटी छोटी वायु प्रदूषण संबंधी बदलाव काफी धीरे हो रहे हैं। जिस कारण से वायु प्रदूषण के खिलाफ एक उचित माहौल तैयार नहीं हो पा रहा है। भारत में वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य संबंधी सभी खतरों से होने वाली मौतों में तीसरा सबसे बड़ा कारण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण से जितने लोगों की मौत होती है, उसकी आधी संख्या भारत और चीन में है। भारत और चीन में 2017 में वायु प्रदूषण से 12 - 12 लाख लोगों की मौत हुई। 

इसी तरह की एक रिपोर्ट यह बताती है कि भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली करीब दो - तिहाई मौतें डीजल वाहनों के निकलने वाली धुएं होती हैं। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (आईसीसीटी), जार्ज वाशिंगटन यूनीवर्सिटी और कोलोरैडो यूनीवर्सिटी के शोधार्थियों ने इस सिलसिले में 2010 से 2015 तक वैश्विक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अध्ययन किया। और पाया कि वर्ष 2015 में वैश्विक स्तर पर लगभग 3,85,000 मौतों की वजह वायु प्रदूषण है। यह अध्ययन वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय स्वास्थ्य प्रभावों की सर्वाधिक विस्तृत तस्वीर मुहैया कराती है। इस अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से हर साल करीब 42 लाख मौतें होती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह घरों में प्रयुक्त होने वाले चूल्हा और ईंधनों से निकलने वाले धुएं हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया की 91 प्रतिशत आबादी उन जगहों पर रहती है, जहां हवा की गुणवत्ता डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश सीमा से अधिक है।  


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