लोकसभा चुनाव निपटते ही - वो कहावत सही हो रही मतलब निकल गया पहचानते नहीं

By: jhansitimes.com
May 10 2019 11:48 am
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चुनाव में याद आती है मतदाताओं की। जैसे ही चुनाव व्यतीत होते हैं, और प्रत्याशी हो जाते है रफूचक्कर। जीते तो मिलेंगें, हारे तो नहीं मिलेेंंगे। इस शैली पर पूरे पांच साल बीत जाते है और मतदाता जहां खड़ा रहता है वहीं फिर मिलता है। अगर जनप्रतिनिधि अपनी शैली में बदलाव लायें और नि:स्वार्थ भाव से लोगो की समस्याओं में हाथ बंटायें तो शायद उन्हें कभी अपनी जीत के लिए वोट नहीं मांगना पड़ेगा और जनता स्वयं ऐसे व्यक्ति के लिए खुद प्रचार के लिए आगे बढ़ेंगीं, परंतु ऐसा हो नहीं रहा है। स्वार्थ और धन कमाने की राजनीति में जनता जनार्दन अब महत्व नहीं रखतीं है।

लोकसभा चुनाव चुनाव के 5 चरण पूर्ण होते ही प्रत्याशी एवं उनके समर्थक ऐसे रफूचक्कर हुए कि मानों उन्हें लू लग गई हो और वों ठंडक के लिए अज्ञातवास में चलें गए होंं। प्रत्याशियों के कार्योलयो में शटर डले हुए है। एक भी कार्यकर्ता बैठा नहीं दिखता है इससे यह बात साफ हो गई कि कितनी नीरसता प्रत्याशियों में है। तीन प्रत्याशी मैदान में है, कोई एक जीतेंगा लेकिन 23 मई तक तो सभी अपनी जीत को पक्का बता सकतें है और बताना भी चाहिए, परंतु जो राजनीतिक माहौल परिवर्तित हुआ है। उससे जहां कांग्रेस के वोट में इजाफा हुआ है वहीं गठबंधन भाजपा प्रत्याशी के बीच कांटे की लड़ाई  है। संभवत: भाजपा और गठबंधन की लड़ाई इस लोकसभा चुनाव 2019 में होती हुई नजर आ रहीं है। प्रत्याशी अगर जीत में अपनी पीठ थपथपाता है तो वह उसकी सिर्फ एक नादानी है। जनता जनार्दन जिसे प्रत्याशी चुनने का अधिकार है वों एक-एक पहलू पर विचार करतीं है और फिर अपना निर्णय सुनातीं है। उसका निर्णय सर्वोच्च माना जाता है। लगभग 58 प्रतिशत मतदान होने से यह बात साफ हो गई कि इतना प्रचार-प्रसार करने के बाबजूद मतदाताओं में जागरूकता नहीं आई है। जागरूकता इसलिए भी और नहीं आ रहीं है कि मतदाताओं को यह लगने लगा है कि किसी को भी बनाओ वो विकास की बातें नहीं करता है। धनबल का जमाना आ गया है, मतदाताओं के वोट लो, पांच साल तक दिल्ली में मौज करों, पार्टी फिर टिकट देे दें फिर जनता के हाथ-पैर छुओं और जनता खुश हो जाये तो फिर 5  साल के सांसद बन जाओं। विकास के मुददों से हटकर यह चुनाव जातिगत आधार पर हुआ है। 

अल्पसंख्यक से लेकर दलित, सामान्य, पिछडा आदि जो भी जातियां है वों एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में कहीं पीछे नहीं रहीं। चुनाव में जो कुछ प्रचार के दौरान नहीं होना चाहिए वह भी देखने को मिला। चूंकि प्रशासन की सख्त व्यवस्था के कारण कहीं कोई अशांति नहीं फैल पाई परंतु बातों के तरकश इतने जहरीलें छूते जो दिलों को पूरे चुनाव में चुभते रहें। चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया है कोई जीतें और कोई हारें परंतु मतदाताओं के बीच कभी मतभेद नहीं करना चाहिए। जनता विकास चाहतीं है अगर वों नहीं किया जाता है तो निश्चित रूप से जनप्रतिनिधि को वोट मांगने का कोई अधिकार नहीं है। पांच साल में करोडो की निधि जनता के लिए मिलतीं है जिसका सदप्रयोग होना चाहिए परंतु दुरूप्रयोग होता है। निश्चित रूप से यह चुनाव त्रिकोणीय मुकाबलें में फंसा हुआ था परंतु जो थोडा बहुत रूझान लोगो से मिल रहा है उसको देखकर यह बात साफ हो गई कि हाथी और कमल में टकराव की स्थिति है। वोटों का अंतर भी ज्यादा नहीं है, जो लाखों की जीत हुआ करतीं थी इस बार वों हजारो में सिमटकर रह जायेंगी। चुनाव परिणाम 23 मई को उजागर होंगें। इसके बाद साफ हो जायेगा कि किसके भाग्य में दिल्ली की रास्ता लिखा हुआ है।


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