विधानसभा चुनावों में नोटबंदी पर होगा जनमत संग्रह, बता रहे हैं... प्रधान संपादक,के.पी सिंह

By: jhansitimes.com
Jan 08 2017 10:38 am
268

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे और अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समापन भाषण से यह जाहिर हो गया कि 5 राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भाजपा की कोशिश नोटबंदी को केंद्रबिंदु में लाने की है। भाजपा  पूरे चुनावी महासमर को नोटबंदी पर जनमत संग्रह के रूप में तब्दील करने पर आमादा है और इस मामले में उसकी रणनीति पहले से ही कामयाब नजर आ रही है। इसलिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री से लेकर अन्य केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के नेताओं ने नोटबंदी को क्रांतिकारी कदम के रूप में साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

 

नोटबंदी का कदम उठाने का सुझाव किसका था, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है, लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे नाटकीय कदमों के पीछे अंततोगत्वा यह जाहिर हुआ कि यह मार्केटिंग की आकर्षक पेशबंदी के टोटके के बतौर की गई प्रस्तुतियां थीं। इनमें राजनीतिक फैसले की गम्भीरता के अऩुरूप गहराई और दूरगामी परिणामों की परवाह नहीं की गई थी। मीडिया के बाजार प्रेरित होने के बाद हेडिंग और फोटो कैप्शन को लेकर एक टर्म प्रचलित हुआ है जिसका नाम है कैचवर्ड। यह एक ऐसी टेक्टिस है जिससे किसी न्यूज के प्रति पाठक या दर्शक को ज्यादा से ज्यादा संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। मीडिया जनसंचार की विधा है और इस तरह की कामयाबी इस विधा को ऊपरी तौर पर सार्थक बनाती है लेकिन बात इतनी आसान नहीं है। कैचवर्ड यानी जुमलेबाजी का खोखलापन जल्द ही उजागर भी हो जाता है इसलिए मीडिया के सामाजिक हस्तक्षेप को लेकर जो स्थिति सामने आ रही है उसका निष्कर्ष यह है कि नई टेक्टिस से कौतूहल और मनोरंजन के स्तर पर लोगों का उद्दीपन कर उन्हें कैश कराने में तो कामयाबी मिल रही है लेकिन साथ-साथ इसके चलते लोगों ने मीडिया को गम्भीरता से लेना बंद कर दिया है। इसलिए चेतना के निर्माण के मामले में मीडिया की शक्ति का बहुत हद तक क्षरण हो चुका है।

 

मोदी सरकार को संचालित करने वाली ताकतें मार्केटिंग से मुख्य रूप से सम्बंधित हैं इसलिए यह सरकार मार्केटिंग के नुस्खों और फार्मूलों के अनुरूप ही काम करती है। कई बार इसके चलते सरकार के सामने पछतावे की स्थिति भी पैदा हो जाती है। सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में आज भी लोग तमाम संदेहों से उबर नहीं पाये हैं लेकिन सेना को आगे करके विरोधियों से लेकर आम लोगों तक की बोलती बंद कर दी गई। नतीजतन अपने संशयों पर लोगों को जबरन विराम लगाना पड़ा। इसके बाद विमुद्रीकरण की सरकार की नाटकीय प्रस्तुति सामने आई। इसका उद्देश्य क्या था, सरकार ने लगातार इस मामले में अपना रुख बदला। मोटे तौर पर यह हुआ कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने सबसे ज्यादा दम विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने का भरा था जिसकी वजह से इस मामले में उसकी उपलब्धि कितनी रही, यह सवाल उससे आये दिन हो रहे थे। नोटबंदी ने ऐसा झंझावत पैदा किया कि लोग विदेशों में जमा काले धन की बात ही भूल गए। मुद्दे से भटकाने का जो कौशल भाजपा और मोदी सरकार ने इस संदर्भ में प्रदर्शित किया है वह वास्तव में नायाब है।

 

नोटबंदी से कोई बड़ा आदमी न तो कर चोरी या काला धन को लेकर जेल पहुंचा और न ही कोई बड़ा आदमी अपना दिवाला पिटवाकर सड़कों पर आया। कुछ छुटभैये पकड़े गये लेकिन चंद लोग तो सामान्य प्रक्रिया में भी पकड़े जाते रहे थे। हर्षद मेहता और तेलगी जैसी बड़ी मछलियां भी पकड़ी गयीं लेकिन तब तो नोटबंदी कोई कारक नहीं था। इसके बावजूद लोगों को यह विश्वास बना रहा और अभी भी बना हुआ है कि नोटबंदी बेईमानी करने वालों के लिए काल बनकर टूटेगी। मोदी ने 50 दिन में ही बेईमानों के खिलाफ काफी कुछ कर दिखाने का दम भरा था, लेकिन इस मामले में खोदा पहाड़ निकली चुहिया की कहावत साबित हुई।

 

50 दिन में पता नहीं कितना कायापलट हो जाएगा, इसका इतना विश्वास लोगों में जमा रहा कि 50 वां दिन आते-आते तक लोगों का पीएम से मोहभंग नहीं हुआ बल्कि आज भी नहीं हुआ है जबकि मोदी लोगों की परेशानियों की वजह से हर तरफ अफरातफरी फैलने की खबरों के कारण बहुत विचलित हो गए थे। मन की बात से लेकर लोगों को सीधे सम्बोधित करने के कार्यक्रमों तक में उनकी बेचैनी खूब झलकी थी। इस बीच नोटबंदी को जस्टिफाइ करने के लिए उनका स्टैंड लगातार बदलता रहा। पहले उन्होंने कहा कि यह सीमा पार से आने वाली जाली करेंसी खत्म करने और काले धन को बाहर निकालने के लिए किया गया उपाय है लेकिन जब 500 और 1000 का लगभग पूरा कैश जमा होता दिखाई दिया तो उन्होंने फिर इस कदम के औचित्य को लेकर नई बातें गढ़ीं। 2000 के नये नोट तक की जाली करेंसी पकड़ी जाने से सरकार के होश गुम हो गये। कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं और आतंकवाद के थमने के परिणामों को नोटबंदी से खूब जोड़ा गया। इस तथ्य को अनदेखा करके कि उस समय पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष रिटायर हो रहे थे और नये सेनाध्यक्ष के नाम पर अटकलें चल रही थीं। इस असमंजस के चलते उसकी शातिराना हरकतों पर असर पड़ना स्वाभाविक ही था। लेकिन पाकिस्तान में नये सेनाध्यक्ष के टेकओवर करते ही सेना के कैंप पर फिर हुए हमले ने नोटबंदी के कारण आतंकवाद थम जाने के सरकारी दावे की हवा निकाल दी।

 

इसके साथ ही नोटबंदी को भ्रष्टाचार पर कारगर प्रहार की कार्रवाई के बतौर भी निरूपित किया गया था, लेकिन नोटबंदी का बैंकों में भ्रष्टाचार के नये दरवाजे खोलने का चेहरा जब उजागर हुआ तो इस मामले में भी सरकार के हाथों के तोते उड़ गये। इसके बाद पीएम मोदी और उनकी सरकार ने नोटबंदी के औचित्य को लेकर नई दलीलें गढ़ीं। उन्होंने कहना शुरू किया कि नोटबंदी का कदम भारतीय समाज को कैशलेस व्यवस्था की ओर ले जाने के लिए उठाया गया है जिससे व्यापार में पारदर्शिता आएगी और काले धन  की स्थायी तौर पर नाकेबंदी हो सकेगी। लेकिन 50 दिन पूरे होने के बाद इन बिंदुओं पर नोटबंदी के परिणामों का लेखाजोखा पेश करने की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जननी सुरक्षा की रकम 6 हजार रुपये करने जैसी घोषणाएं करने लगे। इस पर जाहिर था कि उनके खिलाफ यह आवाजें उठतीं कि उन्होंने नोटबंदी को लेकर लोगों को कोई तसल्ली देने की बजाय समय से पहले बजट भाषण पढ़ने का काम किया है। कहने का मतलब यह है कि नोटबंदी के सुफल को लेकर पीएम मोदी अभी भी दुविधा में हैं।

 

लेकिन नोटबंदी पर जनमत का जो फीडबैक उन्हें मिला उससे उनकी पस्ती काफूर हो गई और आत्मविश्वास बुलंद हो गया। तमाम नुकसान के बावजूद आम लोगों में नोटबंदी के मुद्दे पर सरकार के भारी समर्थन की स्थिति ने उनकी ऐसी हौसलाअफजाई की कि वे अब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्यों में इसी मुद्दे पर विधानसभा चुनावों में जनमत संग्रह की स्थिति पैदा कर फतह पाने की रणनीति बुन बैठे हैं। वैसे नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक की असलियत भले ही बहुत अच्छी न हो लेकिन सरकार के इस कपटाचार के कुछ सकारात्मक संदेश भी हैं। कुछ महीने पहले तक यह दिख रहा था कि भाजपा अयोध्या मुद्दे को उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में कामयाबी के लिए गरमाएगी जिससे भारतीय समाज में और ज्यादा बंटवारा बढ़ेगा लेकिन नोटबंदी ने बंटवारा कराने वाले मुद्दों की जरूरत को ही खत्म कर दिया है। संकीर्ण मुद्दे विलोपित हों, यह सभी की मर्जी है और जाने-अनजाने में नोटबंदी के चुनावी जंग में केंद्रबिंदु में आने से इस मंशा की पूर्ति हो रही है।

 

दूसरी ओर पहले सकुचा रही सरकार अब सारी चुनावी डींगें नोटबंदी के हवाले से ही हांकने में जुट गई है। जो बातें प्रधानमंत्री को 50 दिन पूरे होने के बाद राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में कहनी चाहिए थीं वह बातें भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के समापन के दौरान शनिवार को पीएम और अन्य वक्ताओं ने कहीं। यह गिनाया गया कि नोटबंदी से जम्मू-कश्मीर की अशांति को निवारित करने में कितनी सफलता मिली है। सीमा पार से प्रायोजित किए जा रहे जाली करेंसी के व्यापार को इस कदम ने किस हद तक खत्म किया है। बेनामी सम्पत्तियों के खिलाफ अभियान चलाने की नये सिरे से घोषणा भी इस अवसर पर की गई। जिसके लिए पीएम अपने सम्बोधन में कतरा गये थे। यह भी दावा किया गया कि नोटबंदी के दौरान राज्यों का रेवेन्यू बढ़ा है। हालांकि यह तो किसी ने नहीं कहा था कि नोट बदलने की मुद्दत में राज्य सरकारों की राजस्व उगाही कम हुई है। यूपी में बिजली की वर्षों की बकायेदारी लोगों ने काले धन को खपाने के लिए जमा कर दी। तो पहले ही उजागर हो गया था कि नोट बदलने की मुद्दत के दौरान राज्यों का रेवेन्यू बढ़ेगा लेकिन इस मुद्दत के गुजर जाने के बाद कारोबार ठप होने से वैट जैसी मदों में वसूली में कितनी गिरावट होगी, यह तस्वीर तो अभी उजागर होनी है।

 

नोटबंदी के पहले ही विकास दर में गिरावट का आंकड़ा सामने आ चुका है। नोटबंदी के बाद तो इसे और धक्का लगेगा। पीएम ने गरीबों की सेवा की बात भी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के समापन भाषण में बहुत कही, क्योंकि उनकी पार्टी में दयानिधान की छवि नायकत्व का मॉडल है। जिसका मतलब होता है कि ज्यादा से ज्यादा गरीब पैदा करो ताकि उनकी सेवा का पुण्य कमाने का अवसर मिल सके। अलबत्ता गरीबी को खत्म न होने दो। क्या प्रधानमंत्री इस रास्ते पर देश को आगे ले जा रहे हैं? यह तथ्य भी जिक्र करने योग्य है कि दुनिया के 5 शीर्ष कैशलेस देशों में सोमालिया का नाम भी है। नोटबंदी के बाद जिस तरह से रोजगार के अवसर उजड़े हैं उससे भुखमरी और लूट-मार जैसी स्थितियों को आगे चलकर बढ़ावा मिलने के पूरे आसार हैं। भले ही मार्केटिंग की मायावी व्यवस्था के अनुरूप तात्कालिक तौर पर इस मुद्दे पर व्याप्त रूमानी माहौल के चलते लोग इसका अनुमान न कर पा रहे हों। तो क्या भारत को सोमालिया बनाने का सपना इस कदम में निहित है? शायद यह आलोचना कुछ लोगों को बहुत अतिरंजित लगे, लेकिन नोटबंदी के नतीजे अच्छे नहीं होंगे, यह बात बहुत जल्द ही स्पष्ट हो जाएगी। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद इस मुद्दे को चुनावी जंग में केंद्र में रखने से भाजपा उत्तर प्रदेश सहित पांचों राज्यों में बढ़त लेने में सफल हो सकती है।


comments

Create Account



Log In Your Account



छोटी सी बात “झाँसी टाइम्स ” के बारे में!

झाँसी टाइम्स हिंदी में कार्यरत एक विश्व स्तरीय न्यूज़ पोर्टल है। इसे पढ़ने के लिए आप http://www.jhansitimes .com पर लॉग इन कर सकते हैं। यह पोर्टल दिसम्बर 2014 से वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की नगरी झाँसी (उत्तर प्रदेश )आरंभ किया गया है । हम अपने पाठकों के सहयोग और प्रेम के बलबूते “ख़बर हर कीमत पर पूरी सच्चाई और निडरता के साथ” यही हमारी नीति, ध्येय और उद्देश्य है। अपने सहयोगियों की मदद से जनहित के अनेक साहसिक खुलासे ‘झाँसी टाइम्स ’ करेगा । बिना किसी भेदभाव और दुराग्रह से मुक्त होकर पोर्टल ने पाठकों में अपनी एक अलग विश्वसनीयता कायम की है।

झाँसी टाइम्स में ख़बर का अर्थ किसी तरह की सनसनी फैलाना नहीं है। हम ख़बर को ‘गति’ से पाठकों तक पहुंचाना तो चाहते हैं पर केवल ‘कवरेज’ तक सीमित नहीं रहना चाहते। यही कारण है कि पाठकों को झाँसी टाइम्स की खबरों में पड़ताल के बाद सामने आया सत्य पढ़ने को मिलता है। हम जानते हैं कि ख़बर का सीधा असर व्यक्ति और समाज पर होता है। अतः हमारी ख़बर फिर चाहे वह स्थानीय महत्व की हो या राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय महत्व की, प्रामाणिकता और विश्लेषण के बाद ही ऑनलाइन प्रकाशित होती है।

अपनी विशेषताओं और विश्वसनीयताओं की वजह से ‘झाँसी टाइम्स ’ लोगों के बीच एक अलग पहचान बना चुका है। आप सबके सहयोग से आगे इसमें इसी तरह वृद्धि होती रहेगी, इसका पूरा विश्वास भी है। ‘झाँसी टाइम्स ‘ के पास समर्पित और अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ संवाददाताओं, समालोचकों एवं सलाहकारों का एक समूह उपलब्ध है। विनोद कुमार गौतम , झाँसी टाइम्स , के प्रबंध संपादक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। जो पूरी टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का पिछले लगभग 16 वर्षों का अनुभव है। के पी सिंह, झाँसी टाइम्स के प्रधान संपादक हैं।

विश्वास है कि वरिष्ठ सलाहकारों और युवा संवाददाताओं के सहयोग से ‘झाँसी टाइम्स ‘ जो एक हिंदी वायर न्यूज़ सर्विस है वेब मीडिया के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में कामयाब रहेगा।