भीम आर्मी को भिंडरवाले की तरह प्रोजेक्ट करने की फिराक में तो नहीं भाजपा

By: jhansitimes.com
May 22 2017 08:59 am
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सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच छिड़ा संग्राम प्रदेश की राजनीति में चर्चा का सर्वोपरि विषय बना हुआ है। अखिलेश सरकार के समय मुजफ्फरनगर से शुरू हुए पश्चिम उत्तर प्रदेश व्यापी दंगों को संघ परिवार और भाजपा ने बहुत होशियारी से अपने पक्ष में भुनाया। इन दंगों के बाद हिंदुत्व के नाम पर तेज हुई ध्रुवीकरण की प्रक्रिया से दलित भी अछूते नहीं रहे और इस समाज का एक बड़ा वर्ग वर्ण व्यवस्था के खिलाफ तमाम शिकायतों और शंकाओं के बावजूद भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया था।

यह रुझान केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में थोड़ा कम थोड़ा ज्यादा इसका असर देखने को मिला। दलितों पर मायावती का एकछत्र प्रभुत्व दरका और मुस्लिम विरोधी नफरत के आधार पर दलितों के एक वर्ग द्वारा हिंदुत्व के साथ एकजुटता दिखाने की कोशिशों में शिरकत दिखाई दी। दलितों को अपना पेटेंट समझने वाली मायावती तक भी इस विपरिहास का फीडबैक पहुंच गया था लेकिन वह इतने ज्यादा घमंड में चूर हो जाती हैं कि उन्हें पैरों के नीचे की जमीन दिखना बंद हो जाती है इसलिए उन्होंने इन खबरों को बहुत संजीदगी से नहीं लिया। जब उनकी इस अनदेखी का विधानसभा चुनाव में भाजपा को जबर्दस्त मुनाफा मिला तब उनके होश ठिकाने आये लेकिन क्या करें चिड़िया चुग गई खेत अब का होत है। इसलिए मायावती अपने राजनीतिक करियर की सबसे करारी शिकस्त खाने के बाद हक्का-बक्का सी रह गईं और कुछ कर न पायीं।

भाजपा द्वारा दलितों को सुग्रीवपंथी मॉडल के तहत हिंदुत्व के नाम पर अपने साथ गोलबंद करने के प्रयास बहुत ही सुनियोजित ढंग से किए जा रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी के तहत बाबा साहब अंबेडकर के प्रति भक्ति भाव की पराकाष्ठा किए हुए थे और आरक्षण को किसी कीमत पर खत्म न होने देने का दम भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। उनके इन प्रयासों के पीछे पूरी तरह संघ की सुनियोजित रणनीति थी। इन प्रयासों का एक मकसद यह भी था कि अगर भाजपा दलितों को रिझाने में सफल हो जाती है तो देश को कांग्रेसमुक्त करने का उसके संकल्प में मजबूती आएगी। गो कि कांग्रेस का बेसवोट ब्राह्मण, दलित और मुसलमान हैं। बसपा के कमजोर होने पर किसी भी समय दलित घरवापसी का रुख कर सकते हैं और मुसलमान भी अगर उनके साथ जुड़ गये तो ब्राह्मणों तक की वापसी कांग्रेस में हो जाने से उसका पुनर्जीवन हो जाएगा। इसलिए बाबा साहब की विचारधारा को लेकर तमाम विरोधाभासों के बावजूद पीएम नरेंद्र मोदी उनकी दुहाई देने का कोई मौका नहीं चूक रहे थे।

पर सहारनपुर की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो सिनेरियो आज है उससे लग रहा है कि संघ और भाजपा ने अपने ही हाथों अपना खेल बिगाड़ लिया है। योगी सरकार ने सहारनपुर के जातीय दंगों को लेकर जो रुख अपनाया निश्चित रूप से वह एकतरफा रहा इसलिए दलितों का भीषण तरीके से भाजपा के प्रति मोहभंग हुआ है। संघ की सारी तपस्या और मेहनत पर योगी सरकार के इस रुख ने पानी फेर दिया है। आसार यह थे कि इसके बाद संघ के द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के चयन पर पुनर्विचार किया जाएगा लेकिन शुरुआती बवंडर कुछ भी रहा हो पर अब संघ संयत हो गया है और योगी के ही फैसलों की तायद कर रहा है।

दूसरी ओर सहारनपुर दंगों के बाद रातोंरात समाचार माध्यमों की सुर्खियों में आई भीम आर्मी गजब ढा रही है। भीम आर्मी के फरार चीफ कमांडर चंद्रशेखर आजाद को योगी की पुलिस ने नक्सली उग्रवादियों से जोड़ दिया फिर भी उनकी हैसियत पर कोई असर नहीं आया। दिल्ली के जंतर-मंतर मैदान में भीम आर्मी द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन में लाखों की भीड़ जुटी जिससे यह जाहिर हो गया कि यह आर्मी दलितों का पश्चिमी यूपी में सबसे बड़ा जेहादी संगठन बन गया है। अब सवाल यह है कि भीम आर्मी की यह ताकत यूपी की सरकार के द्वारा उसे रोकने के बावजूद है या इसके पीछे कोई सुनियोजित दिमाग काम कर रहा है।

बसपा सुप्रीमो मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं। यह दूसरी बात है कि बसपा की बहुत पहले ही वे फायर ब्रांड नेता के रूप में उभर चुकी थीं लेकिन उनकी पार्टी की जो मजबूत स्थिति बुंदेलखंड में थी उसकी बराबरी वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कभी नहीं कर पायीं। इस चिढ़ में या अपनी नादानी में उन्होंने पार्टी के गढ़ बुंदेलखंड को भी नये-नये प्रयोगों से तहस-नहस कर लिया। बुंदेलखंड बहुजन राजनीति का सबसे कामयाब मॉडल बन गया था लेकिन इस अंचल की सीटों पर उन्होंने बैकवर्ड उम्मीदवारी पर आरा चलाकर उन कट्टर सवर्णों को मौका दिया जो पुश्तैनी तौर पर दलितों के दमन के अभ्यस्त थे। मायावती की इसी बेहूदा नीति की वजह से वे न घर की न घाट की वाली हैसियत पर पहुंच गईं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना सिक्का चला नहीं पाईं और बुंदेलखंड में उनकी वजह से पार्टी के पैर अपने आप उखड़ गये।

इसके बावजूद भाजपा और संघ परिवार को कहीं न कहीं यह अंदेशा रहता है कि जब तक दलितों के बीच मायावती का तिलिस्म नहीं टूटेगा तब तक चक्रवर्ती साम्राज्य कायम करने की उनकी हसरत निरापद नहीं रह पाएगी। इसलिए भ्रष्टाचार के मामलों में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद ही मायावती को घेरकर जेल पहुंचाने की उत्कटता भाजपा नेतृत्व ने दर्शायी है। जब इसमें मुश्किल समझ में आयी तो भाजपा ने उनके भाई को सींखचों के अंदर कर पहला पायदान बढ़ाने की रणनीति बनाई। आयकर के आनंद के ठिकानों पर छापों से इसकी भूमिका सामने आयी। इसी से घबराकर मायावती ने आनंद को बहुजन समाज पार्टी का यकायक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित कर दिया ताकि उनकी राजनीतिक हैसियत बन सके। हालांकि पार्टी नौसीखिये आनंद को एकदम से शिखर पर बैठा पाना पचा नहीं पा रही। जिसकी वजह से मायावती को दूसरे बहाने बनाकर तमाम दिग्गजों को पार्टी के बाहर का रास्ता भी दिखाना पड़ा।

बसपा की यह अंदरूनी उथल-पुथल भाजपा के लिए मजे लेने का अवसर रही लेकिन भाजपा का मूल मकसद उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा को खत्म करना है इसलिए वह बल्ले-बल्ले होने के तात्कालिक मौकों के कारण अपने को किसी गफलत का शिकार नहीं होने दे रही। सहारनपुर का दंगा जहां तक समझ में आता है आकस्मिक था लेकिन बाद में भाजपा ने इसे अपनी रणनीति का औजार बना लिया है। 9 मई को हुए इस दंगे के बाद अगले दिन सीएम योगी आदित्यनाथ मेरठ पहुंचे जहां उन्होंने अपने ऊपर जातीय पक्षधरता के लग रहे आरोपों के बावजूद अपने रूट पर पड़ने वाली बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा पर कहे जाने के बावजूद माल्यार्पण करना स्वीकार नहीं किया।

योगी आदित्यनाथ का यह रवैया सहारनपुर की सिचुएशन को अपनी बढ़त का हथियार बनाकर इस्तेमाल करने की नीति के ही अंतर्गत रहा। इससे दलितों में यह मैसेज गया कि भाजपा की सवर्णवादी सरकार उन्हें दबाकर रखने की मानसिकता से ओतप्रोत है इसलिए इस सरकार में उनको न्याय नहीं मिल पायेगा। दलितों के इस कॉम्प्लेक्स की वजह से भीम आर्मी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती के विकल्प के रूप में बहुत मजबूती से छा गई है। भीम आर्मी की बढ़त को लोग इंदिरा गांधी द्वारा पंजाब में अकाली दल के खात्मे के लिए भिंडरवाले को प्रोजेक्ट करने की चाल की तर्ज पर देख रहे हैं और इसमें कुछ अन्यथा भी नहीं है।

भीम आर्मी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश यानी मायावती के गढ़ में दलित जनाधार के बीच बसपा का सूपड़ा साफ कर दिया है। भीम आर्मी हार्डकोर है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि भिंडरवाले की ही तर्ज पर भीम आर्मी भाजपा के लिए भस्मासुर बन जाये। यह सवाल गैर वाजिब नहीं है। लेकिन भाजपा ने दलित राजनीति के तमाम फायरब्रांड नेताओं को जिस तरह से अपने यहां शरण देकर निस्तेज किया है उससे पार्टी का हाईकमान इस बात से आश्वस्त है कि भीम आर्मी का भी उसके द्वारा वैसा ही हश्र किया जा सकता है। संघप्रिय गौतम आदि फायरब्रांड दलित नेता तो पहले ही भाजपा शरणम् गच्छामि हो चुके थे लेकिन उनका भाजपा में क्या वजूद रह गया है। कभी-कभी अपनी भड़ास निकालकर वे इसको जाहिर करते रहते हैं।

लोकसभा चुनाव के पहले अपने करियर को चमकाने के लिए उदित राज भाजपा में शामिल हुए थे। उदित राज की जुबान बहुत ही पैनी थी। भाजपा नेतृत्व को इस पार्टी के शुभचिंतकों द्वारा चेताया गया था कि उदित राज को शामिल करने की जहमत उठाकर बैठे-बैठाये क्यों आफत मोल ले रहे हो लेकिन आज हालत क्या है। उदित राज बुरी तरह कुंठित हैं लेकिन भीगी बिल्ली बने हुए हैं। मतलब स्पष्ट है कि भाजपा के पास फायरब्रांड  दलित नेताओं को लुभाने का नुस्खा है और यह नुस्खा भी है कि कैसे उनको बिना डंक का बिच्छू  बनाकर छोड़ दें। इसलिए भीम आर्मी का गुब्बारा फुलाकर भाजपा उसे अपने दामन में समेट ले तो आश्चर्य नहीं होगा। अब देखना यह है कि भाजपा की इस कुटिल चाल का काउंटर मायावती कैसे कर पाती हैं। 

RIPORT- K.P SINGH (EDITOR-IN-CHIEF)


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