भाजपा: शूद्र को सेवा, सवर्णों को मेवा

By: jhansitimes.com
Sep 03 2017 10:08 am
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(editor-in-chief, KP SINGH) मोदी सरकार के लिए सितंबर के महीने की शुरुआत बहुत मनहूस रही। डोकलाम में युद्ध का खतरा टल गया है। दोनों देशों के बीच हुई सहमति को लेकर उऩके बयानों में अंतर है। लेकिन चीनी सरकार के बयान यह बता रहे हैं कि उसकी मनमानी के आगे भारत सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ा है। मोदी सरकार ने इसे चीन के पीछे हटने के रूप में मीडिया में प्रचारित कराया लेकिन दबे-छिपे अंदाज में जबकि चीन ने डंका पीटकर यह कहा कि न तो उसने विवादित क्षेत्र में सड़क बनाने का इरादा छोड़ा है और न ही उसने उक्त क्षेत्र में अपनी सेना के ठहराव पर किसी तरह की कटौती को मंजूर किया है। चीन की बयानबाजी में लगातार हेकड़ी जारी रही जबकि संयम और परिपक्वता का नाम देकर भारत सरकार के अंदाज में झलका दब्बूपन किसी अंधे को भी दिखाई पडऩे वाला रहा।

इसी तरह कश्मीर में पिछले एक हफ्ते में आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों पर खतरनाक हमले किए जिससे उनकी कमर सेना के आपरेशन के फलस्वरूप टूट जाने के दावे हवा-हवाई साबित हो गये। सबसे बड़ा झटका आर्थिक विकास दर में भारी गिरावट के रूप में सामने आया, जिसने सरकार की बोलती बंद कर रखी है। नोटबंदी की आर्थिक क्रांति का ऐसा हश्र होगा इसका अंदाजा शायद सरकार पहले कर नहीं सकी थी। ऐसे में अपनी लोकप्रियता दरकने के खतरे के अहसास के बाद मंत्रिमंडल में बदलाव का शिगूफा लेकर सरकार सामने आयी है तो विपक्ष का यह कहना स्वाभाविक है कि इस कदम के पीछे कोई सार्थक उद्देश्य न होकर सरकार की विफलताओं की कहानी को मीडिया में ओझल करना है।

धीरे-धीरे मोदी सरकार को तीन साल पूरे हो गये हैं। इस अवधि में कांग्रेस की गंदगी साफ करने के भाषण के अलावा सरकार कुछ नहीं कर पायी है। सरकार से लोगों को बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन वे सभी धराशायी हो गईं। सरकार चाहे जितने दावे करे कि उसने भ्रष्टाचार को खत्म कर दिया है लेकिन जनता इससे कदापि संतुष्ट नहीं होने वाली। सरकार ने केवल एक ही काम किया है जनमानस में सांप्रदायिकता के जहर को गाढ़ा करना। अगर यह जहर न चढ़े तो लोगों में निराशा इतनी घनी है कि लोग इस सरकार को उखाड़कर फेंक देंगे। यह जहर 2019 के लोकसभा चुनाव तक मंदिम न पड़ जाये इसके लिए सरकार सचेत है और विपक्ष की बेवकूफियों से इसमें कामयाब भी हो रही है। इसलिए सरकार की विश्वसनीयता का ग्राफ यथा एक बात है लेकिन 2019 में भी मोदी सरकार पुनरावृत्ति करेगी इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके फैसलों में नीतिगत गहराई और दूरदर्शिता का अभाव है। पुराने समय के फार्मूला फिल्म के निर्माता-निर्देशकों की तरह की कार्यपद्धति को अपनाये यह सरकार सिर्फ चर्चाओं को मसालेदार बनाये रखने में अपनी कुशलता दिखा पायी है। नोटबंदी इसका एक अंधाधुंध कदम था। इस कदम के कारण बाजार में प्रवाहमान हो रही पूंजी सिमट कर बैंकों में पहुंच गई। इस बीच जीएसटी लागू हुआ। ताबड़तोड़ ऐसे कदम उठाए गये जिससे लोगों का साहस चुकने लगा और इसका असर उद्यमिता पर पड़ा। आर्थिक गतिविधियों को ब्रेक लग गया। इनोवेशन के गुण की कमी की वजह से विनिर्माण में तो प्रगति होनी ही नहीं थी बाजार भी टूटा और यह सब पहले से स्पष्ट था। बाजार में ग्राहकों का टोटा पड़ गया तो उत्पादन और रोजगार के अवसर भी प्रभावित हुए। उधर विदेशी पूंजी निवेशक कोई ऐसा कारण नहीं तलाश पा रहे जिससे वे भारत में आकर पूंजी निवेश करने में अपना मुनाफा समझें।

माना कि यहां सस्ता श्रम है लेकिन चीन और जापान की तरह कौशल का अभाव भी है, जिसकी वजह से यह श्रम उन्हें किसी काम के लायक नजर नहीं आ रहा। कौशल विकास की जिम्मेदारी में खरे न उतरने के नाम पर पीएम ने राजीव प्रताप रूडी की बलि चढ़ा दी है लेकिन समस्या यह है कि कौशल विकास कैसे हो। जब वर्ण व्यवस्था के कारण शिल्पकारी, अभियंत्रण इत्यादि कार्यों से लोगों का दर्जा नीचे हो जाता है। आजादी के बाद से मोदी सरकार आने तक राजनीति की जो दशा थी उसमें वर्ण व्यवस्था की जकड़न ढीली हो रही थी जिससे देश में नये उजाले की उम्मीद की जानी लगी थी। लेकिन भाजपा का चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित होने के बाद देश के प्रगतिशील रुझान की उलटी गिनती शुरू हो गई है।

यूपी में कल्याण सिंह के समय ही भाजपा इस बात को झेल चुकी है कि जब उसने कल्याण सिंह के पिछड़ा नेतृत्व को साइड लाइन कर रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयोग के जरिये सवर्ण राज का रिवाइवल किया तो उसे लेने के देने पड़ गये। कहने को भाजपा आज अपनी राजनीति के जातिगत कोण को नकार सकती है लेकिन वास्तविकता में अगर दूसरी पार्टियां जाति पर आधारित रणनीतियां बुनती हैं तो भाजपा उनसे दो कदम आगे रही है। अगर ऐसा न होता तो केशव प्रसाद मौर्य को जब प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था तब उनमें कौन से ऐसे लाल लटक रहे थे जिनसे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और संघ प्रभावित हुआ होगा और तमाम बदनामियों के बावजूद स्वामी प्रसाद मौर्य को हाथोंहाथ लेने के पीछे भी जातिगत किलेबंदी को दुरुस्त करने के अलावा और कोई दलील नहीं दी जा सकती।

हालांकि पिछड़ों को सम्मोहित करने की उसकी तरकीबें नाकामयाब नहीं रहीं और केशव प्रसाद मौर्य से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य तक ओबीसी के जिन नेताओं को उसने हरावल दस्ते में रखा वे विधानसभा चुनाव में तुरुप का इक्का साबित हुए। लेकिन यह एक अंतरिम व्यवस्था थी। जैसे मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में झेलना। यह कार्य पूरा होते ही पहले ओबीसी को सीएम के चुनाव में ठेंगा दिखाया गया और अब प्रदेश अध्यक्ष में भी उसका पत्ता साफ हो गया। सवर्ण राज की अवधारणा में खोट ही खोट हैं। ओबीसी में तो साढ़े 3 हजार से ज्यादा जातियां हैं। जिसे वृहत्तर समाज कहा जा सकता है और एक सामूहिक संज्ञा में इनमें अहम के टकराव की समस्या काफूर रहती है लेकिन तथाकथित सवर्ण राज में ऐसा नहीं होता। योगी ने सीएम बनते ही हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश डलवा दी। जिसके बाद सवर्ण घटकों के बीच जिस तरह से आपस में तलवारें खिंचीं वे म्यान में वापस नहीं हो पा रही थीं। इसकी खबर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को होने की वजह से ही योगी को संतुलित करने के लिए जहां महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया वहीं शिवप्रताप शुक्ला को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी जा रही है।

गोरखपुर की राजनीति में शिवप्रताप शुक्ला और योगी के बीच 36 का आंकड़ा जगजाहिर रहा है। मोदी ने भाजपा के लिए प्रधानमंत्री बनने के तत्काल बाद अपना जो कामराज फार्मूला लागू किया था उसमें बाकी सारे बुजुर्ग तो बिना डंक के बिच्छू बनाकर मार्गदर्शक मंडल में समेट देने में उन्होंने तत्काल ही सफलता प्राप्त कर ली थी। जिसमें से लालकृष्ण आडवाणी को उन्होंने राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय में भी नहीं उबरने दिया जबकि पूरी पार्टी की आवाज थी कि अंतिम समय पार्टी को खड़ा करने में सबसे ज्यादा योगदान देने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति के रूप में पदासीन करके पार्टी उनका ऋण चुकाने का एक प्रयास करे लेकिन लालकृष्ण आडवाणी के अरमां आंसुओं में बह गये और कारवां गुजर गया वे अब अंतिम पड़ाव पर गुबार देखते-देखते जिंदगी का सफर पूरा करने को अभिशप्त हो चुके हैं।

इस फार्मूले के नाते बहुत पहले से पीएम मोदी कलराज मिश्र से निजात पाने की फिराक में थे लेकिन उनका हौसला निर्णय लेते-लेते जवाब दे जाता था। बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनवाकर दलितों के बीच में कृपानिधान बनने का अवसर उन्होंने हासिल कर लिया है। इसके बावजूद लोगों को यह उम्मीद थी कि चूंकि रामनाथ कोविंद बीजेपी द्वारा मनोनीत किए गए राज्यपालों में एकमात्र दलित थे इसलिए उनके राष्ट्रपति बन जाने से रिक्त स्थान पर राज्यपालों के बीच दलित कोटे का ख्याल रखा जाएगा। पार्टी में एक से एक मुखर दलित नेता हैं जिनमें स्वतंत्र नेतृत्व क्षमता है लेकिन रामनाथ कोविंद में मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुबीर की जो सुपीरियल वेरायटी है उसकी बड़ी कमी दमदार दलित नेताओं में देखी जाती है, जिसकी वजह से भाजपा नेतृत्व मानता है कि अगर पार्टी को निरापद चलाना है तो उदित राज, कौशल किशोर, संघप्रिय गौतम जैसों से बचो। लेकिन कोई सीधा-सादा दलित नेता भी राज्यपाल पद के लिए टटोला जा सकता था लेकिन यह न करके वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा को पूर्णतया बहाल करने के लिए राज्यपाल के कोविंद से खाली पद को भी भरने के लिए पार्टी को आखिर कलराज मिश्र का ही नाम सूझा।

यह भक्ति युग का नया चरण है जिसके मद्देनजर पार्टी यह आशा कर सकती है कि बहुजन समाज को दोयम दर्जे पर वापस लाने के उपक्रम को लेकर कहीं कोई विद्रोह नहीं होगा। इस तरह भाजपा अपनी असली सोशल इंजीनियरिंग के साथ सामाजिक स्तर पर लोकसभा के आगामी चुनाव के लिए जड़े मजबूत कर रही है। तो दूसरी ओर उसे अन्य मोर्चों पर भी ध्यान देना है। देश की जनता जितनी दीन-हीन होगी भक्ति भाव उतना ही बढ़ेगा, यह भाजपा के लिए अनुभूत सच जैसा है इसलिए बैंकों को राष्ट्रीयकरण के पहले जैसी व्यवस्था में वापस लाया जा रहा है ताकि उनका पैसा मुट्ठी भर उद्योगपतियों को नाममात्र के ब्याज पर कर्ज देने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इससे आर्थिक विकास दर टूटेगी, रोजगार के अवसर खत्म होंगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को दीन-हीन बनाने का अवसर स्वतः मिल जाएगा। इसी तरह कश्मीर के मामले में कश्मीरियों से बातचीत का कोई ठोस जरिया तैयार करने की बजाय मार-काट का माहौल बनाये रखना भाजपा को ज्यादा मुफीद लगता है। भले ही इसमें हमें अपने सुरक्षा बलों की भारी शहादत की चोट झेलनी पड़ी। कश्मीर को केंद्र बनाकर आक्रामकता के प्रसार की रणनीति का प्रतिबिंब पूरे देश पर किस तरह पड़ता है, भाजपा इस सच से भी वाकिफ है।

लेकिन भाजपा के यह सब कारनामे वे हैं जिनसे समझदार लोग पहले से ही परिचित थे इसलिए सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद अगर यह सब हो रहा है तो इसमें कुछ भी विचित्र नहीं है। अगर कुछ अजीब लगने वाली बात है तो यह है कि लोग यह समझते थे कि सामाजिक और सांप्रदायिक मोर्चे पर भाजपा में चाहे जितनी संकीर्णता हो लेकिन धार्मिक विचारों के कारण भाजपाइयों में वैभव के प्रति आकर्षण नहीं होगा। काफी हद तक ईमानदारी रहेगी लेकिन भाजपाई तो इस मामले में कांग्रेस व दूसरे दलों से भी आगे निकलते जा रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री का ठाट-बाट चर्चा का विषय बना हुआ है। इसका असर नीचे तक हो रहा है।

नोटबंदी के दौरान भाजपा के दिग्गजों ने अपने यहां कई सौ करोड़ रुपये की शादियां करके गरीबों का दिल जलाया और वैभव को सामाजिक मान-सम्मान के मानक के रूप में स्थापित किया। उस पर भी तुर्रा यह है कि वैभव की आधुनिक निशानियों में पश्चिमी सभ्यता के प्रति गुलामों जैसी आसक्ति को इस माहौल में बहुत ज्यादा बढ़ावा मिला है। न तो भाषा के स्तर पर और न ही खान-पान के स्तर पर हिंदुत्व से जुड़ी चीजों की कोई कद्र देखी जा रही है। धर्म में दया भावना भी बहुत होती है इसलिए उम्मीद थी कि भाजपा के लोग ज्यादा दयालु होंगे और भ्रष्टाचार से अस्तित्वहीन हो चुके मौलिक अधिकारों की बहाली करेंगे। हर आदमी की रिपोर्ट अगर उसके साथ अन्याय हुआ है तो बिना पैसे की लिखी जाएगी।

हर आदमी का इलाज सरकारी अस्पताल में फ्री होगा चाहे उसके पास पैसे हों या न हों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर आदमी अपने बच्चों को कम से कम खर्च में दिला सकेगा लेकिन ये सपने भी पूरे नहीं हुए। भौतिक विकास के नाम पर भी स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसे हवाहवाई ऐलान हो रहे हैं जबकि जमीनी काम रुक गया है। सवाल 2019 के चुनाव का नहीं है सवाल इस बात का है कि अंततोगत्वा इतिहास बहुत निर्ममता से लोगों और संस्थाओं का फैसला करता है और उसका इंसाफ देर-सवेर जब भी होगा इन चकमेबाजियों की वजह से भाजपा की तस्वीर उसमें बहुत खराब बनकर सामने आयेगी। राजीव गांधी ने केवल 5 साल शासन चलाया था लेकिन गरीब बच्चों की बेहतर शिक्षा के उदाहरण स्वरूप जवाहर नवोदय विद्यालय का कॉन्सेप्ट, बुनियादी स्तर पर वंचितों के नेतृत्व के सशक्तिकरण की परिचायक पंचायतीराज और स्थानीय निकाय चुनाव की आरक्षण व्यवस्था व संचार क्रांति सहित उनकी स्पष्ट रूप से उनकी कई ऐसी देन हैं जिनके लिए उनका उदाहरण हमेशा दिया जाएगा। क्या मोदी सरकार ने ऐसा कुछ किया है जिसके स्थायी प्रभाव की आशा की जा सके।

अभी भी मोदी सरकार के लिए 2 वर्ष बाकी हैं। इनमें उसे ठोस काम कर दिखाने की भावना से आगे बढ़ना चाहिए लफ्फाजी से नहीं तो काफी कुछ डैमेज कंट्रोल हो सकता है। रविवार को भाजपा कोटे से मोदी मंत्रिमंडल में 9 नये मंत्री शपथ लेने वाले हैं। पहली नजर में उनके नाम देखकर लगता है कि मोदी ने अब कुछ सीख ली है। इस लिस्ट में अल्फांसो, आरके सिंह, हरदीप सिंह पुरी और सत्यपाल सिंह जैसे विशेषज्ञ नौकरशाह व अश्विनी चौबे जैसे प्रभावशाली नेताओं का नाम शामिल है। उम्मीद की जानी चाहिए मंत्रिमंडल विस्तार की इस पारी के बाद उनकी सरकार कुछ फलदायक कार्य करने में कामयाब होगी।


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