यादें बनकर न रह जाए बसपा, बुंदेलखंड में पार्टी को दीमक की तरह चाट रहे कोऑर्डिनेटर

By: jhansitimes.com
Jan 11 2018 01:15 pm
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झाँसी। बहुजन समाज पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले बुंदेलखंड में पार्टी खंड-खंड हो गई। आलाकमान द्वारा थोपे जाने वाले कोऑर्डिनेटर पूरे संगठन को एकजुट करने के बजाए मिशनरी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर रख रहे हैं और अपने लाभ को देखते हुए ऐसे लोगों को संगठानात्मक कार्य के लिए जोड़ रहे जो बसपा की मूल धारा से ज्यादा परिचित भी नहीं हैं। ऐसे में बाबा साहेब के मिशन को धरातल से शिखर तक लाने वाला मिशनरी व बसपाई कार्यकर्ता स्वयं को ठगा महसूस कर रहा है।

 

कभी फहराता था नीला परचम 

कभी बुंदेलखंड में बसपा की तूती बोलती थी। बुंदेलखंड की 21 विधानसभा सीटों में अधिकांश बसपा के विधायक होते थे। लेकिन जब से कन्नौज के रहने वाले नौशाद अली को बसपा आलाकमान ने बुंदेलखंड में उतारा है, पार्टी का विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व तो घटा ही है, संगठनात्मक ढांचा भी बेहद कमजोर हो गया है। यही कारण है कि पार्टी में आम कार्यकर्ता और बसपाई विचारधारा का व्यक्ति संगठन से दूरी बनाने लगा है। 

 

लगातार गिरता गया ग्राफ

वर्ष 2007 में बुंदेलखंड की 21 में से 13 सीटों पर बसपा के एमएलए थे। इसके बाद वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद यहां कुल 19 विधानसभा सीटें रह गई। चुनाव के बाद यहां 13 से एमएलए की यह संख्या घटकर 08 पर पहुंच गई। वहीं वर्ष 2017 में यह संख्या नगण्य हो गई। सांगठित रूप से सबसे मजबूत पार्टी कही जाने वाली बसपा पूरे बुंदेलखंड में एक भी विधायक नही जिता सकी। इसी प्रकार पहले बुंदेलखंड की चार में से अधिकांश लोकसभा सीटें बसपा के खाते में होती थीं। मगर वर्ष 2009 के आम लोकसभा चुनाव में जहां बुंदेलखंड की मात्र एक सीट बसपा को मिली तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जैसे बसपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। 

 

आलाकमान से ज्यादा कोऑर्डिनेटरों का खौफ

कट्टर बसपाईयों पर आलाकमान और वहां से थोपे गए कोऑर्डिनेटरों का इतना खौफ है कि वे कुछ भी खुलकर बोलने का तैयार नहीं हैं। कारण, उन्होंने खुलकर विरोध किया और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। ऐसे कई मामले झाँसी व आसपास के जनपदों में देखने को मिले, जहां कोऑर्डिनेटरों की मनमानी का विरोध करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को पार्टी से या तो निलंबित कर दिया गया या फिर उन्हें बाहर कर दिया गया।

 

जल्द बड़े निर्णय न लिए तो पछताएगा आलाकमान

इस बार निकाय चुनावें में फिर बसपा का प्रदर्शन कुछ हद तक सुधरा है। वह भी कोऑर्डिनेटरों के कारण नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की एकजुटता के कारण। दबी जुबान से कुछ पुराने और पिछड़े वर्ग के कार्यकर्ता बताते हैं कि पार्टी में पुराने और पिछड़े वर्ग को हाशिए पर रख दिया गया है। कुछ मठाधीश ही पार्टी चला रहे हैं और अपने चहेतों को रेवड़ी की तरह पद बांटे जा रहे हैं। उनके माध्यम से वसूली हो रही, जो सीधे कोऑर्डिनेटरों की जेब तक पहुंचती है। संगठन तो बस नाममात्र का रह गया है। जल्द ही इस मनमानी पर रोक लगाना जरूरी है। अभी भी यदि बसपा आलाकमान ने नौशाद अली जैसे अन्य कोऑर्डिनेटरों को यहां से नहीं हटाया तो ये बसपा को दीमक की तरह चट कर जाएंगे और रह जाएंगी बीती यादें मात्र। 

 

 

 

 

 

 


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