पिछड़े वर्ग की नाराजगी से बसपा को लगा ग्रहण,धीरे-धीरे मजबूत कार्यकर्ताओं को किया जा रहा निष्कासित

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Dec 20 2017 09:28 pm
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झांसी। बुन्देलखंड कभी बहुजन समाज पार्टी का गढ़ माना जाता था। लेकिन इन दिनों यह विपरीत है। पहले लोकसभा, फिर विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। यदि अभी हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव की बात करें तो इसमें भी पार्टी की स्थिति कोई खास संतोषजनक नहीं रही है। बुन्देलखंड में पार्टी के लगातार हो रहे पतन के पीछे क्या कारण यह है। यह कह पाना मुश्किल होगा। फिलहाल राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो बुन्देलखंड में हो रहे पतन का मुख्य कारण है बसपा से पिछड़ा वर्ग की नाराजगी। जिसमें घी डालने का काम कर रहे है पिछले लम्बे समय से तैनात कार्डिनेटर। जो एक के बाद पिछड़ा वर्ग के मजबूत नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। 

बुन्देलखंड में वर्तमान की राजनीति की बात करें तो वह प्रमुख रुप से पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के इर्दगिर्द घूमती दिखी है। पहले पिछड़े वर्ग का यह वोट एकमुश्त होकर बसपा का समर्थन करता था। जिस कारण पार्टी बुन्देलखंड में मजबूत बनकर उभरती थी। लेकिन इन दिनों ऐसा नहीं हो रहा है। यह समाज इन दिनों पार्टी से धीरे-धीरे दूर होता चला जा रहा है। जो बसपा की हार के रुप में सामने आ रहा है। इसी का लाभ उठाकर सभी राजनैतिक दल, फिर चाहे भाजपा, सपा और कांग्रेस ही क्यों न हो। 

सभी इस समाज को लुभावने वादे कर अपनी ओर मोड़ने के प्रयास में लगे रहते है। भारतीय जनता पार्टी ने इस समाज का अपनी ओर रुख मोड़ने के लिए लोकसभा में बुन्देलखंड से उमा भारती को चुनावी मैदान में उतारा था। वहीं विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्या को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपी थी। जिसमें भाजपा को सफलता मिली और उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की। जबकि बहुजन समाज पार्टी ने पिछड़े वर्ग के समाज को नजर अंदाज किया। जिसका हर्जाना उनके सामने हार के रुप में आया है। 

पिछड़े वर्ग की बसपा से नाराजगी क्यों है। इसका कारण अभी तक पार्टी मुखिया मायावती सहित किसी भी नेता ने जानने का प्रयास नहीं किया है। यदि राजनीतिक गलियारों के चर्चाओं की मानें तो वर्तमान में पार्टी की जिन नेताओं के हाथों में बुन्देलखंड की बागडोर है वह इस समाज के लोगों को जोड़ने के बजाय उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में लगे है। धीरे-धीरे एक के बाद एक पिछड़े समाज केे नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी ने भरपूर उठाया है।

बुन्देलखंड के झांसी की बात करें तो पार्टी ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए पिछड़े समाज के नेता और पूर्व विधायक केपी राजपूत को विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। इसके बाद नगर निकाय चुनाव सम्पन्न होते ही जनपद जालौन में पाल समाज के पुराने व मिशनरी कार्यकर्ता छुन्ना पाल, कुशवाहा समाज से पूर्व विधायक संतराम कुशवाहा व पार्टी के जमीनी और युवा कार्यकर्ता संजय गौतम को पार्टी से निष्कासित किया है। 

बुन्देलखंड के वर्तमान कार्डिनेटरों की बात करें तो वह बसपा में विभीषण की भूमिका निभाते दिख रहे है। जो पार्टी मुखिया को गुमराह कर धीरे-धीरे गर्त में धकेल रहे हैं। चर्चाओं की मानें तो उक्त कार्डिनेटर चुनावी मैदान के उम्मीदवारों से मोटी रकम वसूलते है और पार्टी के जिताऊ उम्मीदवार को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाते है। चर्चा यह भी है कि लम्बे समय से वर्तमान में बुन्देलखंड में तैनात कार्डिनेटर बसपा सुप्रीमो के कमाऊ सपूत भी है। जिस कारण पार्टी मुखिया जानकार भी अंजान बनी हुई है। आलम यह है कि मिशनरी कार्यकर्ता यह कहने को मजबूर है कि कांशीराम की नेक कमाई बहन जी के इन कमाउ कार्डिनेटरों ने खाई। 


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