बुंदेलखंड: 32 प्रतिशत एससी/एसटी जातियों ने शुरू की गोलबंदी, बीजेपी-कांग्रेस की बड़ी मुसीबत

By: jhansitimes.com
Oct 07 2018 04:31 pm
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उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की पहचान है-सूखा, फसल बर्बादी, किसान आत्महत्या, पीने के पानी की किल्लत और बेरोज़गारी जैसे शब्द|  जो कभी भी नेशनल मीडिया की ख़बरों में जगह भी नहीं बना पातीं. इन सभी परेशानियों को झेल रहा यह इलाका चुनावों के दौरान जातियों का अखाड़ा बन जाता है.वर्ष  2018 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले एससी/एसटी प्रोटेस्ट और फिलहाल जारी सवर्ण आंदोलन ने कई सीटों पर पार्टियों और स्थानीय नेताओं के बने-बनाए जातीय समीकरणों को तबाह कर दिया है. भले ही सवर्ण आंदोलन सुर्खियां बंटोर रहा हो लेकिन दो अप्रैल के आंदोलन के बाद एससी/एसटी जातियों ने भी इस इलाके में गोलबंदी शुरू कर दी है. जो भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत बनकर सामने आ रहे हैं | 

वर्तमान में बीजेपी है लीडिंग पार्टी

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में कुल पांच जिले- सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, दमोह और पन्ना आते हैं. इन पांच जिलों में कुल 26 विधानसभा सीटें हैं. इन 26 सीटों में से फ़िलहाल 20 बीजेपी के पास जबकि 6 कांग्रेस के पास हैं. इस इलाके के जातीय समीकरण की बात करें तो एससी/एसटी वोटर्स यहां सबसे ज्यादा लगभग 32 प्रतिशत हैं. इस इलाके में 18 प्रतिशत सवर्ण, 26 प्रतिशत ओबीसी जबकि 24 प्रतिशत अन्य वोटर्स हैं जिनमें मुस्लिम और जैन मुख्य रूप से शामिल हैं.

ग्वालियर-चंबल संभाग की ही तरह बुंदेलखंड में ज्यादातर सीटों पर जातीय समीकरणों के आधार पर पार्टियां टिकट बांटती हैं और वोटर्स भी इसी के आधार पर वोटिंग करते हैं. इस इलाके में बड़ी तादाद में एससी/एसटी वोटर्स होने के चलते बसपा भी ज्यादातर सीटों पर तीसरे नंबर की पार्टी रहती है. यहां की कई सीटों जैसे छतरपुर और निवाड़ी में यादव वोट भी हैं जिसके चलते सपा का भी प्रभाव जबरदस्त है. निवाड़ी तो राज्य का 52वां जिला भी बन चुका है. लेकिन इस सीट पर सपा से विधायक रह चुकीं मीरा दीपक यादव का काफी दबदबा बताया जाता है और इस बार उनके जीतने के भी आसार हैं.

इन 26 सीटों पर एक नजर ?

सागर

बात सागर से शुरू करें तो राज्य के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह भी यहीं की खुरई सीट से विधायक है. बता दें कि पिछले चुनाव में उनकी जीत का अंतर सिर्फ 5000 वोट ही था. इस बार इलाके के बाहुबली नेता अन्नू भैया भी टिकट के लिए लाइन में हैं. अन्नू भैया पर हत्या का भी केस दर्ज है और वह 6 महीने फरार भी रहे थे. इलाके के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि भूपेंद्र सिंह के काम से लोग खुश नहीं हैं, ऐसे में कांग्रेस की तरफ से मजबूत उम्मीदवार के खड़ा होने से बीजेपी के लिए चुनाव काफी मुश्किल हो सकता है.

सागर जिले में कुल 8 विधानसभा सीटें हैं. सुरखी से भी बीजेपी की पारुल साहू विधायक हैं जो सिर्फ 141 वोट के अंतर से ही जीतकर आई थीं. यहां से कांग्रेस सिंधिया खेमे के नेता गोविन्द सिंह राजपूत पर अपना दांव खेल सकती है.

बीना आरक्षित सीट है यहां से बीजेपी के महेश राय विधायक है. इस सीट पर आंदोलन और बसपा के कैंडिडेट के आने से बीजेपी के हिस्से आने वाले कुछ एससी वोट कम हो सकते हैं. देवरी से कांग्रेस के हर्ष यादव विधायक हैं लेकिन इस बार लोधी वोट एक होने से बीजेपी की स्थिति ज्यादा मजबूत बताई जा रही है. रहली, नरयावाली सीटें बीजेपी के पास है लेकिन यहां उसकी स्थिति थोड़ी कमज़ोर हुई है. नरयावली आरक्षित सीट है और गोपाल भार्गव यहां से विधायक हैं.

प्रदीप ने मंत्रिमंडल के विस्तार के दौरान काफी हंगामा किया था जिससे उनका टिकट इस बार काटा जा सकता है, लेकिन इससे इलाके के एससी वोटबैंक के नाराज़ हो जाने का खतरा है. सागर सीट से बीजेपी के शैलेन्द्र जैन विधायक हैं और जैन वोटर्स के सपोर्ट के चलते उनकी स्थिति काफी मजबूत है. हालांकि सपाक्स का दावा है कि शहरी इलाकों की सीटों पर उसे काफी जनसमर्थन मिल रहा है. स्थानीय पत्रकार राज नारायण सिंह इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते उनका मानना है कि सपाक्स का विरोध सिर्फ ब्राह्मणों तक ही सिमटकर रह गया है इसका इधर असर नाम-मात्र का ही होगा.

टीकमगढ़

इस जिले में कुल पांच सीटें हैं. टीकमगढ़ से बीजेपी के केके श्रीवास्तव विधायक हैं जिन्होंने पूर्व मंत्री यादवेंद्र सिंह हो हराया था. इस सीट पर टिकट को लेकर बीजेपी में फूट की स्थिति बताई जा रही है और इसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. जतारा आरक्षित सीट है और यहां से कांग्रेस के दिनेश कुमार अहिरवार विधायक हैं. फ़िलहाल एससी/एसटी आंदोलन के बाद बसपा के साथ कांग्रेस यहां मजबूत बताई जा रही है. पृथ्वीपुर की बात करें तो यहां से बीजेपी की अनीता सुनील नायक विधायक हैं लेकिन रामनरेश यादव की पुत्रवधु रौशनी यादव की दावेदारी से मुकाबला रोचक होता नज़र आ रहा है. यहां बीजेपी से ही गणेशी नायक भी टिकट मांग रहे हैं.

निवाड़ी में इस बार सपा काफी मजबूत नज़र आ रही है. खरगापुर फिलहाल कांग्रेस के पास है लेकिन सवर्ण आंदोलन ने सारे जातीय समीकरणों को बदल दिया है. लेकिन बीजेपी का अंतर्कलह और सवर्ण आंदोलन पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं. यहां कई सीटों पर दोनों ही पार्टियां टिकट बदल सकती हैं.

छतरपुर

छतरपुर जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 5 पर बीजेपी जबकि 1 पर कांग्रेस का कब्ज़ा है. यहां बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस गुटबाजी की शिकार है. एक गुट पूर्व राज्यसभा सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी और उनके बेटे का है तो वही दूसरा गुट उनके ही भाई आलोक चतुर्वेदी उर्फ़ पज्जन भैया का है. दोनों के पारिवारिक रिश्ते ख़राब होने के चलते कांग्रेस 2 खेमों में बंटी हुई है.

यहां लगातार दो बार से बीजेपी की ललिता यादव विधायक हैं, जो कि मंत्री भी हैं. वह पिछली बार यहां से सिर्फ 2217 वोट से कांग्रेस के आलोक चतुर्वेदी को हरा पाई थीं. हालांकि मेडिकल कॉलेज का बिल कैबिनेट से पास करवाना उनकी बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. महाराजपुर सीट भले ही बीजेपी के पास हो लेकिन यहां बसपा का भी काफी वोट बैंक है, इस बार भी यहां बीजेपी से मानवेंद्र सिंह की उम्‍मीदवारी मजबूत है लेकिन पुष्पेन्द्र नाथ पाठक, सूरजदेव मिश्रा ने मामला त्रिकोणीय बना दिया है. कांग्रेस लीडरशिप यहां कमज़ोर नज़र आ रही है.


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