बुंदेलखंड: अन्ना प्रथा से किसान बेहाल, केंद्र-प्रदेश सरकार बेसुध

By: jhansitimes.com
Jan 09 2018 03:23 pm
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Report -(News Editor Madan Yadav) झाँसी। बुंदेलखंड में किसानों की समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले ही बारिश होने से किसान परेशान था, अब जो रही सही फसल उसने पैदा की थी, वह भी अन्ना जानवरों के कारण खतरे में हैं। केंद्र व प्रदेश सरकार इस अन्ना प्रथा को दूर करने लिए तमाम कवायदें करने का दिखावा तो कर रही हैं, मगर इनसे निपटने केलिए कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं। 

 

बड़ी समस्या हैं अन्ना जानवर

गौरतलब है कि बुंदेलखंड के किसानों की सबसे बड़ी समस्या है उनकी खड़ी फसल को अन्ना जानवर बर्बाद कर देते हैं। इस अन्ना प्रथा को रोकने की किसी भी सरकार ने अभी तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की है। नतीजतन, यहां किसानों की मेहनत से उगाई गई फसल को आवारा जानवर चौपट करने में लगे हुए है। सैक ड़ों की संख्या में ये आवारा जानवर खेतों में झुण्ड के रूप में घुस जाते हैं और पूरी फसल चौपट कर भाग जाते हैं। इस समस्या पर न तो सरकारें ध्यान दे रही है और न ही समाज का ठेका लेने वाले समाजसेवी। 

 

पूरे बुंदेलखंड के किसान हैं त्रस्त 

उत्तर प्रदेश का सबसे बदहाल क्षेत्र बुंदेलखंड अपनी बदहाली पर आंसू बहाने के लिए मजबूर है। झाँसी, महोबा, हमीरपुर, बाँदा, चित्रकूट, जालौन, ललितपुर बुन्देलखण्ड के ये सभी जिले जहां दैवीय आपदा का दंश झेल रहे है, तो वहीं सरकारी उपेक्षा का शिकार भी हैं। दरअसल ये वो इलाका है, जहां पर पिछले कई वर्षों से सूखे की मार पड़ रही है। साथ ही अति वृष्टि और ओला वृष्टि ने भी यहां के किसानों की कमर तोड़ दी है। इस पर यदि मौसम की मेहरबानी से फसलें अच्छी होती भी हैं तो उसे अन्ना जानवर तहस-नहस कर रहे है। कर्ज से दबा किसान अच्छी फसल की राह तक रहा है। मगर जिस तरह से अन्ना जानवर फसलों का सफाया कर रहे है वो किसानों के लिए चिंता का विषय बना है। 

 

खेती चौपट होने से पलायन कर रहे युवा ग्रामीण

बुंदेलखंड के इन सातों जनपदों की बात करें तो यहां आवारा जानवरों की भरमार है। ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों को बचाने के लिए किसान रात-दिन खेतों पर पहरेदारी कर रहा है। मगर सैकड़ों की तादाद में ये जानवर सडक़ से लगे खेतों को तबाह करने में जुटे हुए है। अन्ना प्रथा बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आई हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार बुंदेलखंड की इस समस्या से वाकिफ भी है। मगर उनके पास इसके निदान के लिए न तो कोई योजना है और न ही स्थायी समाधान का कोई विकल्प। परिणामस्वरूप यहां का किसान अब खेती-किसानी से मुंह मोडऩे के लिए विवश है। ग्रामीण क्षेत्र के नौजवान रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं और कर्जदार आत्महत्या। 

 

दैवीय आपदा हो घोषित

किसान नेता गौरीशंकर विदुआ तो अन्ना जानवरों से होने वाले नुकसान को ओलावृष्टि, अतिवृष्टि जैसी दैवीय आपदा घोषित करने की मांग करते हैं। उनका कहना है कि सरकारें बुंदेलखंड की इस आपदा से निपटने की कोई ठोस योजना नहीं बना रही, बल्कि किसानों को ही इसके लिए दोषी ठहरा दिया जाता है। उन्हें कहा जाता है कि वे अपने  जानवर बांध कर रखें, खुला न छोड़ें। ये  जानवर तो फिर भी बंधे रहेंगे, मगर जंगल के जानवरों पर किसान कैसे नियंत्रण करेगा। यह विचारणीय प्रश्र है। उन्होंने सरकारों से अन्ना प्रथा पर पूर्णतया काबू पाने के लिए सकारात्मक व ठोस पहल करने की मांग की, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का फल अच्छी फसल के रूप में मिल सके और वे इस आपदा से छुटकारा पा सकें। 

 

 

 


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