बुंदेलखंड: अब नहीं होती घर-घर फाग, डीजे और म्यूजिक सिस्टमों ने ली फाग की जगह

By: jhansitimes.com
Mar 01 2018 06:03 pm
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झाँसी। दौर बदला, तो होली को मनाने के तौर-तरीके भी बदल गए। फाग और ढोलक की थाप की जगह अब गली नुक्कड़ व चौराहों पर डीजे की गूंज सुनाई देने लगी।  धीरे-धीरे होली के प्रमुख गीत, फाग गायन विलुप्त होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि नगरीय क्षेत्र की बात छोड़ ही दीजिए। अब फाग गायन गांवों में भी मुश्किल से ही सुनाई देता है।

 बुन्देलखंड में होली के अवसर पर हुरियारे  फाग गाते हुए देखे जा सकते हैं। इसलिए यहां की होली भी ब्रज की होली से कम नहीं होती। होली का हुड़दंग रंगपंचमी तक जमकर चलता है। क्या गांव और क्या शहर। चारों ओर ढोलक की थाप और फाग की गूंज सुनाई है। सांस्कृतिक संगठन कार्यक्रम आयोजित कर होली मिलन समारोह करते हैं और इसमें फगियारे और लोक गायक जब फाग गाते हैं तो समां देखते ही बनता है। लेकिन बदलते दौर में फाग गायन  विलुप्त सा हो गया है। स्थिति यह है कि कभी द्वार-द्वार होने वाली फाग, अब शहर और गांवों में बमुश्किल ही सुनाई देती है। फाग गायन से जुड़े लोगों का मानना है कि आज मनोरंजन के अधिक संसाधन विकसित होने एवं युवा पीढ़ी का फाग गायन के प्रति रुचि न लेने के कारण फाग की दुर्दशा हो रही है। युवा पीढ़ी फाग गायन के लिए आगे नहीं आ रही है। स्थिति यह है कि अब होली पर फाग की जगह फिल्मी गीतों की गूंज डीजे के माध्यम से सुनाई देती है।

इस संबंध में लालजी चौधरी बताते हैं कि आज की युवा पीढ़ी टीवी, सिनेमा और मोबाइल में उलझी हुई है। उसे न तो त्योहार में रूचि है और न ही रस्मों में। टीवी, डीजे का चलन बढऩे से अब फाग गायन विलुप्त हो रहा है। स्थिति यह है कि युवा पीढ़ी में इस कला को सीखने की ललक नहीं है। जो फाग गायक बचे हैं, तभी तक यह परंपरा चल रही है। पहले फाग के गीतों पर आधारित किताबें आती थीं, अब वह भी बाजार से गायब हो गई हैं।

उधर, गोपाल त्रिपाठी का कहना है कि पहले मनोरंजन का कोई साधन नहीं था। मनोरंजन के साथ रस्म की अदायगी के लिए मोहल्ला-मोहल्ला फाग का गायन होता था। दौर बदलने के साथ ही मनोरंजन के साधन बढ़े हैं, मोबाइल, टीवी, सिनेमा युवा पीढ़ी का मनोरंजन कर रही है। युवा पीढ़ी दिलचस्पी नहीं ले रही है, इस कारण इस प्रथा का भविष्य अंधकार में है।

बुंदेलखंड में झाँसी के हरगोविंद कुशवाहा, डॉ.धन्नूलाल गौतम व अन्य ऐसे समाजसेवी हैं जो यदा-कदा कार्यक्रमों में फाग गायन शौकिया करते हैं। लेकिन फाग कलाकारों की रोजी-रोटी अब इससे नहीं चलती। इसलिए होली के अलावा कभी भी इस लोक कला को सुनने का मौका नहीं मिलता। ऐसे में आने वाले समय में फाग गायन लगभग समाप्त होने की कगार पर है। 


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