बच्चों की अतिसक्रियता भी खतरनाक, स्लीप एप्निया रोग का खतरा

By: jhansitimes.com
Jul 11 2018 06:04 pm
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रिर्पोट - प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, नई दिल्ली। विगत कुछ सालों में बच्चों में अति सक्रियता के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जो स्लीप एप्निया को जन्म देती है। अमेरिका के अटलांटा में रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक बच्चों के बीच ध्यान घटने और अति सक्रियता विकार (एडीएचडी) की समस्या देश में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अधिक वजन और मोटापा भी इस बीमारी के मुख्य कारणों में से एक है। 

आम तौर पर अतिसक्रिय बच्चे जब क्लिनीक में जाते हैं, तो उनके मनौवैज्ञानिक इलाज पर ध्यान दिया जाता हैं। जबकि समस्या दूसरी ओर रहती है। बच्चों के सांस नली में नींद के दौरान बाधा उत्पन्न होती है, जिसके परिणाम स्वरूप वह सोते समय ठीक से सांस नहीं ले पाते हैं। सामान्य तौर पर इस बीमारी से पीड़ित वयस्क नींद की कमी के कारण सुस्त हो जाते हैं, लेकिन बच्चे इस मामले में ज्यादा संवेदनशील होते हैं। वह अतिसक्रियता के कारण न तो ठीक से सो पाते हैं और न ही सही तरीके से एकाग्र हो पाते हैं। बच्चों को नींद की दवा देने के से उनके स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव पड़ता है।  

गुड समरिटिन अस्पताल के डॉ नागा सिरिकोंडा नींद की स्क्रीनिंग की आवश्यकता पर जोर देते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में इलिनोइस राज्य के मिट वेरनॉन स्थित अस्पताल में डॉ सिरिकोडा एक पल्मोनोलाॅजिस्ट एंड क्रिटिकल केयर फिजिशीयन है। वे आईसीयू के मेडिकल डायरेक्टर हैं, जहां अक्सर नींद की स्क्रीनिंग करनी पड़ती है। स्कूलों में प्रारंभिक और किंडरगार्टन के साथ ही सभी स्तरों पर प्रदर्शन का बढ़ता दबाव, वीडियो गेम व दूसरे इंडोर गेम आदि एटिविटीज बच्चों की बाहरी गतिविधियों को काफी प्रभावित करती है। इसमें भी नींद की कमी न केवल नियमित गतिविधियों को तात्कालिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि बच्चों के दीर्घकालिक व्यक्तित्व विकास को भी प्रभावित करती है। डाॅ सिरिकोंडा स्कूलों में नींद को लेकर बच्चों को जागरूक करने पर जोर देते हैं। वह कहते हैं कि बच्चों की सांस नली व टन्सिल की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। 


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