इतिहास के सागर से देवेन्द्र सिंह की रिपोर्ट, बीरबल को बेइज्जत होने से बचाने के लिए अकबर ने क्या कि

By: jhansitimes.com
Oct 05 2017 07:31 pm
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बीरबल अपने जालौन जनपद के ही मूल निवासी थे | अपनी योग्यता से अकबर के दरबार में पहुच कर उसके नौ रत्नों में शामिल हुए | इतिहासकारों ने इनका जन्म कालपी के पास एक गाँव में होना लिखा है | किसी ने गाँव का नाम नही लिखा | स्थानीय मान्यताओं और अन्य सन्दर्भों से पता चलता है कि इनका जन्म जनपद के इटौरा नामक गाँव में हुआ था | इनका नाम महेश दास था तथा जन्म १५२८ में हुआ था | इनके पिता का नाम गंगा दास और बाबा का नाम रूपधर था | 

रूपधर संस्कृत और फारसी के ज्ञाता थे तथा कवि भी थे | यह परिवार भट्ट ब्राह्मण था | पितामह के प्रभाव से महेश दास भी बृह्म नाम से कविता करने लगे | राजाओं के दरबार में कविता सुना कर धन प्राप्त करना ही इनका कार्य था |  इनके जयपुर के राजा के यहाँ रहने का विवरण मिलता है | वहीं एक बार बबंधौगढ़(रीवा) के राजा ने इनकी कविता सुनी और महेश  दास को अपने साथ ले आए | यहीं से ये अकबर के दरबार में पहुंचे | 

इनकी कविताओं से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि महेश  दास को कविराज की उपाधि प्रदान की | अपनी हाजिर जवाबी, मनोरंजक तथा विनोदपूर्ण उत्तरों से इन्होने अकबर का दिल जीत लिया | अकबर ने इनको अपने नौ रत्नों में शामिल कर लिया | महेश  दास विनोदी होने के साथ-साथ एक वीर पुरुष भी थे | अकबर कालपी के लोगों की वीरता चितौड़ के घेरे में देख चुका था | इस कारण अकबर के साथ सैन्य अभियानों में भी जाते थे | इनकी वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने महेश  दास को बीरबल की उपाधि दे कर सम्मानित किया तभी से महेश  दास का नाम बीरबल हो गया | अकबर ने बीरबल को नागरकोट की जागीर प्रदान की और वहाँ के कर्मचारियों को आदेश दिए कि बीरबल के अपनी जागीर में न रहने पर भी वहाँ की आमदनी उनको रेगुलर मिलती रहे |

१८वी सदी में छपे मासिर- अल- उमरा में लिखा गया है कि बीरबल अपनी कविता और सुखन- सनीफ़ व लतीफागोई के कारण उच्च सम्मान के हकदार बने | अकबर उनको अपना मुसाहिब- ए- दानिशदार अर्थात सही सलाह देने वाला कहता था | बीरबल की सलाह का अकबर पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह सूर्य की उपासना करने लगा | आईने अकबरी में उल्लेख है कि बीरबल ने अकबर के दिमाग में यह बात भर दी कि दुनिया की हर चीज के उदभव का कारण सूर्य ही है | मनुष्य का जीवन सूर्य पर ही निर्भर है | अबुलफजल लिखता है कि अपने राज्यरोहण के पचीसवें वर्ष में बादशाह ने सूर्य और अग्नि की पूजा शुरू कर दी | इसी कारण राज्य में रविवार को जानवरों का बध बंद कर दिया गया क्योंकि रविवार सूर्य का दिन माना जाता रहा है | इसमें कोई कोताही न हो इसलिए जानवरों की देखभाल, उनके बेचने और खरीदने के विभाग की जिम्मेदारी भी बीरबल को ही दे दी थी |

अकबर बीरबल से इतना खुश  था कि उसने उनको अपना घर जोधा बाई के महल से कुछ दूर पर ही बनवाने की इजाजत दे दी | यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि अकबर के किसी भी सरदार को यह आज्ञा नही थी कि वे अपना मकान किले के पास बनवा सकें | बीरबल का मकान जब बन कर तैयार हो गया तब उसने अकबर को अपने मकान में पधारने का निमन्त्रण दिया जिसको अकबर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | अबुलफजल ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा कि ७ बह्मन को बीरबल के महल में बादशाह को शानदार दावत दी गई | अकबर ने यह सौभाग्य अपने किसी अन्य दरबारी को नही दिया था | 

एक समय तो अकबर ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बीरबल की जान भी बचाई थी | मैदान में हाथियों की लड़ाई का खेल चल रहा था | अकबर और बीरबल भी दर्शक के रूप में मौजूद थे | तभी अचानक साकर नाम का हाथी जिसको कैदियों को कुचल कर मारने की ट्रेनिग दी गई थी अचानक ही मुड़ा और बीरबल की तरफ दौड़ा | यह देख अकबर एक घोड़े पर कूद कर चढ़ा और बीरबल तथा हाथी के बीच में आ गया | दर्शकों मे हाहाकार मच गया तभी हाथी अचानक रुक गया | इस प्रकार बादशाह ने अपनी जान की परवाह न करके बीरबल की जान बचाई | बहुत समय से अकबर की इच्छा थी कि गंगा-यमुना के संगम पर प्रयाग में एक किले का निर्माण कराया जाय | काफी समय बाद उसको अपनी इच्छा पूरी करने का मौका मिला | अकबरनामा में विवरण मिलता है कि इलाहाबाद में नीव १५८३ में रखी गई यही | ह्कीदा-अल-इकालिम के लेखक के अनुसार इलाहाबाद के किले को बनवाने में उस समय दो करोड़ कुछ लाख खर्च आया था |

अकबरनामा में इलाहाबाद जाते समय अकबर के कालपी में भी रुकने आ उल्लेख है | इसके अनुसार  वह २२ अबान को कालपी पहुंचा | ब्रोकमेन के जालौन गजेटियर के अनुसार अकबर कालपी में वर्ष १५८३ में आया था | इस समय कालपी का जागीरदार मुतालिब खां था | उसने अकबर की अनेक प्रकार से खातिर की | अकबर यमुना नदी में नाव द्वारा यात्रा करके कालपी पहुंचा था | ऐसा लगता है कि अकबर की यह यात्रा कार्य के साथ मनोरंजन के लिए भी थी | यहाँ पर कालपी में यमुना के किनारे पर ही शाही शामियाना  लगा | एक जगह मुझको अकबर के टेंट के बारे में भी सूचना मिली थी वह आपसे साझा करता हूँ कि अकबर का शामियाना  कैसा होता था |- 

Akbar’s tours required elaborate preparations. It was a vast canvas city that they erected for him while on circuit-not a dhobikhana such as the western tents imply but tents made of cloth of variegated colours, printed and dyed, worked with floral designs, richly embroidered with gold and silver lace, hugh dewan-khanas, private apartments, bed-rooms, apartments for ambassadors, for Amirs and personal attachees, servants-male and female, begums, Ibadat khanas, officers,-all with partitions, doorways and windows, upper stories, domes and domelets, akylight on pillars forty yards high held together by 14 ropes. Finally Sehat Khanas which was the name to Paikhanas or latrines.

मेरे फेसबुक मित्र श्री अनूप शुक्ल की महत्वपूर्ण पोस्ट आई जिसमे उन्होंने कहा कि बीरबल का जन्म घाटमपुर के पास एक गाँव में हुआ था। इसके प्रमाण में उन्होंने कवि भूषण की कविता और कुछ दस्तावेज भी साझा करे | एक बात और भी पहले ही कह देना चाहता हूँ कि अनूप शुक्ल जी की बात को सहज में ही टाला नही जा सकता है | बड़े गंभीर शोधार्थी हैं और कानपुर के इतिहस के बारे में उनके कहे को काटने की हिम्मत बड़े बड़े इतिहासकार भी नही कर पाते है | शुक्ल जी ने जो कहा है वह मैंने भी पहले ही पढ़ रखा था | इसीलिए मैंने पोस्ट में कहा था कि बीरबल के बारे में जिस किसी को और कुछ मालूम हो शेयर करे | इसीलिए मैंने भी लिखा कि मान्यता है कि बीरबल का जन्म कालपी के पास इटौरा में हुआ था | यह नही कहा कि इटौरा में ही  हुआ था | मेरे कहे और शुक्ल जी की कही बातों में कुछ बातें बिलकुल एक ही है | 

वह भी कहते हैं कि बीरबल का जन्म इलाहबाद सूबे की कालपी सरकार में हुआ था | उनके अनुसार घाटमपुर के पास एक गाँव में हुआ था जिसके लिए वे भूषण कवि की एक रचना को पेश करते है जिसमे कवि भूषण कहते है कि उनका जन्म और बीरबल का जन्म एक ही गाँव में हुआ था | घाटमपुर के पास एक गाँव भी है जिसका नाम बीरबर है तथा वहाँ पर एक भवन भी है जो बीरबल का कहा जाता है |तो आगे इस पर शोध तो बनता है | अब दूसरी बात पर आता हूँ जो मैंने कही थी कि बीरबल पर कालपी मे मुसीबत आई | इस मुसीबत और बीरबल को इस लिए लिख रहा हूँ कि इससे बीरबल का इटौरा से संबंध कुछ हद तक जुड़ता है |

मै पहले ही लिख चूका हूँ कि अकबर की इस यात्रा में इलाहबाद के किले की नीव रखने के साथ साथ मनोरंजन का भी पुट  था | इसी कारण यात्रा नाव से की गई | और इसी कारण उसके नव रत्न भी इस यात्रा में उनके साथ नजर आते हैं |  इस दल में बहुत से ऐसे सभासद थे जिनको बीरबल फूटी आँख भी नही सुहाता था उनकी हरचंद बीरबल को नीचा दिखाने की कोशिश  रहती थी | इनको मालुम था कि बीरबल इटौरा के थे तथा उनके परिवार वालों की माली हालत अच्छी नही है | अतः उन्होंने अकबर से कहा कि बीरबल का पैतृक  स्थान पास ही है सरकार जब यहाँ तक आ ही गए हैं तो बीरबल के घर तक चल कर उनको सौभाग्य प्रदान करें | अकबर दुविधा में नही करता है तो बीरबल की बेइज्जती और अगर जाता है तो बीरबल की बेइज्जती तय क्योंकि खातिर ठीक से नही होगी | 

अंत में अकबर ने कहा ठीक बीरबल को यह सौभाग्य मिलना ही चाहिए ,चलते हैं | अगले दिन अकबर का कारवां इटौरा के लिए चला | इटौरा की सीमा पर ही रोपण गुरु का एक छोटा सा आश्रम था | अकबर ने पूछा कि यह क्या है | कालपी के हाकिम मतलूब खां ने बतलाया कि यह रोपण गुरु का आश्रम है | अकबर पढा लिखा बिलकुल नही था लेकिन जिज्ञासु था और हर धर्म के जानने के बारे में हमेशा उत्सुक रहता था | उसने उनसे मिलने का निश्चय किया और उनका दल रोपण गुरु के आश्रम में रुका |

गुरु रोपण के बारे में कहा जाता है कि इनका जन्म संवत १५४० में डाउडीया खेरा (उन्नाव) के राजकुल में हुआ था बचपन से ही रोपण आध्यात्मिक प्रवृति के थे। इस कारण राज छोड़ कर तप करने हेतु कालिंदी के तट पर पहुच गए | वहाँ उन्होंने समाधि लगाई और ज्ञान प्राप्त किया | हस्त लिखित ग्रन्थ प्रणाम विलास जो संवत १९४० में लिखा गया से इनके बारे में पता चलता है |

रोपण नाम राज कुल आही / बसे डोडीया खेरे माहि |

राज छोड़ कर तपे सिधाए / सुरुगुर भूमि निकट तब आए |

कानन दीख तहां अति पावन / है तप भूमि अधिक मन भावन |

निसिदिन हरी दर्शन की आशा ? राजेपुर में कीन्हो बासा |

बहुत वर्ष बीते यह भांती / जात न जाने दिन ओं रती |

पहुचे ऊखल कालहिं जाई / मन में सुमरत कुंवर कन्हाई |

प्रात भये कालिंदी तीरा / मज्जन किन गई तन पीरा |

आसन बैठ ध्यान हरी कीन्हा / रूप चतुर्भुज चित धरि लीन्हा |

उनकी तपश्या से प्रभु प्रशन्न हुए और उनको गुरु मन्त्र दिया | उसी ग्रन्थ में लिखा गया है|

पुनि हरि कहा मांग बर लहू / रोपण कहा निज भक्तिहि देहू |

रोपण गुरु तब नाम प्रकाशा / निरंजन की कर पूर्ण आशा |

अकबर और रोपण गुरु की मुलाकात इटौरा में हुई और ऐसी हुई कि किसी को समय का ज्ञान ही नही रहा | खाने पीने का समय निकल गया | गुरु के यहाँ प्रसाद के रूप में सबको मालपुआ खाने को मिला | इतना स्वादिष्ट मालपुआ अकबर ने कभी खाया नही था और न ही उसका नाम ही जनता था | उसने बीरबल से इसका नाम पूंछा | अब बीरबल तो बीरबल सीधे जवाब देने से रहे | एक पहेली ही में जवाब दिया | उसकी पहली लाइन याद नही आ रही है | दूसरी लाइन ही याद आ रही है वह कुछ इस प्रकार थी | बिन बेलन यह बेला है / कहे बीरबल सुने अकबर यह भी एक पहेला है | पहली लाइन में इसके मीठे गुण के बारे में कहा गया था और दूसरे में यह बतलाया गया कि इसको बेलन से बेल के गोल नही किया गया है | सत्संग इतनी देर चला कि बीरबल के घर जाने का समय ही नही बचा | मै समझ नही पा रहा हूँ कि क्या अकबर ने जानबूझ कर इतनी देरी की कि बीरबल के घर जाने का समय निकल जाय और उसके मित्र की इज्जत बच जाय | अकबर जब बीरबल की जान बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल सकता था तो इज्जत बचाने के लिए कुछ भी कर सकता था |

चलते समय अकबर ने रोपण गुरु से कहा कि मै आपके लिए कुछ करना चाहता हूँ, आज्ञा करें | तब रोपण गुरु ने कहा कि पानी की कमी है एक तालाब बना दें तो ठीक रहेगा |  इस पर अकबर ने कहा ता लाब तो बनेगा ही आपके लिए एक मन्दिर भी सरकारी खर्चे से बनेगा |

प्राणी विलास में इसका भी उल्लेख है | देखिए

संवत सोरा सौ ऋष नयना / क्रोधी मॉघ मॉस शुभ ऐना |

पुष्प नक्षत्र चन्द्र शुभ बारा / तेहि दिन आज्ञा दिन भुआरा |

करो धाम कर अब प्रारमभा/ चहु दिश शुभग लगावो खंभा |

यह कहि पुनि यक ग्राम बसवो / हमरो नाम प्रसिद्ध करावो |

शासन यही प्रकार न्र्प पाई / मन्दिर तहां बनत सो भयेउ |

चारि खण्ड तहं सुभग बनाई / चहु दिशि खम्बा दिए लगाई |

प्रतिमा बेल शीलन पर काढी / शुक पिक चातक अहि मुक ठाढ़ी |

तेहि ऊपर शुभ रच्यो बिताना / द्विज गण बैठी करहिं निज गाना |

मलयगिरी कपाट तीन किन्हें / शुभ्र गुफा के द्वार सो दिन्हें |

पुनि एक ग्राम बसाय सू दीन्हा / अकबरपुर तेहि नाम जू कीन्हा |

जालौन के गजेटियर में भी उल्लेख है कि अकबर ने इटौरा के पास एक गाँव अपने नाम से बसा कर वहाँ एक तालाब और मन्दिर का निर्माण करवाया |  इसी इटौरा को बीरबल की जन्म स्थली कहा जाता है


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