सजातीय गुंडागर्द अधिकारियों के लिए योगी सरकार के पास क्या वास्तव में है कोई इलाज

By: jhansitimes.com
May 24 2017 08:26 am
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(K.P SINGH, EDITOR-IN-CHIEF) योगी सरकार पर जातिगत पक्षपात का आरोप बहुत गहनता से तारी है। इसके निवारण के लिए अपने एक माउथ आर्गन समझे जाने वाले अखबार के माध्यम से सरकार ने सूची जारी की है जिसमें यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि उसने जातिगत संतुलन को साधने की कोशिश की है लेकिन इसके आंकड़ों ने दूसरी स्थिति पैदा कर दी है। यह आंकड़े इस बात का इंप्रेशन दे रहे हैं कि योगी सरकार शोषित-उपेक्षित समाज के प्रतिनिधित्व के मामले में जबर्दस्त कटौती कर रही है।

उत्तर प्रदेश में 8 जोन, 15 रेंज और 75 जिले हैं। जोनल अफसरों के बारे में अपने अखबार के माध्यम से योगी सरकार ने बताया है कि उन्होंने दो  ब्राह्मण, एक ठाकुर, एक अग्रवाल और एक कायस्थ को तैनात किया है। दूसरी ओर पिछड़ी जाति एक मौर्य के अलावा एक एससी और एक एसटी अफसर को तैनाती दी है। इसके विवरण का खुलासा अखबार ने नहीं किया है लेकिन हम बता दें कि पिछड़ी जाति के अफसर के कोटे से कानपुर जोन में एडीजी अविनाश चंद्रा को तैनात किया गया है जो कि मौर्य समाज के हैं। बेशक वे शानदार अफसर हैं लेकिन उनके माध्यम से पिछड़े वर्ग का कोटा निस्तारित करके योगी सरकार ने धूर्तता की पराकाष्ठा कर दी है। जहां एक ओर वे सवर्णों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ को अलग-अलग जताकर इन जातियों से संबंधित अधिकारियों की तैनाती को लेकर अपनी निष्पक्षता का स्वांग रच रहे हैं वहीं उन्होंने साढ़े 3 लाख से अधिक जातियों वाले पिछड़े वर्ग को मात्र एक इकाई में परिभाषित कर दिया है। यह कहीं से उचित नहीं है। अविनाश चंद्रा बेशक बहुत अच्छे अधिकारी हैं लेकिन टेक्निकल इंवेस्टीगेशन के मास्टर माने जाने वाले राजकुमार विश्वकर्मा को किसी जोन का एडीजी बनाने की बजाय पीएसी में क्यों भेज दिया गया। क्या इसलिए कि कोटा के नाते पिछड़े वर्ग को एडजस्ट करना था इसलिए योग्य न होते हुए भी अविनाश चंद्रा को मजबूरी में कानपुर जोन देना पड़ा। इसके बाद जन्मजात योग्यता के सिद्धांत के नाते अन्य जोन सवर्णों के हवाले करने की योगी सरकार की मजबूरी रही।

यह दृष्टिकोण मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्श के अनुकूल तो हो सकता है लेकिन किसी उच्च मानवीय आदर्श के अनुकूल नहीं। एक अच्छी व्यवस्था के लिए सांख्यिकी के अऩुपात में अधिकारियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस लिहाज से योगी सरकार ने पिछड़े वर्गों के साथ भीषण अन्याय किया है और किसी अखबार में रुपये देकर खबर छपवाकर वह इस वास्तविकता से परे नहीं हो सकती। होना यह चाहिए था कि एडीजी जोन के स्तर पर 50 फीसदी से ज्यादा पद ओबीसी के अधिकारियों के हवाले किये जाते। योगी आदित्यनाथ को यह मालूम नहीं है कि हेमवतीनंदन बहुगुणा जाति के पंडित थे, जिनकी पुत्री रीता बहुगुणा उनके मंत्रिमंडल में शामिल हैं। उन्हीं को श्रेय है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के हर जिले में डीएम या एसपी में से किसी एक पद पर अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के अधिकारी की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया था। इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये थे। अनुसूचित जाति के जिन अधिकारियों को मौका दिया गया उनमें से कई अधिकारी बहुत ही सुपर साबित हुए। जैसे कि इन पंक्तियों के लेखक के अग्रज तुल्य मित्र कालका प्रसाद जिन्हें इंदिरा गांधी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए 4 साल तक रायबरेली का कलेक्टर रखा। नो डाउट कालका प्रसाद जी का किसी पार्टी की सरकार हो, लोगों का विश्वास अर्जित करने में कोई मुकाबला नहीं था। उन्होंने यह साबित किया कि अनुसूचित जाति के अधिकारी दोयम दर्जे के नहीं हैं बल्कि किसी भी सवर्ण से ज्यादा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की क्षमता उनमें है और यह सही भी है।

ओबीसी के अधिकारियों को लेकर भी यह बात असंदिग्ध रूप से कही जा सकती है। मुलायम सिंह पर यादवों को जरूरत से ज्यादा तरजीह देने का आरोप लगा है। हो सकता है कि इसमें कमोवेश कुछ सच्चाई हो, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि कम से कम इन पंक्तियों के लेखक जैसे लोग जानते हैं कि पुलिस में ज्यादातर यादव निष्पक्षता, संबंधों का निर्वाह करने और लालचविहीन फैसले लेने में सबसे अग्रणी रहे हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने उत्तर प्रदेश में ओबीसी में पहले आईपीएस स्वर्गीय बीएल यादव को देखा है। जिनके अंतिम समय तक सर्वोच्च सलाहकार हम रहे जबकि हम न तो उनकी जाति के थे और न ही किसी अन्य तरीके से उनसे हमें कोई लाभ होता था। उन्हें एक समय मुलायम सिंह यादव ने बहुत प्रमोट किया इसलिए नहीं कि वे मुलायम सिंह की गणेश परिक्रमा करते थे बल्कि मुलायम सिंह खुद उनकी तारीफ के मुरीद हो गये थे। पर उन्होंने मुलायम सिंह का भी कोई गलत काम करना गवारा नहीं किया। सही बात तो यह है कि अगर वे यादव न होते और उनके पिता हिस्ट्रीशीटर न होते तो वे अपने बैच के सबसे टॉपर आईपीएस होते। बीएल यादव का उदाहरण इसलिए दिया जाना समीचीन है कि मुलायम सिंह के उत्कर्ष काल में अगर यादवों को प्रमोट किया गया तो सिर्फ इस वजह से नहीं कि उसके पीछे जातिवाद था। सही बात यह है कि यादवों की कार्य कुशलता और निष्पक्षता भी बेजोड़ थी।

इन पंक्तियों के लेखक को यह भी याद है कि मुरली मनोहर जोशी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा में जालौन जिले के डकोर क्षेत्र में पथराव हो गया था। जिसकी वजह से डकोर के तत्कालीन थानाध्यक्ष भगवान सिंह यादव को निलंबित कर दिया गया था लेकिन कल्याण सिंह सरकार के उस समय के मंत्री स्व. बाबूराम एमकॉम ने उन्हें बहाल कराने के लिए जबर्दस्त लड़ाई लड़ी। दरअसल भगवान सिंह यादव उस मिट्टी के बने थे कि वे न मुलायम सिंह का कोई काम कर सकते थे और न बाबूराम का, लेकिन बाबूराम उनकी उसी निष्पक्षता के कायल थे। हाल ही में वतन की सरहदों के लिए जीवन का बलिदान करने वालों में एक नाम आयुष यादव का सामने आया। आयुष के पिता एके यादव लंबे समय तक जालौन जिले में पोस्ट रहे और इन पंक्तियों के लेख के बेहद नजदीकी मित्र थे। एके यादव इतनी ठुर्ऱस वाले थे कि उन्होंने मुलायम सिंह के राज में यादव होने के आधार पर मलाईदार पोस्टिंग लेना कभी गवारा नहीं किया। उन्होंने कभी चाहा कि उनको बेहतर थाना मिल जाये तो उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से अपनी सिफारिश करायी। सही बात तो यह है कि लंबे समय तक निष्पक्ष जांच के लिए लोग अपने ज्ञापनों में किसी न किसी यादव अधिकारी का नाम लिखते थे, इसलिए इससे ज्यादा धूर्तता और लफ्फाजी कोई नहीं हो सकती कि आज अखिलेश यादव के यादव राज को प्रशासन में संतुलित करने के लिए व्यापक जातीय प्रतिनिधित्व की कोई नीति बनाई गई है। योगी सरकार की नीति ओबीसी और अनुसूचित जाति के प्रतिनिधित्व को न्यून करने की है।

18 रेंज में तीन ब्राह्मण, चार ठाकुर, दो कायस्थ, एक वैश्य और एक जैन को तैनात किया गया है जबकि पिछड़ी जाति के नाम पर केवल एक यादव, एक सुनार, एक तेली, एक मौर्य और दो अन्य से काम चला लिया गया है। यह पक्षपात की बहुत खराब बानगी है। इसी तरह 75 जिलों में योगी ने 20 ब्राह्मण, 13ठाकुर, एक वैश्य, एक कायस्थ और एक भूमिहार को तैनात कर दिया है। दूसरी ओर पिछड़े वर्ग के अधिकारियों की जिलों में तैनाती बहुत कम मात्र 21 है। योगी सरकार का यह रवैया न तो दूरदर्शितापूर्ण है और न ही सामाजिक न्याय की भावना के अनुकूल। इससे भी ज्यादा कहा जाये तो इस तरह का रवैया राष्ट्रवाद की भावना के सर्वथा प्रतिकूल है। राष्ट्रवाद के अनुसार यह कहा जाना चाहिए कि हर भारतवंशी जो किसी भी धर्म-जाति का हो सर्वश्रेष्ठ बहादुर और विद्वान होता है, लेकिन कोई सरकार यह झलकाये कि नहीं सारे पराक्रम का ठेका केवल ठाकुर-ब्राह्मणों में है तो उससे ज्यादा कोई देशद्रोही नहीं हो सकता क्योंकि इसी सोच की वजह से विशाल देश होते हुए भी भारत को लंबे समय तक गुलामी का दौर झेलना पड़ा।

योगी परिवार, जाति, धर्म सबसे परे होता है। आदित्यनाथ को इस धारणा को प्रमाणित करना चाहिए था लेकिन उनकी जातिवादी सोच ने भाजपा की इस मामले में साख को अनर्थ में डुबो दिया है। सवर्ण अधिकारियों में ज्यादातर जातिगत अहंकार की चरम सीमा से आप्लावित हैं। कांग्रेस में ऐसे ही लोगों का बोलबाला था। सवर्ण अधिकारी किसी जिले में केवल 40-50 लोगों को साधकर बहुत यश कमाते हुए तीन साल बाद दूसरे जिले के लिए निकल लेते थे लेकिन यह मायावती का प्रताप रहा कि उन्होंने अधिकारियों की इस मक्कारी को खत्म किया। उनके कार्यकाल में जिले, रेंज या जोन के स्तर की कोई शिकायत फटेहाल आदमी ने यह कहते हुए की कि उन्हें संबंधित अधिकारी ने बिना सुने दूसरी जगह के लिए रेफर कर दिया तो उसका बहिनजी ने तत्काल निलंबन किया। इसलिए व्यापक जनता के दुख-दर्द को सुनने के लिए नौकरशाही मजबूर हुई।

लेकिन योगी राज में ब्राह्मण-ठाकुर नौकरशाही के बोलबाले ने उनकी खटिया खड़ी करने का इंतजाम कर दिया है। जातिगत अहंकार में डूबे यह अधिकारी कांग्रेस युग की तरह केवल 40-50 लोगों को जिले में साधकर अपने आका की हुकूमत को मजबूती देने का अरमान संजोए हुए हैं। लेकिन लोकतंत्र में यह दृष्टिकोण बेहद घातक है क्योंकि जब बहुमत समाज उपेक्षित और पीड़ित होगा तो उसका व्यवस्था से मोहभंग हो जाएगा और नक्सलपंथ जैसी किसी विचारधारा का पनपना बगावत के नाते उसमें आवश्यक होगा।

सबसे गंभीर बात यह है कि योगी सरकार के अहंकारपूर्ण शक्ति प्रदर्शन की वजह से उसके सरपरस्तों में भी वितृष्णा का भाव पनप रहा है। योगी के सजातीय अधिकारी गुंडागर्द मानसिकता से कार्य करने पर आमादा हैं। उनका मामला यादवों जैसा नहीं है जो हो सकता है कि मुलायम और अखिलेश राज में सजातीय होने के नाते प्राइम पोस्टिंग पा जाते हों लेकिन उनका विश्वास सभी को साथ लेकर चलने में था। दूसरी ओर योगी के सजातीय अधिकारी परम स्वतंत्र न सिर पर कोई की भावना के तहत आम जनता से लेकर दलित, शोषित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के दमन में जुट गये हैं। इसकी प्रतिक्रिया अंदर ही अंदर बेहद जबर्दस्त हो रही है। 2019 के बाद प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी संजो रहे योगी आदित्यनाथ में अगर यही हालात बरकरार रहे तो उन्हें गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ेगा। काश सीएम योगी को इस बात का अहसास हो सके और वे अपने बेलगाम गुंडे सजातीय अधिकारियों पर अंकुश लगा सकें।


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