नये डीजीपी ओपी सिंह की कारगर लाबिंग, जानिये पूरी कहानी

By: jhansitimes.com
Jan 24 2018 06:59 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) उत्तर प्रदेश में डीजीपी की कुर्सी को लेकर 20 दिनों तक अटकलों का बाजार गर्म रहा। आखिर में सीएम योगी की इच्छा का सम्मान करते हुए केंद्र सरकार ने उनके द्वारा नामित ओपी सिंह को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल सीआईएसएफ के डीजी पद से मुक्त कर दिया। जिसके बाद उन्होंने मंगलवार 23 जनवरी को कार्यभार ग्रहण कर लिया। वैसे उनके साथ सिर मुंड़ाते ही ओला पड़ने की स्थिति पेश है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ताबड़तोड़ तीन डकैती और सहारनपुर व मथुरा में सामने आये प्रसंगों ने मुख्यमंत्री का पारा गर्म कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में लगातार हुई वारदातों को आधार बनाकर प्रदेश की राजधानी के चंबल बन जाने का तंज कसा जिससे मुख्यमंत्री योगी तिलमिला गये। जिस दिन ओपी सिंह कार्यभार ग्रहण करने डालीबाग स्थित अपने दफ्तर जा रहे थे उसी दिन मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिव गृह और पुलिस के आला अफसरों को तलब करके उनकी लंबी क्लास ले डाली।

31 दिसम्बर 2017 को प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी सुलखान सिंह रिटायर हो गये थे। हालांकि उनकी नियमित सेवा निवृत्ति गत वर्ष सितम्बर के महीने में ही प्रस्तावित थी लेकिन राज्य सरकार ने इसके पहले उनका कार्यकाल 6 माह बढ़ाने की संस्तुति केंद्र में भेज दी। इस संस्तुति को भी केंद्र सरकार ने काफी झुलाया, लटकाया था लेकिन बाद में तीन महीने का सेवा विस्तार दे दिया। चर्चा थी कि इसके बाद 31 दिसम्बर के पहले प्रदेश सरकार फिर एक बार सुलखान सिंह के सेवा विस्तार का प्रस्ताव भेजेगी लेकिन उसने ऐसा नही किया।

सुलखान सिंह को सेवाकाल कम होते हुए भी जब डीजीपी बनाया गया था तो वरिष्ठता का सिद्धांत लागू किया गया था। सुलखान सिंह की छवि को लेकर यह मिथक था कि वे असाधारण रूप से ईमानदार अफसर हैं। इसलिए वरिष्ठता के साथ-साथ उनका पड़ला भारी करने के लिए यह दलील भी उनके साथ जोड़ दी गई थी कि अगर उन्हें एक बार डीजीपी बनने से वंचित रखा गया तो यह संदेश जायेगा कि प्रदेश में जरूरत से ज्यादा ईमानदार अफसर डीजीपी की कुर्सी तक नही पहुंच सकता। लेकिन सुलखान सिंह जब डीजीपी बने तो उत्तर प्रदेश पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार में कोई खास कमी नही आई। इसका एक कारण यह बताया गया कि अपने कार्यकाल में सुलखान सिंह को अपने मुताबिक अधिकारियों की पोस्टिंग नही करने दी गई। लेकिन इसके कारण उन्होंनें अड़ियल रवैया अपनाया हो ऐसा भी नही है वे तो गाय बने रहे और अपराध बढ़ने का धब्बा भी उनके कार्यकाल में लगा। सेवा विस्तार के लिए 2017 के सितम्बर महीने के आखिरी सप्ताह में जिस तरह से प्रायोजित मुठभेड़े हुईं और मीडिया में उनका बढ़-चढ़ कर कवरेज कराया गया वह निजी दिलचस्पी के बिना संभव नही था। इससे लगता है कि ईमानदार होने के बावजूद अपने कैरियर को संवारने की जरूरत को उन्होंने नजरअंदाज नही होने दिया था।

उनके उत्तराधिकारी का चयन करने की जब बारी आई तो सीएम योगी ने वरिष्ठता के पैमाने को एकतरफ कर दिया। अन्यथा या तो प्रवीण सिंह डीजीपी बनते जो कि यूपी कैडर के आईपीएस अफसरों में सबसे ऊपर थे या उनके बाद और उन्हीं के कुछ महीनों पीछे रिटायर होने वाले डा. सूर्य कुमार शुक्ला जिनका सर्विस रिकार्ड देश भर के आईपीएस कैडर में सबसे बेहतर दर्ज था। सीएम योगी ने इन दोनो अफसरों को ही नही कई और अफसरों को बाईपास किया। ओपी सिंह को उन्होंने इस तर्क के आधार पर नामांकित किया कि 2019 के लोक सभा चुनाव तक उनके डीजीपी होने से उन्हें फेरबदल का कोई झंझट नही झेलना पड़ेगा क्योंकि उनका कार्यकाल 2020 तक है।

लेकिन इसके बाद ओपी सिंह की विवादित पृष्ठभूमि ने उनके साथ सीएम योगी की भी फजीहत की नौबत खड़ी कर दी। एक तो चूंकि यह कि राज्य में ही गोपाल गुप्ता जैसे पर्याप्त कार्यकाल के अधिकारी उपलब्ध होते हुए भी प्रतिनियुक्ति वाले अधिकरी का चुनाव क्यों किया गया जिसे रिलीव कराने के लिए केंद्र का मुंह ताकना पड़ा। दूसरे ओपी सिंह 2 जून 1995 को लखनऊ में एसएसपी होने के नाते मायातवी के खिलाफ हुए गेस्ट हाउस कांड में आरोपी बना दिये गये थे। जिससे उन्हें राज्य पुलिस का मुखिया बनाने पर मायावती के भड़क कर दलित वोट बैंक को भाजपा के खिलाफ उकसाने का अंदेशा था। आईबी ने इस बिंदु पर रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार का ध्यानाकर्षित करा दिया। इसके अलावा मुलायम सिंह के कार्यकाल में ओपी सिंह के लिए नोएडा में एडीजी एनसीआर का नया मलाईदार पद सृजित किया गया था जिससे सपा का ठप्पा उन पर लगा होना जाहिर था। इसे देखते हुए केंद्र ने उन्हें रिलीव करने की फाइल अटका ली। खबरें यह दी गईं कि जब ओपी सिंह का पूरा रिकार्ड योगी को पता चला तो उन्हें भी पछतावा हुआ। दरअसल ओपी सिंह का नाम योगी ने अपने मन से नही केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के दबाव की वजह से अग्रसारित कर दिया था जो उन्हें षड़यंत्र का शिकार बनने का कारण बन गया। इसलिए योगी के सामने ओपी सिंह के विकल्प के रूप में प्रवीण सिंह और सूर्य कुमार शुक्ला के अलावा आरआर भटनागर, गोपाल गुप्ता, रजनीकांत मिश्रा से लेकर भावेश कुमार सिंह तक के नाम लाये गये। इन चर्चाओं के बीच दिन बीतते गये। देश के सबसे बड़े सूबे की पुलिस जब एक पखवारे तक बिना मुखिया के काम करने को मजबूर रही तो मीडिया में योगी सरकार की काफी छीछालेदर नजर आने लगी। इस बीच ओपी सिंह लाबिंग करते रहे जिसका नतीजा यह रहा कि मायावती का एक भी बयान उनके खिलाफ नही आया। सपा की ओर से बयान आने का सवाल नही था। सीएम योगी को उन्होंने यह समझवा दिया कि इतने दिन बाद सिफारिश बदली तो संदेश यह जायेगा कि केंद्र में उनकी कोई हैसियत नही है और उनकी हेठी हो जायेगी। ओपी सिंह ने अपनी रिलीविंग के लिए प्रधानमंत्री खेमे को भी नरम कर लिया।

इसलिए संक्राति के बाद योगी सरकार ने उन्हें रिलीव करने का रिमाइंडर केंद्र को भेज दिया जहां वे अपना तिया-पांचा बैठा चुके थे। केंद्र ने पहले तो इस रिमाइंडर को दबाकर रख लिया। लेकिन फिर अचानक नाटकीय ढंग से खुलासा किया कि रिमाइंडर भी आया था और उन्हें रिलीव करने की मंजूरी भी दे दी गई है। ओपी सिंह ने पहले शायद मुहूर्त नही निकलवाया था। इसलिए अबकी बार उन्होंने मुहूर्त निकलवाकर अपनी ज्वाइनिंग डेट फिक्स की। वे मंगलवार को बजरंगवली के दिन लखनऊ में आये और चार्ज संभालने के बाद सबसे पहले उन्होंनें बड़े हनुमान के मंदिर में दर्शन किये। पहली पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि बदमाशों के साथ मुठभेड़ का क्रम जारी रखा जायेगा। उन्होंने पुलिस कमिश्नर सिस्टम की पैरवी की बात भी कही। पहली पत्रकार वार्ता में उन्होंने तेज-तर्रार तेवरों का प्रदर्शन किया। लेकिन असली इम्तहान के लिए अभी उनके काम शुरू करने का इंतजार करना पड़ेगा।


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