यूपी में नेतृत्व परिवर्तन के लिए सुगबुगाहट

By: jhansitimes.com
Mar 16 2018 06:20 pm
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आजमगढ़ के चर्चित पूर्व सांसद रमाकांत यादव ने गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में भाजपा की हार के बाद अपनी पार्टी को नसीहत देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के लिए तंज कसा है कि पूजा-पाठ करने वाले लोग सरकार चलाना क्या जानें। बात अकेली योगी की नही, साध्वी उमाभारती को जब मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था उस समय वहां भी चोंचलेबाजी तक उनके सीमित रहने की वजह से सरकार और पार्टी की हालत विचित्र हो गई थी। भाजपा की खुदकिस्मती रही कि हुबली के ईंदगाह मैदान में तिरंगा फहराने के मुददे पर कुछ ऐसी स्थितियां बनी कि उमा भारती ने खुद ही मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। इसके बाद शिवराज सिंह जब आये तो लोगों को कायदे से सरकार चलती दिखी और भाजपा को दीर्घकालीन सत्ता के रूप में उसका फायदा मिल सका।

सरकार अपने मूल काम बेहतर ढंग से सम्पादित करे तो अलंकारिक काम सोने में सुहागा बन जाते हैं। लेकिन मूल काम ठप्प हो तो धर्म-कर्म दिखाते रहने का कोई फायदा नही मिलता। अयोध्या में दीपावली और वृंदावन में भव्यता से होली मनाकर योगी ने जो पहल की उससे हिन्दू गर्व निश्चित रूप से फूल उठा लेकिन सरकार के मोर्चे पर किंकर्तव्यविमूढ़ता जैसे हालात के कारण अपने इन प्रयासों का वे कोई लाभ नही उठा सके जो कि उपचुनाव के परिणामों ने जाहिर कर दिया है।

योगी की सरकार को एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है। एक तो शुरूआत में उनके चयन के फैसले में ही काफी विलंब हुआ। जिससे लोगों को व्याकुल रहना पड़ा। इसके बाद उत्तर प्रदेश के लोग जो मुलायम सिंह और मायावती द्वारा कुर्सी पर बैठते ही चैबीस घंटे के अंदर ताबड़तोड़ फैसले लेने के रोमांच के आदी हो चुके हैं। उन्हें योगी सरकार के एक्शन मोड में आने का जब लंबा इंतजार करना पड़ा तभी उनमें उत्साह भंग होने लगा था। योगी ने कई दिनों तक विभिन्न विभागों का प्रजेंटेशन देखा जिसमें विभाग की प्रचलित योजनाएं और भविष्य में और बेहतरीन योजनाओं को लेकर क्या कल्पना है इसको बताया गया। इसलिए लोग मायूसी के बावजूद यह अनुमान करके सांत्वना अनुभव कर रहे थे कि कुछ दिनों बाद जब काम शुरू होगा तो बहुत व्यवस्थित तरीके से होगा जिसमें सुखद नयापन देखने को मिलेगा। लेकिन एक साल के कार्यकाल में योगी कुछ ऐसा नही दिखा सके जिससे प्रजेंटेशन की उक्त कवायद की सार्थकता महसूस की जा सके।

यहां तक कि एंटी रोमियों अभियान चलाने, खुले में मांस की बिक्री रोकने आदि जिन कामों की शुरूआत भी उन्होंने की वे भी क्षणिक रहे। यह अभियान धीरे-धीरे ठंडे पड़ गये और सब कुछ पूर्ववत हो गया। योगी ने कहा था कि वे प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगाम लगायेगें। जिससे शुरू में मुनाफाखोर स्कूल संचालक सहमें रहे लेकिन इस दिशा में उनके प्रयास जब प्रवचन से आगे नही बढ़े तो स्कूल माफिया निश्ंिचत हो गये। यहां तक कि सरकार द्वारा वित्त पोषित कोर्सो में भी अभिभावकों से बढ़-चढ़ कर नाजायज वसूली होने लगी। एक अच्छी सरकार के लिए अनिवार्य है कि उसमें पीड़ित की फरियाद पर फौरन एक्शन की व्यवस्था समाहित हो। बादशाहों तक की व्यवस्था में शासन के इकबाल के लिए इस पर ध्यान दिया जाता था इसलिए जहांगीरी न्याय इतिहास में मुहाबरे के रूप में दर्ज है। पर योगी सरकार अधिकारियों की इतनी शुभचिंतक निकली कि इस निजाम में हर फरियाद का रहस्य अरण्यरोदन बन जाने में हो रहा है। शिकायतों के सही निस्तारण की कटिबद्धता दिखाई जायेगी तो अधिकारियों की सुविधा भोगिता में खलल पड़ेगा क्योंकि सिस्टम इतना गड़बड़ है कि जन शिकायतों का ढेर लगा रहता है जिनके समाधान के लिए उन्हें बहुत हाथ-पैर चलाना पड़ सकता है। दूसरे शोषण करने वालों पर अधिकारियों को एक्शन लेना पड़ेगा जिससे उनकी दुकानदारी चैपट होगी। आखिर उनकी सुख समृद्धि अन्याय करने वालों से मिलने वाले नजराने पर ही तो टिकी रहती है। आम आदमी की तो बात छोड़िये सांसद विधायक से अग्रसारित होने वाली फरियादें भी रददी की टोकरी में डाल दी जाती हैं। क्योंकि अधिकारियों को पता है कि मुख्यमंत्री उनके खिलाफ जन प्रतिनिधियों की सुनना भी पसंद नही करेगेें और इसलिए किसी की हिम्मत नही है कि वो मुख्यमंत्री को बता सके कि आपके अफसर किस कदर मनमानी पर उतारू हैं।

आज तक इस सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं घोषित नही की हैं। बेसिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं तक की मानीटरिंग नही की जा रही है। स्कूलों में टीचरों ने जाना बंद कर रखा है। सरकारी अस्पताल में इलाज करने की बजाय सरकारी डाक्टर मरीजों को प्राइवेट नर्सिंग होम में ले जाने के लिए बाध्य कर रहे हैं। क्योंकि वे अपनी डयूटी प्राइवेट नर्सिंग होम मे  ही देते हैं अस्पताल में नही। शिक्षा और स्वास्थ्य शासन के केंद्र बिंदु है जहां ऐसा हाल हो तो पहली नजर में ही अराजक शासन की छाप नजर आने लगती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी निष्क्रियता और दिशाहीनता का आलम है। खुद सत्ता रूढ़ पार्टी के विधायक कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार का रेट हर विभाग में पहले से दुगना हो गया है। आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग, सतर्कता विभाग, भ्रष्टाचार निरोधक विभाग भ्रष्टाचार रोकने का इतना सारा तामझाम पहले भी सफेद हाथी के मानिंद था आज भी उसी हालत में हैं। अगर सरकार में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की इच्छा शक्ति होती तो इन विभागों को अभियान के स्तर पर वह सक्रिय करती।

योगी  सरकार में शासन के बुनियादी लक्षण ही गायब हैं। न प्राथमिकताएं हैं न किसी बात के लिए कार्ययोजना बनाई गई है। जिससे लक्ष्य हासिल करने के लिए एक दिशा में काम हो सके। इसलिए रमाकांत यादव ने जो कहा है उसमें कुछ गलत नही है। पूजा-पाठ भी एक ऐसी पैथी है जिससे संसार को सुखी बनाया जा सकता है। योगी इस पैथी के मास्टर हैं। इसलिए उन्हें पूजा-पाठ के माध्यम से संसार को खुशहाल बनाने का काम करने दिया जाये। शासन चलाने के लिए दूसरी पैथी के नेता चाहिए जिनका दृष्टिकोण भौतिक हो। यूपी में मुख्यमंत्री पद के लिए खाटी राजनीति की जरूरत है। जिसमें विकास, कानून व्यवस्था और स्वच्छ प्रशासन को लेकर स्पष्ट विजन हो और उसके अनुरूप गतिशील होने के लिए कार्ययोजना भी।


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