समूचे विपक्ष के नेतृत्व के लिए कांग्रेस की राह नहीं आसान, बता रहे... प्रधान संपादक के.पी सिंह

By: jhansitimes.com
Mar 19 2018 08:15 pm
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कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पीढ़ियों के बीच सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को पूर्ण किया गया। हालिया उप चुनाव कांग्रेस के खातें में कोई उपलब्धि दर्ज नही करा सकें हैं फिर भी यह माहौल बना है कि मोदी के नेतृत्व को अगले चुनाव में कारगर चुनौती दी जा सकती है। जिससे कांग्रेसी बेहद उत्साहित हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा के चुनाव भाजपा की हार की श्रृंखला में सबसे मजबूत कड़ी जोड़ेंगे और इसके बाद विपक्षी परिवार में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के नेतृत्व की स्वीकार्यता का आधार तैयार हो जायेगा।

पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणामों का वास्तविकता के धरातल पर कोई राष्ट्रीय महत्व नही है। लेकिन प्रचार के हथकंडों में माहिर भाजपा ने त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय की सफलतों को इस तरह कैश कराया जिससे राष्ट्रीय स्तर पर उसकी अपराजेयता का मिथक और ज्यादा असरदार हो सके। उसके इस मामले में निनाद ने विपक्ष के मनोबल को निम्नतम बिन्दु पर पहंुचा दिया था और अगले लोक सभा चुनाव में सत्ता में भाजपा की एक बार फिर पुनरावृत्ति के आसार लोगों को दिखाई देने लगे थे। फ्लोटिंग वोटर इस तरह की धारणाओं से चुनाव में प्रेरित हो जाते हैं जिसका अनुमान करके विपक्षी खेमा काफी हतोत्साहित था।

पर उत्तर प्रदेश के दो लोक सभा उप चुनावों के परिणामों ने राजनैतिक फिजा एकदम पलट दी है। इसमें बिहार की अररिया लोक सभा सीट के परिणाम ने भी एक और कड़ी जोड़ी। भाजपा का हिन्दुत्व कार्ड हमेशा इसलिए फेल रहता था कि यह वर्ण व्यवस्था के हावी हो जाने के डर से पिछड़ों और दलितों को सशंकित कर देता था। इस बीच सामाजिक न्याय की राजनीति बहुत धारदार रही जिससे हिन्दुत्व को व्यापक छत्री के रूप में इस्तेमाल करने के भाजपा के मंसूबे धराशायी होते रहे।

लेनि सामाजिक न्याय के आंदोलनों के गर्भ से निकले नेताओं की अवसरवादिता ने इसकी तासीर को खत्म कर दिया। सत्ता के केंद्र में आते हुए भी वे अपनी हीन ग्रन्थि से नही उबर पाये। जिससे उन्हीं कर्मकांडी विधानों ने उन्हें आकर्षित कर लिया जो उन्हें नीचा दिखाने के कारण रहे थे। चुनाव जीतने के नाम पर उन्होंने प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का धकियाकर उन्हें सिर पर चढ़ा लिया जो सामाजिक परिवर्तन में कभी भी सहयोगी नही हो सकते थे। ऐसे में वैचारिक अवलंब न रह जाने से पिछड़े और दलित तबकों को फुसलाना भाजपा के लिए आसान हो गया। गत चार वर्षों में भाजपा को इसका भरपूर फायदा मिला।

अब इनकी अक्ल फिर से ठिकाने पर आना शुरू हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनाव परिणाम बताते हैं कि बहुजन समाज अनुभव कर रहा है कि वह भाजपा का साथ देकर झांसे का शिकार हुआ है। एक बार फिर लोकतांत्रिक समाज की सही मामले में संरचना के लिए वर्ण व्यवस्था की समाप्ति को सर्वोपरि प्राथमिकता देने के महत्व को वह स्वीकार करने लगा है। चूंकि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा को 80 में से सहयोगियों समेत भारी भरकम 73 सीटों का समर्थन न मिला होता तो देश का राजनैतिक परिदृश्य दूसरा होता। भले ही केंद्र में जोड़तोड़ करके भाजपा सरकार बना लेती लेकिन वह वैसे कटटरवाद को नही अपना सकती थी जिसकी ओर इन वर्षों में अग्रसर रही है। इसलिए उत्तर प्रदेश में उसकी जमीन जरा भी दरक गई तो स्थितियां एकदम बदल जायेगीं। इसके साथ अन्य बड़े उत्तरी राज्यों में भी, जिसके कि आसार हैं भाजपा कमजोर होती है तब तो परिणाम बहुत अप्रत्याशित हो सकते हैं।

निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए यह सबसे मुफीद अवसर है। लेकिन कांग्रेस के सामने एक समस्या है अगर पार्टी की बागडोर सोनिया गांधी अपने हाथ में रखती तो कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर का मोर्चा बनना मौजूदा माहौल में मुश्किल नही होता। पर राहुल गांधी को अभी शरत पवांर, ममता बनर्जी आदि विपक्ष के बड़े नेता पचा नही पा रहे। इस बीच राहुल गांधी ने शरद पवांर के घर पहुंचकर उनसे मुलाकात करके स्थितियों को अनुकूल बनाने की कोशिश की है। इससे विपक्ष के नेताओं की मानसिकता में वे कितना परिवर्तन ला सकेगें। यह देखने वाली बात होगी।

मायावती का अहंकार इतना बड़ा था कि उत्तर प्रदेश में वे चुनौतीपूर्ण स्थिति होने के बावजूद समाजवादी पार्टी से किसी भी स्तर पर आसानी से तालमेल के लिए तैयार नही हो सकती थीं। पर अखिलेश की सामंजस्य के लिए लगातार विनम्र पहल ने उनका हृदय परिवर्तित कर दिया। उपचुनाव के परिणाम आने के बाद अखिलेश जिस तरह से उन्हें बधाई देने उनके घर पहुंचे इससे भविष्य के लिए भी दोनों दलों के बीच सदभावना में प्रगति हुई है। अखिलेश इस समय विपक्ष में सबसे सूझबूझ वाले नेता के रूप में उभरे हैं। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है उनकी फिलाहाल कोई राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नही है। इसलिए उनका साथ राहुल को मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए। वे कांग्रेस और बसपा के बीच सेतु तैयार करने में भी प्रयत्नशील होगें। उधर बिहार में तेजस्वी का साथ भी राहुल को खुले दिल से मिलेगा। हालांकि सोमवार को टीआरएस नेता और ममता बनर्जी के बीच हुई मुलाकात में तीसरे मोर्चे की ओर से ममता को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजक्ट किये जाने की सुगबुगाहट जिस तरह सामने आई है उससे लगता है कि कांग्रेस को समूचें विपक्ष के नेतृत्व के लिए अभी बहुत पसीना बहाना पड़ेगा।

इस मामले में कांग्रेस के लिए सबसे पहली जरूरत पार्टी संगठन को मजबूत करने की है। कांग्रेस के महाधिवेशन के समापन भाषण में राहुल ने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी खत्म करने और चुनाव में स्काई लैब उतारने की बजाय विचारधारा से जुड़े पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को टिकट देने जैसे जो वायदे किये हैं उससे लगता है कि वे पार्टी संगठन की कमजोरी दूर करने के लिए बहुत चितिंत हैं। हालांकि वे पहले भी संगठन को मजबूत करने के कई प्रयोग कर चुके हैं लेकिन अभी तक उनके सारे प्रयोग नाकाम रहे हैं। महाधिवेशन के समय युवा नेताओं की एक नई टीम पूरे जज्बे के साथ मैदान में कूंदी हैं। जिसका फयदा  उन्हें कितना मिलता है यह देखने वाली बात होगी। दूसरे साझेदारी के लिए तैयार हों यह तभी संभव है जब अगुवाकार की खुद की जेब पहले भारी होनी चाहिए।


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