अमेठी राजघराने की शान में गुस्ताखी भारी पड़ रही गायत्री को

By: jhansitimes.com
Jun 05 2017 08:44 am
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समाजवादी पार्टी की सरकार में सुपर मिनिस्टर का दर्जा हासिल गायत्री प्रसाद प्रजापति की सरकार बदलते ही बहुत बुरी दुर्गति हो रही है। गायत्री प्रसाद प्रजापति बीपीएल कार्डधारक थे लेकिन राजनैतिक उद्योग उन्हें ऐसा फला-फूला कि वे अरबपति बन गये। फिर भी कल तक उनका कोई बाल बांका करने वाला नहीं था। लेकिन पाप सिर पर चढ़कर बोलता है इसलिए रेप कांड में फंसकर गायत्री प्रसाद प्रजापति जेल पहुंच गये और इस बीच सूबे में निजाम बदल गया। जिससे दौलत के सहारे न्याय को खरीदकर कानूनी घेराबंदी से मुक्ति पाने की उनकी कोशिशें नाकाम होती गईं। नई राज्य सरकार की मजबूत पैरवी के चलते उन्हें जमानत देने वाले जज का निलंबन हो चुका है। विवेचना में उन्हें रियायत देने वाले दो सीओ अमिता सिंह और अविनाश कुमार मिश्रा पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है। निश्चित रूप से गायत्री प्रसाद प्रजापति का गुनाह बहुत घिनौना था इसलिए उन्हें कड़े से कड़े दंड की दरकार लोगों को थी। लेकिन फिर भी मायावती के जमाने में बसपा के दो विधायकों को उनके गुनाह के लिए सजा दिलाने का कानून के राज के मजबूत खंभा गाड़ने में जो योगदान रहा था वैसा प्रभाव गायत्री प्रजापति की घेराबंदी से पैदा नहीं हो पा रहा है।

योगी सरकार का जो समग्र आचरण है उसे देखते हुए यह सवाल कहीं न कहीं उठना लाजिमी है कि अगर गायत्री प्रसाद प्रजापति समाज जैसी दबी-कुचली जाति के न होते और इसके बावजूद उन्होंने अपने जलवे के समय अमेठी राजघराने का जलवा फीका करने की हिमाकत न की होती तो क्या इस तरह यह सरकार उनके पीछे सतुआ बांधकर पड़ जाने की सोच सकती थी। यह सवाल इसलिए है कि योगी की घोषणावीर सरकार ने अमल में ढीलेपन के सारे रिकार्ड तोड़ दिेए हैं। सपा सरकार पर गुंडागर्दी को संरक्षण देने का बहुत आरोप लगता था और इसे अपराध बढ़ने की मुख्य वजह माना जाता था। लेकिन इस मुद्दे से जुड़े कुछ और पहलू भी रहे जो सपा सरकार की तस्वीर का दूसरा रुख भी देखने को अब मजबूर करते हैं।

सपा सरकार के समय कानपुर जोन के आईजी आशुतोष पांडेय थे। निश्चित रूप से सैफई घराने का वरदहस्त उन पर था जिससे उनकी कार्यशैली में भरपूर आत्मविश्वास की झलक थी, लेकिन नकारात्मक अर्थ में नहीं उन्होंने भरोसे का नंबर की एक योजना चलाई थी। इस पर कोई वॉयस मेल, एसएमएस अथवा सीधे कॉल के जरिये अपनी शिकायत दर्ज कराता तो 24 घंटे में ही एक्शन शुरू हो जाता था। एक्शन भी लगभग निष्पक्ष होता था। सपा सरकार में दरोगा और सिपाही तक सीधे अखिलेश, शिवपाल और रामगोपाल तक पहुंच रखते थे। फिर भी किसी की मजाल उस दौरान यह नहीं हुई कि भरोसे के नंबर से संदर्भित की गई शिकायत को नजरंदाज कर दे। पुलिस वालों पैसा भी ले लिया होता था तब भी अगर पीड़ित सही हुआ तो काफी हद तक उसकी मदद करने के लिए पुलिस तंत्र अपने को मजबूर पाता था।

सैफई परिवार से किसी अधिकारी के रिश्ते थे, इस आधार पर उसकी सारी खूबियां निरस्त नहीं हो जातीं। लेकिन आशुतोष पांडेय जिनका बेहतर इस्तेमाल पुलिस व्यवस्था में लोगों का भरोसा जगाने के लिए वर्तमान सरकार कर सकती थी उन्हें लूपलाइन में फेंक दिया गया। चलो अब सरकार अपने हिसाब से चयन करती है लेकिन योगी सरकार जिन ईमानदार सूरमा भोपाली को पीड़ित जनता की मदद के लिए पुलिस का मुखिया बनाकर लायी है वे जनाब क्या कर रहे हैं। जिलों के पुलिस कप्तानों में 70 फीसदी बेहद भ्रष्ट हैं, जो शुरू के दिनों में योगी सरकार की ईमानदारी को लेकर कादर खान जैसी डॉयलॉगबाजी सुनकर डरे रहे थे, अब खुला खेल फर्रुखाबादी खेल रहे हैं। उन्हें मालूम है कि उनका मुखिया उदासीन संप्रदाय का संत है। जिस पर किसी की पीड़ा का कोई असर नहीं पड़ता। पुलिस की जो शिकायतें ऊपर तक पहुंचती हैं, कप्तानों को मालूम है कि उन पर कोई कार्रवाई होने वाली नहीं है। इसलिए उन्होंने छुट्टा थाने बेचना शुरू कर दिेए हैं।

अपराध बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह सरकार अपराध नियंत्रण को सेलेक्टिव नजरिये से देखती है। अमेठी राजघराने की शान में गुस्ताखी करने वाले अपराधी पर या फिर बीयर बार का उद्घाटन करने की वजह से योगी की नाराजगी की चपेट में आ चुकीं स्वाति सिंह को गाली देने वालों पर तो यह सरकार वास्तव में शेर हो सकती है लेकिन आमतौर पर सरकार के लिए पुलिस के अत्याचार और भ्रष्टाचार की शिकायतें राजकाज हैं। जिस पर उसकी कोई तत्परता नजर नहीं आती है।

सरकार के इसी संदेश के कारण सहारनपुर कांड में पहले दंगा बढ़ता ही गया। जब खुद सरकार की गर्दन फंसी और उसने प्रकाश सिंह जैसे बड़बोले पूर्व पुलिस अधिकारियों के गुरुमंत्र को मानकर जिस नगीने को इतनी जिम्मेदारी की कुर्सी दे दी थी, उस पर निगाहें टेढ़ी कीं। तब कहीं जाकर प्रशासनिक तंत्र थोड़ा सहमा और तत्कालीन डीएम, एसएसपी को निलंबित करने जैसा फैसला उसे लेना पड़ा। निलंबित किए गए एसएसपी दिनेश चंद्र दुबे कई और जिलों में भी कप्तान रहे हैं। उऩकी वर्किंग की पहले हमेशा सराहना होती रही लेकिन वे सहारनपुर में इतने लूज कैसे हो गये, इसके लिए अकेले वे जिम्मेदार नहीं हैं। अगर पुलिस और सरकार का नेतृत्व अधिकारियों से जवाबदेही का हिसाब लेने में चुस्त होता तो दिनेश चंद्र दुबे ने ही कोई कोताही नहीं होने दी होती।

कुल मिलाकर सरकार की कार्यशैली ऐसी है कि ऊपर से नीचे तक सभी मस्त हो गये हैं। आशंका यह है कि सहारनपुर जैसी परिस्थितियों से कई और जिलों में सरकार को दो-चार होना पड़ सकता है। क्योंकि योगी सरकार को तभी होश आता है जब स्थिति विस्फोटक हो जाये। योगी सरकार के लिए बस राहत की बात यह है कि विपक्ष अभी भी उन पर उतना हमलावर नहीं हो पा रहा जितना उसके लिए मौका है,क्योंकि वह आपस में ही गुंथा हुआ है। सपा में अखिलेश और शिवपाल की खींचतान से किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति बनी हुई है। शिवपाल मुलायम सिंह को साथ लेकर अलग बिगुल बजाने का ख्वाब देख रहे थे लेकिन मुलायम सिंह महीने में एकाध बार उनके समर्थन में दहाड़ने के लिए प्रकट होते हैं। फिर इसके बाद भूमिगत हो जाते हैं। उधर शिवपाल ने पूरा जोर लगा दियास सपा विधायक दल में वे एक विधायक को अपने पाले में खड़ा करने में कामयाब नहीं हो पाये। मुलायम सिंह को आगे करके सेक्युलर मोर्चा बनाने का उन्होंने ताना-बाना बुना लेकिन विपक्षी खेमे में कोई भी अब मुलायम सिंह के लिए इंतजार करने के मूड में नहीं है। इसलिए विपक्षी गोलबंदी में अखिलेश को ही लगातार न्योता मिल रहा है और उनसे इतर किसी भी मोर्चे की बात अप्रासंगिक होती जा रही है। शिवपाल निश्चित रूप से इससे पूरी तरह हताश हो चुके हैं। उन्हें आगे का रास्ता नहीं सूझ रहा कि वे योगी सरकार का विरोध करें या अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए अपने को योगी के रहमोकरम के हवाले कर दें। उनकी इस दीनता के नाते ही योगी ने उनको परमवीर विभीषण पुरस्कार की घोषणा करते हुए जेड प्लस की सुरक्षा बहाल करने का आदेश जारी कर दिया है। मोदी सरकार यह कृपा अमर सिंह पर पहले ही कर चुकी है। अब भाजपा के हाथों कौन खेल रहा है रामगोपाल या शिवपाल और अमर सिंह, इसे आम लोगों को बताने की जरूरत नहीं रह गई।

लेकिन परंपरागत विपक्ष निष्क्रिय हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार को अपनी नाकामी का खामियाजा नहीं भोगना पड़ेगा। 1985 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में विपक्ष सुसुप्तावस्था में चला गया था जब अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर जैसे नेताओं तक को चुनावी हार के कारण कोमा में पहुंच जाना पड़ गया था। लेकिन राजीव सरकार की नाकामियों के चलते उन्हीं की पार्टी से विकल्प का अवतार हुआ और भूतो न भविष्यतो बहुमत हासिल करने वाली राजीव सरकार को एक टर्म के बाद ही सत्ता गंवा देनी पड़ी।

योगी सरकार की मुश्किल यह है कि सीएम की ईमानदारी, सादगी और दो टूक फैसला लेने की क्षमता का शुरुआती दौर में इतना महिमामंडन हुआ कि उनसे लोग बहुत ज्यादा अपेक्षाएं कर बैठे। अगर यह न होता तो शायद उनकी सरकार की हौले-हौले रफ्तार के बावजूद लोगों की उम्मीदें उनसे इतनी जल्दी न टूटतीं पर अब तो लोग अधीर हो गये हैं। भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की अपनी घोषणा को चरितार्थ कर पाना तो दूर योगी सरकार को भ्रष्टाचार की रफ्तार पिछली सरकार के स्तर तक ही बांधे रखने में भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है।

जनशिकायतों के निस्तारण की स्थिति तो पिछले डेढ़ दशक में सबसे ज्यादा दयनीय हालत में है। इन दिनों सीबीएसई बोर्ड के रिजल्ट साया हुए हैं। 9 जून को यूपी बोर्ड का भी रिजल्ट साया होने वाला है। लोगों को फिर याद आयेगा कि परीक्षाएं शुरू होते समय नई सरकार कायम हो गई थी फिर भी नकल रोकने के लिए कल्याण सिंह सरकार की जैसी दृढ़ता का पासंग भी कहीं नहीं दिखा। लोगों को उस समय यह बहुत नागवार नहीं गुजरा था क्योंकि तब नई सरकार को कार्यभार संभाले चंद दिन ही हुए थे इसलिए लोग मान बैठे थे कि इस साल भले ही परीक्षाओं में खास सुधार न हो पाया हो लेकिन अगले साल परीक्षाएं नकलविहीन ही होंगी। पर लोगों का इस मामले में भी मोहभंग बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट के बाद इसलिए होने लगा है शिक्षा के मोर्चे पर योगी सरकार ने एक और हवा बांध रखी थी कि अब कॉन्वेंट स्कूल फीस स्ट्रक्चर के मामले में छुट्टा नहीं रह पाएंगे। अभिभावक इससे अपना शोषण खत्म होने की बहुत उम्मीदें बांधे हुए थे, लेकिन सरकार जिस तरह दूसरे मोर्चों पर अपनी घोषणाओं को लेकर चुप्पी साध चुकी है। वैसे ही उसने कॉन्वेंट स्कूलों के मनमाने फीस रोपण के मामले में भी दुम दबा ली है।

हर मोर्चे पर योगी सरकार की शुतुरमुर्गी पहचान बनने से भाजपा के समर्थक तक अपने को बहुत असहज महसूस करने लगे हैं। मौजूदा हालातों में योगी सरकार निर्मम आलोचनाओं की पात्र है क्योंकि हो सकता है कि इससे आवेशित होकर वह अपनी कार्यशैली में जोश का संचार कर सके। इसी उम्मीद के साथ योगी सरकार की खोखली घोषणाओं पर यह एक और किस्त, अगले किस्त लाने के वायदे के साथ...।


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