यूपी में बहुजन की उपेक्षा से कैसे चलेगा हिन्दुत्व का कार्ड, पढ़ लीजिए

By: jhansitimes.com
Mar 15 2018 08:33 pm
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(editor-in-chief, K.P SINGH ) हिन्दुत्व की चादर फैलाकर सामाजिक अंतर्विरोधों को ओझल करने की युक्ति की सफलता अल्पकालिक है। भू-मंडलीकरण और लोकतंत्र के इस दौर में वास्तविकताएं बहुत जल्दी हावी होने लगती हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता मिलने के एक साल बाद ही हिन्दुत्व का ताना-बाना बिखरने लगा है। बहुजन आबादी में भी धर्मभीरूता का प्रकोप है। इसलिए बेशक हिन्दुत्व के नारे की खुमारी उस पर भी तारी हो गई लेकिन यह पहले से तय था कि यह असर तात्कालिक ही रहेगा। जब तक श्रेष्ठता की ग्रंथि की शिकार जातियां दम्भ को त्यागकर विशाल हृदय का परिचय नही देगीं तब तक हिन्दुत्व व्यापक सामाजिक एकता का अबिलंब नही बन सकता।

ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या इस सूत्र वाक्य को कितना भी महिमा मंडित किया जाये लेकिन यथार्थ जीवन में लोगों का आचरण बताता है कि वे जगत को ही सत्य मानते हैं और मात्र ब्रह्म को सत्य मानने के सूत्र वाक्य में उनका निष्ठा प्रदर्शन प्रवंचना से अधिक महत्व नही रखता। अगर यह सूत्र वाक्य अध्यात्म क्षेत्र में काम करने वाले लोग तक जीवन दर्शन समझते तो सन्यासी बनकर जगत को सुधारने के लिए भौतिक शक्तियों की लालसा उनके मन में नही पनप सकती थीं। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई स्पर्श चिकित्सक मरीज को सर्जरी और दवाइयों का कोर्स देने लगे जबकि यह अनर्थकारी होगा। अध्यात्म कहता है कि व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का असल कारण मनोविकार है। निर्दोश और निर्मल संसार की रचना के लिए भौतिक शक्तियों की नही ज्ञान की आवश्यकता है। जब व्यक्ति में ज्ञानोदय हो जायेगा यानी ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या के इस सत्य को वह समझ लेगा तो जागृतिक समस्याओं के लिए गुंजाइश ही नही बचेगी। लेकिन महंत जी जब अध्यात्म विश्व में शिखर पर पहुंचकर भी लोक कल्याण और लोक प्रफुल्लता के लिए सांसारिक पद यानी भौतिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता महसूस करने लगें तो आध्यात्मिक सूत्र वाक्य अपनी प्रासंगिकता खो देगें। क्या सन्यासी और साध्वियों ने राज्य सत्ता में भागीदारी स्वीकार करके अध्यात्म को बेमानी बनाने का अपराध नही किया है।

बहरहाल हिन्दुत्व के साथ जो समस्या है वह अकेले उत्तर प्रदेश में नही पूरे भारतीय समाज में है। लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में उत्तर प्रदेश इसलिए विशिष्ट है कि सामाजिक न्याय की मजबूत प्रयोगशाला के रूप में यहां काम हुआ है। इसीलिए शोषित, वंचित रहा तबका यहां आत्म सम्मान के लिए अत्यंत संवेदनशील है जिसे आहत किया जा रहा है। इसकी प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। सपा-बसपा गठबंधन इस संदर्भ में नैसर्गिक है। इनका तालमेल होते ही आहत आत्म सम्मान की कचोट पूरी शिद्दत से बहुजन समाज को महसूस हुई और गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में इसके भूचालकारी नतीजे सामने आ गये। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी जीत की सटीक व्याख्या करते हुए इसे सामाजिक न्याय की शक्तियों की जीत बताया है। बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी चंडीगढ़ में पार्टी के संस्थापक कांशीराम के जयंती समारोह में इसी लाइन पर भाषण दिया है। सपा और बसपा को उपचुनावों की जीत ने अपनी राजनीति की दिशा को बोध करा दिया है। जिससे विचलन की वे पर्याप्त कीमत चुका चुके हैं।

जब से भाजपा केंद्र में सरकार में आई है। तब से उसके असल समर्थक आरक्षण की व्यवस्था और अन्य बहानों से दलितों, पिछड़ों को नीचा दिखाने का कोई अवसर नही छोड़ रहे। सोशल मीडिया पर आरक्षण को लेकर जिस तरह के कमेंटस की बाढ़ है वे इसके गवाह हैं। भाजपा में बहुजन समाज के किसी नेता को कितना भी बड़ा पद मिल जाये वह उम्र से भी कितना वरिष्ठ क्यों न हो उसके चरण स्पर्श की कोई जरूरत महसूस नही की जाती जबकि पार्टी में चरण स्पर्श संस्कृति को बेहद प्रोत्साहन दिया जाता है। भाजपा समाज में कुजात और कुलीन का बंटवारा सत्ता में आने के बाद मिटाने की बजाय बढ़ा रही है।

संघ ने अपने संगठन को सर्व समावेशी बनाने के लिए हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में दलितों व पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया है। लेकिन करुणा पर आधारित इसमें निहित समरसता उत्तर प्रदेश जैसे जागरूक राज्य में समाज की वास्तविकताओं के चलते प्रभावहीन हो जाते हैं। महात्मा गांधी की दलितोद्धार की भावना में पाप नही ढूढ़ा जा सकता। लेकिन फिर भी बाबा साहब अंबेडकर उनकी कार्यशैली को लेकर बहुत तिक्त हो जाते थे। बाबा साहब का कहना था कि दलित करुणा की वस्तु नही हैं उन्हें भी आत्म सम्मान और आत्म निर्णय का अधिकार चाहिए। बहुजन समाज के इस जज्बात को संघ ने समझने की कोशिश नही की। अन्यथा आरक्षण के बारे में वह उन लोगों को सदबुद्धि देता जो उससे प्रेरित होते हैं। विशेष अवसर का सिद्धांत अकेले भारत में नही है दुनियां के अन्य देशों में तो भेदभाव के शिकार समाजों के लिए इसे बहुत पहले से अपना रखा है। अभी भी सरकारी नौकरियों में गैर आरक्षित दायरा 52 प्रतिशत तक है जो कि सवर्ण आबादी के अनुपात से बहुत ज्यादा है लेकिन फिर भी वे संतुष्ट नही हैं तो इसके पीछे उनका सर्वसत्तावादी स्वभाव और शूद्र जातियों के प्रति हर दर्जे की जलन है। कोई संगठन, कोई देश यहां तक कि परिवार भी तब तक सुचारू रूप से नही चल सकता जब तक कि उसकी व्यवस्था में सभी की भागीदारी न हो। इसके अलावा बहुतायत आबादी की संतुष्टि किसी व्यवस्था की सफलता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए व्यवस्था का स्वरूप सर्व समावेशी होना अपरिहार्य है। फिर योग्यता और क्षमता का दावा भी थोथा है। समाज वर्ण व्यवस्था के नाते सदियों तक तथाकथित योग्य और सक्षम लोगों के पास रहा। फिर हर वाह्य आक्रमण के सामने आप पराजित क्यों हुए। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में आपका कोई योगदान क्यों नही दिखता। आपका व्यापार वैश्विक प्रतिस्पर्धा में क्यों पिछड़ गया यानी वर्ण व्यवस्था का माडल फेल है। इसको बचाने का कोई प्रयास देश को बर्बाद करने के बराबर है यानी देश द्रोह है। वर्ण व्यवस्था किसी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा नही है और इसे लक्षित करके मर्यादा पुरुषोत्तम का ईश्वरीय प्रतीक गढ़ा जाना धूर्ततापूर्ण है।

देश और समाज न तो इन कुटिल विचारों के कारण बढ़ पाया है और न बढ़ पायेगा। इस देश में तमाम सामाजिक घटक हैं जिनके बीच एकता ही देश के गौरव को बढ़ाने के लिए सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। भले ही विदेशी हम पर शासन करने लगें लेकिन हम अपनों को शासित करने का अधिकार नही छोड़ेगें। इस मानसिकता से देश का बहुत नुकसान हो चुका है। इस हठधर्मिता की वजह से देश में नया सामाजिक समायोजन तैयार करने में घनघोर बाधा आ रही है। इसलिए संघ यदि बहुत देश भक्त है तो उसे असल सवालों से मुठभेड़ करनी होगी। आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ क्रोध की आड़ में शूद्र समाज को जन्मजात निकम्मा साबित करने और खुद की श्रेष्ठता की अहंकारपूर्ण पोस्ट सोशल मीडिया पर डालना सहन नही किया जाना चाहिए। चूंकि ऐसे लोग बहुतायत में संघ के हैं इसलिए उन्हें डपटना संघ का काम है। बड़प्पन इस तरह की हरकतों से प्रदर्शित नही होता, वह दूसरों के अच्छे प्रदर्शन की पीठ थपथपाने से प्रर्दशित होता है और बढ़ता है। तथाकथित कुलीन समाज अगर इसे सीख सके तो उपलब्धि हासिल करने वाले बहुजन समाज के लोगों की तारीफ और हमदर्दी की पोस्ट सोशल मीडिया पर डालकर वह देश का ज्यादा भला कर सकता है। इससे उनका अपना बड़प्पन भी दिखेगा और वह विभिन्न कारणों से पीछे रह जाने वाले अपने भाइयों का मनोबल बढ़ाकर उनमें बेहतर प्रदर्शन की ऊर्जा भी भर सकेगा।

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल में यह करने की बजाय जातिगत अहंकार का पृष्ठपोषण किया गया। यहां तक कि प्रशासन में भी महत्वपूर्ण पदों पर चुन-चुन कर सवर्ण अधिकारी बैठाये गये जो मुंह देखा व्यवहार करने की आदत नही छोड़ सके। उन्होंने ओबीसी या दलित समाज के लोगों को भाव देना गंवारा नही किया। जिस राज्य में बहुजन समाज सत्ता और लीडरशिप का रसास्वादन कर चुका है उस राज्य में उपेक्षा का घूंट बर्दाश्त करना उसे कैसे गंवारा हो सकता है। इसलिए योगी सपा-बसपा सहयोग को बेमेल गठबंधन और सौदेबाजी बताकर झटकने की कोशिश न करें। बल्कि इस गठबंधन की चुनौती को समझे और सामाजिक वस्तु स्थिति को ध्यान में रखकर अपनी सोच और कार्यनीति में बदलाव करें, तभी डैमेज कंट्रोल हो पायेगा।


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