कितने संघी थे अटल जी ...

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Aug 18 2018 08:20 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH)  हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने संघ के स्वयं सेवक होने पर गर्व जताया था लेकिन सही बात यह है कि वे किसी दायरे में नही बंधे थे। उनका व्यक्तित्व और चिंतन स्वतंत्र था और फैसले भी। सभी जानते हैं कि अटल जी न जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए इंडियन एक्सपे्रस में एक लेख लिखा था जिसमें संघ की नीतियों की आलोचना की गई थी।

अटल जी छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गये थे। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज जिसका नाम बदलकर अब महारानी लक्ष्मीबाई कालेज हो चुका है, से छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव कम्युनिष्ट पार्टी की स्टूडेंट विंग के उम्मीदवार के रूप में लड़कर जीता था। बाद में उनका झुकाव संघ की ओर हो गया। उनके अविवाहित रहने और संघ में शामिल होने को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित रहीं हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने उस महिला और उनके पति को माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेता के बतौर भाषण करते सुना है जिनके बारे में कहा जाता था कि अटल जी शुरू में उन्हीं के साथ विवाह रचाना चाहते थे। उधर बाद में विधिवत पति बने शख्स भी उनसे विवाह की मंशा जता चुके थे। इस बीच एक डिबेट हुई और उस युवती ने यह शर्त रख दी कि इसमें जो अव्वल आयेगा उसके साथ वे विवाह रचा लेगीं। दुर्भाग्य से उस डिबेट में युवती के भावी पति के मुकाबले अटल जी पिछड़ गये। जिसके बाद युवती ने वादे के मुताबिक उनके प्रतिद्वंदी से विवाह रचा लिया। इस वियोग में अटल जी ने अपने को कम्युनिष्ट पार्टी और ग्वालियर से अपने को दूर कर लिया। जिस कम्युनिष्ट दंपत्ति की चर्चा यहां की जा रही है वह भी काफी पहले दिवंगत हो चुके हैं।

अलग दृष्टिकोण के कारण संघ में रहते हुए वे इस बात के लिए चैकन्ना रहते थे कि मुसलमानों में उनको लेकर कोई दुराव न पनपे और उनकी यह सतर्कता मुसलमानों के प्रति उनकी अतिरिक्त हमदर्दी का कारण बन गई थी। उनका विश्वास जीतने की सोच अटल जी पर हावी रहती थी। भिंड का एक अनाम सा छात्र नेता था हसमत वारसी जो अपनी आंदोलनकारी गतिविधियों के कारण इमरजेंसी में गिरफ्तार कर लिया गया था और इस दौरान बीमारी से जेल में ही उसकी मौत हो गई थी। जनता पार्टी सरकार बनने के बाद अटल जी की मंशा के कारण भिंड के सरकारी हायर सेकेड्री स्कूल नं.-2 के मैदान में हसमत वारसी की पुन्य तिथि पर उसका बलिदान समारोह भव्य स्तर पर आयोजित किया गया। उस समय अटल जी विदेश मंत्री थे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी कितनी व्यस्तताएं होगीं लेकिन इसके बावजूद वे हसमत वारसी के बलिदान दिवस समारोह में शामिल हुए। उनके कारण मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र सखलेचा और उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य रात में हुए उस कार्यक्रम में असुविधा झेलते हुए पहुंचे।

संयोग से इसी कार्यक्रम को लेकर ग्वालियर से प्रकाशित दैनिक स्वदेश ने एक परिशिष्ट प्रकाशित किया था जिसमें पहली बार यह जानकारी दी गई थी कि अटल जी का बचपन भिंड में भी उस मकान में बीता था जिसमें इन पंक्तियों का लेखक उस समय रह रहा था जो कि संयोग से हसमत वारसी बलिदान दिवस समारोह का सह संयोजक भी था। भिंड में प्रसिद्ध वनखंडेश्वर मंदिर के पास मदन मोहन गली में नंबर 2 का यह मकान आज भी खंडहरनुमा हालत में मौजूद है। जिसके मालिक भिंड के युवा पत्रकार अनुराग मिश्रा हैं।

जनता पार्टी का पहला अधिवेशन उज्जैन में आयोजित हुआ जो कि सिंधिया साम्राज्य का हिस्सा था। जनता पार्टी कई पार्टियों के एकीकरण से बनी थी जिसमें घनघोर घटकवाद व्याप्त था। लेकिन कोई घटक पार्टी के पहले अधिवेशन की मेजबानी का खर्चा उठाने की हामी नही भर पा रहा था। तब अटल जी आगे आये और ग्वालियर की पूर्व महारानी विजया राजे सिंधिया ने अधिवेशन के खर्चे का जिम्मा उनके कहने से अपने ऊपर लिया। जिसकी वजह से उनकी मर्जी पर इसके लिए उज्जैन की जगह निश्चित की गई। अधिवेशन के लिए उज्जैन में अलग से एक नगर बसाया गया था जिसका नामकरण भिंड के उसी शहर स्तर के छात्र नेता हसमत वारसी के नाम पर किया गया था। कहने की जरूरत नही है कि इसका श्रेय अटल जी को था। जिसके पीछे मुसलमानों की सदभावना अर्जित करने की उनकी मंशा छिपी हुई थी।

एक और बात गौरतलब है कि मोरारजी देसाई की नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार की कैबिनेट में जनसंघ घटक को चार का कोटा दिया गया था। अटल जी ने इसके लिए जो नाम प्रस्तावित किये उनमें उनके स्वयं और लालकृष्ण आडवाणी के अलावा दो मुस्लिम नाम आरिफ बेग और सिकंदर बख्त के थे। अटल जी किस तरह सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की भावना रखते थे यह उसका उदाहरण है। इसीलिए उन्होंने अपने कोटे में बराबरी की भागीदारी मुसलमानों को दिलाई थी।

भारतीय जनता पार्टी का गठन जब अटल जी ने किया उस समय सोशल इंजीनियरिंग या सामाजिक न्याय का मुहाबरा राजनीति में चलन में नही आया था। उस समय तो माहौल बेहद रूढ़वादिता का था। यहां तक कि वंचितों को भागीदारी की वकालत करने वाले सोशलिस्टों तक को दलित प्रधानमंत्री स्वीकार्य नही था। इसीलिए जनता पार्टी में प्रधानमंत्री पद के लिए जगजीवन राम के नाम पर मुहर नही लगाई जा सकी थी और उनका दावा खारिज करने के लिए ही मोरारजी देसाई का नाम तय हो गया था जो कि बेहद रूखे स्वभाव के थे और उनके बारे में पहले से ही विदित था कि टीम भावना न होने के कारण वे स्थिर सरकार नही दे पायेगें। दूसरी ओर विदेश मंत्री के रूप में शानदार प्रदर्शन के कारण खुद अटल जी का नाम प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे आ गया था। लेकिन जब जनता पार्टी टूटी और अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से नया दल बनाया तो उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को तिलांजलि देकर जगजीवन राम को भाजपा के पहले चुनाव में प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करने का फैसला लिया जो तत्कालीन रूढ़वादी परिवेश में बहुत दिलेरी का काम था। इस जोखिम को उठाने की बड़ी कीमत अटल जी को चुकानी पड़ी। भारतीय जनता पार्टी की इसके कारण भ्रूण हत्या की नौबत आ गई थी। उसे 1980 और 1984 के चुनाव में दलित प्रधानमंत्री की वकालत के ‘‘कलंक’’ की वजह से न्यूनतम सीटों पर संतोष करना पड़ा था। बाद में आडवाणी युग में राममंदिर का मुददा पेश किये जाने से पार्टी की स्थिति संभल सकी। दरअसल अटल जी राजनैतिक सौदागर नही थे जो लाभ पर नजर रखकर फैसला लेते हों। वे समाज और देश की व्यवस्था को बदलने के लिए जीवन भर सच्चे मन से काम करते रहे यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।

संघ के परिवेश में समाजवाद का नाम लेना गुनाह है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय अटल जी ने अर्थ व्यवस्था के क्षेत्र में गांधीवादी समाजवाद को पार्टी का लक्ष्य घोषित किया यह भी उनके स्वतंत्र निर्णय का परिचायक था। अटल जी के महाप्रयाण के एक दिन पहले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दम भरा था कि वे कश्मीर के मामले में अटल जी के ही रास्ते पर ही आगे बढ़ रहे हैं। सभी जानते हैं कि इसमें कोई सच्चाई नही है और अटल जी अगर चैतन्य होते तो उनकी कश्मीर नीति को एकदम नकार देते। अटल जी वार्ता से कश्मीर समस्या को सुलझाने के पक्षधर थे और वे अलगाववादी संगल्न हुर्रियत कांफ्रेस के नेताओं का भी विश्वास जीतने की कोशिश करते रहे थे। उन्होंने तो वार्ता के क्रम को तार्किक परिणति पर पहुंचाने के लिए यह तक पेशकश कर दी थी कि अगर समस्या सुलझती हो तो वे भूगोल को बदले बिना संविधान के दायरे से बाहर जाने के लिए भी तैयार हैं। मोदी सरकार ने संवाद की नीति में विश्वास करने की बजाय सुरक्षा बलों के जरिये कश्मीर समस्या को हल करने की कोशिश में और उलझा दिया है। कुल मिलाकर अटल जी बेहद दूर-दृष्टा नेता थे। जिसकी वजह से आने वाले समय में उनके विचार और फैसले और ज्यादा प्रासंगिक होते जायेगें।


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