भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल कितना सार्थक होगा

By: jhansitimes.com
Aug 02 2018 07:57 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी समझ रहे हैं कि सन्निकट लोकसभा चुनाव में लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में अपमानित और उत्पीड़ित परिस्थितियों में रखने के लिए मजबूर करने का पर्याय बन चुका भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुददा होगा। जिसके सामने विकास का तूफान भी कोई गुल न खिला सकेगा। इसलिए जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिन तक लखनऊ में रोमांचक उपस्थिति के साथ निवेश सम्मेलन का करिश्माई अंदाज में नगाड़ा बजवाया। वहीं इसके तुरंत बाद वे भ्रष्टाचार से दो-दो हाथ करते देखने की तैयारी में जुट पड़े। जुलाई के महीने की अंतिम तारीख में उन्होंने प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह के संयोजन में सतर्कता, आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, सीबीसीआईडी और सहकारिता जांच प्रकोष्ठ के प्रमुखों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। जिसमें नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने और एफआईआर दर्ज करने की अनुमति आदि के 400 के लगभग प्रकरण लंबित होने की जानकारी सामने आई। सबसे ज्यादा बिलंबित मामले सतर्कता और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरों में 200 के लगभग हैं। इसके पीछे एक वजह यह भी है कि इन विभागों में स्टाफ की संख्या काम के अनुरूप नही है। मुख्यमंत्री ने इसकी पूर्ति का आश्वासन अधिकारियों को दिया। लेकिन उन्हें यह आगाह किया कि दो महीने के अंदर सभी बिलंबित मामलों को वे उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचायेगें।

चूंकि ये बड़ी मछलियों से संबंधित मामले हैं इसलिए इनको आगे न बढ़ने देने के हजार बहाने रहते हैं। या तो जांच का स्वांग भर होता रहता है लेकिन जांच में कोई वास्तविक प्रगति नही होती। कुछ मामलों में अगर जांच पूरी कर एफआईआर दर्ज कराने की अनुमति के लिए फाइल भेजी गई तो वह शासन में जाकर ठंडे बस्ते में पड़ गई। अगर एफआईआर करके विवेचना पूरी कर किसी के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की नौबत आ भी गई तो उसकी अनुमति की फाइल का भी शासन में वैसा ही हश्र हुआ। यह बात छुपी हुई नही है कि भ्रष्ट नेताओं और मंत्रियों के मामलों में मुख्यमंत्री स्तर तक सौदेबाजियां हुईं हैं। इसलिए उन्हें अंजाम के पहले ही दफन हो जाना पड़ा। पुलिस भर्ती घोटाला कांड में दर्जनों आईपीएस अफसरों की गर्दन फंस गई थी लेकिन बाद में मामला कहां जाकर टांय-टांय फिस्स हो गया सयानों को यह बात अच्छी तरह मालूम है।

इसलिए अब अगर इस मामले में ढर्रा पलटने की कोशिश हुई है तो इसका स्वागत होना चाहिए। वर्तमान मुख्यमंत्री की खुद की सत्य निष्ठा पर किसी को संदेह नही है। इसलिए यह सोचा जा सकता है कि अब सीएम स्तर पर भ्रष्टों को बचाने के लिए कोई सौदेबाजी मुमकिन नही रह गई है। दूसरी ओर यह बात भी काफी समय से सामने आ रही है कि इस समय उत्तर प्रदेश में सत्ता के कई केंद्र हैं, जिनमें कुछ तो सुपर चीफ मिनिस्टर की हैसियत रखते हैं और योगी उनके रिमोट कंट्रोल के अधीन हैं। ये सुपर सीएम चुनाव के लिए पार्टी फंड मजबूत करने के नाम पर राजनीति और प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों का संरक्षण कर रहे हैं और उनके अभयदान को भेदने में योगी भी सक्षम नही हैं। यही कारण है कि योगी सरकार का दबदबा भ्रष्ट तत्वों पर से खत्म हो गया है। अफसर ही नही सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद और विधायक तक वेखौफ होकर लूटमार में लगे हैं तो उसकी भी वजह कहीं न कहीं यह है कि उन्हें सत्ता के समानान्तर केंद्रों से आशीर्वाद प्राप्त है।

वृंदावन में संघ की समन्वय समिति की जो बैठक हुई थी उसमें पार्टी के सांसद और विधायकों की उगाही को लेकर व्यापक चर्चा की गई थी और संघ के अधिकारियों द्वारा इस पर घोर आपत्ति व नाराजगी जताई गई थी। नतीजा यह रहा था कि कुछ दिनों तक सत्तारूढ पार्टी के माननीय सहमें-सहमें दिखाई देते रहे। लेकिन बाद में जब उन पर अंकुश के लिए कोई ठोस कार्रवाई सामने नही आई तो उनके हौसले पहले से भी ज्यादा बुलंद हो गये। जब जनप्रतिनिधि ईमानदार रहते हैं तो प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों की भी जुर्रत नही होती कि वे आसानी से गलत काम करें। लेकिन जब जनप्रतिनिधि भ्रष्ट हो जायें तो वही कहावत चरितार्थ होगी कि बाड़ ही खेत को खाने लगे तो फसल को कौन बचा सकता है।

मीडिया आज वस्तुतः मनोरंजन का एक व्यापार है। इसलिए वह हर ईवेंट को चटपटी सुर्खियों के साथ पेश करता है। मुख्यमंत्री की भ्रष्टाचार पर हल्ला बोलने को लेकर हुई उक्त बैठक की मीडिया में प्रस्तुति को भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए। मीडिया की खबरों को देखकर जनमानस को यह भ्रम हो सकता है कि अब भ्रष्टाचार के मामले में दुनियां ही बदल जाने वाली है पर वास्तव में ऐसा कुछ हो पायेगा इसे लेकर संशय ग्रस्त होने के पर्याप्त कारण हैं।

बिलंबित मामलों में मुख्यमंत्री मुकदमा दर्ज कराने और आरोप पत्र दायर करने की अनुमति थोक में दिला भी देगें तो भी राजनीति और प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों के हौसलें खास पस्त हो पायेगें इसकी उम्मीद कम ही है। पहले माना जाता था कि आईएएस अधिकारियोें में बिरला ही जेल गया होगा। इसलिए उनकी आदतें बिगड़ रही हैं। जिस दिन कुछ बड़े आईएएस अधिकारी जेल चले गये उस दिन इस संवर्ग में कोहराम मच जायेगा क्योंकि आईएएस अधिकारी जेल में रहने की कल्पना भी नही करते। ऐसी हालत में वे न खुद कुछ गलत करेगें न किसी को करने देगें। लेकिन प्रदीप शुक्ला, नीरा यादव और राजीव कुमार जैसे ताकतवर आईएएस अधिकारियों के जेल पहुंच जाने के बाद भी कोई प्रलय नही हुई। इन लोगों का सीखचों के अंदर पहुंचना अपवाद मानकर नजर अंदाज कर दिया गया और अपनी प्रतिष्ठा के लिए अलग पहचान रखने वाले इस संवर्ग के अधिकारियों के पतित होने का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है।

प्रदेश में इस समय हर कदम पर भ्रष्टाचार है। सुविधा शुल्क दिये बिना लोगों का एक काम नही हो सकता। यह एक तरह से अराजकता की स्थिति का पर्याय है। मुख्य चुनौती यह है कि इसमें किस प्रकार से परिवर्तन हो। मुख्यमंत्री के पास अभिसूचना तंत्र है। स्थानीय अभिसूचना इकाइयों के अलावा अभिसूचना के विशेष प्रकोष्ठ हैं। अगर इनसे अधिकारियों और नेताओं की साख की नियमित खुफियां जानकारियां हासिल करने का सिलसिला मुख्यमंत्री बना लें तो उन्हें मालूम हो जायेगा कि उनके 90 प्रतिशत डीएम और एसपी क्या कर रहे हैं। ज्यादातर डीएम अपने दफ्तर को दुकान बनाये हुए हैं तो कप्तान साहब लोग थानों की नीलाम बोलियां लगवा रहे हैं। इन पदों का संबंध लोगों के सीधे सरोकारों से है। इसलिए यह भ्रष्टाचार असहनीय रूप लेता जा रहा है और समूची व्यवस्था लड़खड़ाती जा रही है। अगर खुफिया रिपोर्ट मिलते ही अधिकारियों और नेताओं पर कार्रवाई की गाज गिरने लगे तो इसी तंत्र से दुरुस्त तरीके से काम कराया जा सकता है। इसका उदाहरण खुद योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल का शुरूआती महीना है। जब उनका इकबाल ऐसा था कि भ्रष्ट से भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेना छोड़ गये थे। सांसद और विधायक भी लेन-देन की बात जुबान तक लाने में डरते थे सोचते थे कि कहीं दीवारों के कान न हों और बात योगी तक पहुंच जाये। लेकिन इसके बाद उनकी क्षमताओं की जैसे पोल खुल गई तो अधिकारी हों या नेता सभी बेखौफ हो गये।

मुख्यमंत्री ने हाल में यह भी कहा है कि महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति उनका करेक्टर रौल देखकर की जाये। लेकिन यह कवायद तो अपने नजरिये से उस दिन भी कराई थी जब पहली तबादला सूची जारी हुई थी। लेकिन इसमें सक्षमता और सत्य निष्ठा के नाम पर कुछ और बेहतर झलकने की बजाय केवल यह झलका था कि वर्ण व्यवस्था इन गुणों की कुंजी है। यह मानसिकता आज बदल गई हो ऐसा भी नही कहा जा सकता। नतीजतन हालत यह है कि नौकरशाही में जाति आधारित श्रेष्ठियों का जो अनुपात है वह शत-प्रतिशत महत्वपूर्ण पदों पर समायोजित है। अब श्रेष्ठियों में से नये नगीने लाने की गुंजाइश नही बची है तो करेक्टर रौल के आधार पर नये सिरे से नियुक्तियां और पद स्थापनाएं करने का उनके आवाहन का खोखलापन स्वयं सिद्ध हो रहा है।

फिर भी उम्मीद है कि मुख्यमंत्री राजनीतिक जरूरत के लिए ही सही जब भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना दिखाना चाहते हैं तो वे इन बारीकियों को समझेगें और शुरू में जैसा उनका इकबाल था वैसा ही इकबाल एक बार फिर बहाल और बुलंद करने के लिए रुटीन में किसी प्रभावी हस्तक्षेप को सामने लायेगें।


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