उन्नाव में दलित विरोधियों ने कैसे रौंदी प्रधानमंत्री मोदी की भक्ति भावना.... बता रहे, प्रधान संपाद

By: jhansitimes.com
Mar 17 2018 09:58 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) उन्नाव की बांगरमऊ कोतवाली क्षेत्र के हयात नगर गांव में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की कथा करा रहे दलितों के साथ मारपीट की गई। इस दौरान महिलाओं और बुजुर्गों को भी नही बख्शा गया। मंच पर स्थापित बाबा साहब की प्रतिमा गिरा दी गई। बौद्ध भिक्षुओं को अपमानित किया गया। यह घटना बेहद निंदनीय है। कहने की जरूरत नही है कि एक ओर जहां भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बाबा साहब के लिए श्रद्धा सुमन उड़ेलने में कोई कसर नही छोड़ रहा वहीं उत्तर प्रदेश में इस पार्टी के सरकार के इशारे ऐसे हैं जिससे सामाजिक बराबरी के किसी भी प्रयास और विचार का दमन करने के लिए किसी भी सीमा को लांघ दिया जाये। ऐसे माहौल में बाबा साहब अंबेडकर और बौद्ध धर्म के प्रति घोर शत्रुता की भावना को बढ़ावा मिला है। इससे कुछ लोगों को जातीय दम की तुष्टि तो हो सकती है लेकिन देश के भविष्य के लिए यह स्थिति अच्छी नही कही जा सकती।

आज के युग में कोई देश तभी विश्व बिरादरी में गौरव हासिल कर सकता है जब उसके द्वारा मानवता के मापदंडों को सर्वोपरि दी जा रही हो भले ही इसके लिए उसे अपनी परंपराएं और विचारों में संसोधन करना पड़े। धर्म के नाम पर इस देश में ऐसे मनोविकारों को प्रोत्साहित किया गया है जो बहुसंख्यक समाज की गरिमा और मौलिक अधिकारों के दमन के लिए शक्ति संपन्न समूहों को उकसाते हैं। इस देश में न केवल वे धर्म अस्वीकार्य कहे जाते जिनके प्रवर्तक किसी गैर देश के रहे हैं। बल्कि बौद्ध धम्म के प्रति भी उतने ही दुराग्रह का परिचय दिया जाता है। जबकि तथागत बुद्ध के कारण ही दुनियां के तमाम देशों के लोग भारत को अपनी गुरु भूमि के रूप में पूजते हैं। देश का गौरव बढ़ाने वाले महापुरुष और उनके सिद्धांतों को घृणा की निगाह से देखने वालों को देश भक्त कैसे कहा जा सकता है। यह तो उपनिवेशवादी आचरण है जो कि बाहर से आये शासक वर्ग में होती है। यह आचरण मूल भारतीय बनाम बाहरी कब्जेदार के द्वंद की अवधारणा को पुष्ट करता है जो कि राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है। बाबा साहब ने इस तरह के विचारों को अमान्य कर राष्ट्रीय एकता बनाये रखने में शानदार योगदान दिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पद पर पहुंचने के बाद बार-बार यह कहा है कि वे इस बुलंदी तक पहुंच पाये तो इसका सारा श्रेय बाबा साहब अंबेडकर के संघर्ष और विचारों को है। मोदी संघ के मानस पुत्र हैं और भले ही रणनीति की खातिर हो लेकिन संघ भी बाबा साहब के प्रति भक्ति भाव दिखाने में कोई कंजूसी नही करता। पर संघ का व्यवहार विरोधाभाष पूर्ण है। जिसकी वजह से उसके सत्ता का केंद्र बिंदु बन जाने के बाद से सामाजिक समरसता बिखर रही है। संघ ने जिन चंद्रगुप्तों को तैयार किया है वे प्राचीन संस्कृति और धर्म की बहाली के नाम पर सामाजिक अन्याय की कुरीतियों की ओर अग्रसर है। उत्तर प्रदेश में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। हालांकि गोरखनाथ पीठ को जाति बंधन शिथिल करने के लिए जाना जाता है लेकिन इसके वर्तमान पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की हैसियत से वर्ण व्यवस्थावादी इशारे दे रहे हैं। फिर चाहे वह सहारनपुर में चंद्रशेखर रावण को रासुका आदि प्रक्रियाओं के जरिये अनंतकाल तक जेल में बंद रखने के रूप में प्रदर्शित हो अथवा प्रशासन की महत्वपूर्ण नियुक्तियों में दलित-पिछड़े वर्ग के अधिकारियों की उपेक्षा से।

इसलिए जाति के आधार पर अत्याचार करने वालों के हौसले यहां बढ़ रहे हैं। इस पर पर्दा डालने के लिए अनुसूचित जाति उत्पीड़न के मुकदमे लिखे जाने अघोषित तौर पर बंद कर दिये गये हैं। बाबा साहब के लिए भी उत्तर प्रदेश शासन के मन में वैसा सम्मान नही है जैसा प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं। सामाजिक समीकरण बेहद जटिल हैं और अगर संघ सचमुच चाहता है कि सामाजिक समरसता बढ़े तो उसे इन जटिलताओं को सुलझाने का वैचारिक साहस दिखाना होगा। आदर्शवाद और थोथी भावुकता की बजाय उसे वास्तविक प्रश्नों के समाधान की चुनौती स्वीकार करनी होगी। बिडंबना का विषय है जो स्वच्छ प्रतियोगिता होने पर चपरासी की नौकरी की प्रतिस्पर्धा मे भी सफल नही हो सकते वे सबसे ज्यादा आरक्षण का रोना रोते हैं और इस क्रम में अपनी दूषित भावना के कारण सारी शूद्र जातियों को जन्मना हीन साबित करने से बाज नही आते। जबकि हालत यह है कि लोकतंत्र में अवसर मिलने के बाद सत्ता संचालन में शूद्र जातियों के नेता ही अपने को सर्वाधिक सक्षम साबित करने में सफल हुए हैं। जब तक उनमें पूर्वाग्रह समाप्त करने और उनको सदज्ञान देने के लिए संघ अपने शिक्षण वर्ग में सार्थक पाठयक्रम तय नही करता तब तक यह अनर्थ जारी रहेगा। बाबा साहब के विचारों को लेकर भी सवर्ण युवाओं का दृष्टिकोण बेहद कलुषित है क्योंकि उन्हें यह भ्रांति है कि बाबा साहब का साहित्य सवर्णों के प्रति प्रतिशोध की भावना का शिकार है। अगर उन्हें बाबा साहब का साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाये तो उनके ज्ञान चक्षु खुलेगें और वे जान सकेगें कि उन्होंने पुस्तकें लिखने के लिए कितना गहन अकादमिक शोध किया है। देश की तमाम सामाजिक गुत्थियों को सुलझाने में उन्हें बाबा साहब के विलक्षण अनुमानों से बहुत मदद मिलेगी।

वसुधैव कुटुम्बकम का घोष वाक्य अलंकारिक से अधिक महत्व नही रखता रहा है। जिसके कारण व्यवहारिक स्तर पर लोग बहुत कूप मंडूक हो उठते हैं। गीता का अनुवाद विदेशों में होता है, गांधी और अंबेडकर जैसे महापुरुषों की प्रतिमाएं दुनियां के दूसरे देशों में लगती हैं लेकिन उन देशों में इस पर कोई आपत्ति नही होती क्योंकि समग्र मानवता को संबोधित महापुरुष और विचार पूरी विश्व बिरादरी की धरोहर है और उन्हें इस रूप में अपनाया जाना ही श्रेयस्कर है। लेकिन दुनियां के दूसरे देश में निसृत महान विचार या विश्व के किसी अलग कोने में जन्में महापुरुष को इस देश में तपाक से यह कहकर खारिज करने का रिवाज है कि यहां उनका क्या काम। यह वसुधैव कुटुम्बकम के अनुरूप सोच और आचरण तो नही हो सकता। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जब दुनियां देखी तो वसुधैव कुटुम्बकम के आदर्श को आत्मसात करने का अवसर उन्हें मिल गया जिसने उनके विचार और कार्य व्यवहार में काफी परिवर्तन कर दिया। वे अब अजान के समय भाषण रोकने लगे हैं और अजमेर शरीफ में उर्स के मौके पर दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर भेजने लगे हैं यह बड़प्पन है कि स्वागत योग्य है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में संकीर्णता पर अभिमान किया जा रहा हैं जो कि दुखद स्थिति है। समाज को संगठित बनाये रखने में हमारी मान्यताएं विफल साबित हुईं। जिसके कारण अतीत में इस देश ने बड़ी कीमत चुकाई है। इतिहास के उस दौर की पुनरावृत्ति नही होनी चाहिए। आपसी भेदभाव और घृणा पर आधारित आस्था की लादी ढोने का कोई औचित्य नही है। विवेक का परिचय देते हुए घातक आस्थाओं को तिलाजंलि देनी चाहिए। खुद संघ प्रमुख कहते हैं कि देश धर्म से ऊपर है। संघ की शाखाओं मे इसे लेकर जापान की कहानी सुनाई जाती है। इसके अनुरूप देश को बचाये रखने और ताकतवर बनाने के लिए जो वांछनीय धार्मिक सुधार हैं उन्हें किया जाये। देश को नैतिक और वैचारिक साहस की इस समय सबसे बड़ी जरूरत है।


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