बिहार के कुरुक्षेत्र में महाभारत का नतीजा किस करवट बैठेगा

By: jhansitimes.com
Aug 30 2017 12:42 pm
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(editor-in-chief, KP SINGH )बिहार में लालू और नीतीश के बीच घमासान छिड़ा हुआ है। हालांकि इस द्वंद्व में यह बात अनदेखी नहीं की जा सकती कि सांप्रदायिक शक्तियों से संघर्ष और सामाजिक न्याय की लड़ाई को तार्किक परिणति तक पहुंचाने के प्रयास के मामले में लालू अभी तक बेदाग हैं, क्योंकि उन्होंने इस लड़ाई को लेकर कभी पीठ दिखाने की चेष्टा नहीं की। पर यही बात शरद यादव को लेकर नहीं कही जा सकती। शरद यादव ने नीतीश पर अपने बहुत उधार लाद दिए थे जिनका हिसाब नीतीश को चुकता करना ही था और उन्होंने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी कि शरद यादव न घर के रहें न घाट के इसलिए शरद यादव अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और लड़ाई फिलहाल जिस तरीके से छिड़ी है उसमें वे यह मुगालता भी कुछ समय के लिए पाल सकते हैं कि अब भाजपा विरोधी दलों की बारात के असली दूल्हा बनकर उन्होंने नीतीश के दांव से जितना गंवाया है उससे ज्यादा कमाई करने की ओर वे अग्रसर हैं। लेकिन उनका अंजाम क्या होगा इसके लिए अभी पूरी फिल्म आनी बाकी है।

शरद यादव ने उन्हें हाशिये पर करके नीतीश द्वारा लालू से गठबंधन तोड़कर भाजपा से फिर गांठ जोड़ने का जो फैसला लिया था उससे बेहद जलालत अनुभव की थी। लेकिन इसके बावजूद उनमें इतना दम-खम नहीं था कि वे नीतीश से उलझते। उन्होंने इस बात का इंतजार किया कि नीतीश उन्हें मनाने की कोशिश करें और इस दौरान एक बार फिर उन्हें पार्टी में अपना दबदबा बहाल करने का मौका मिल जाए। लेकिन नीतीश उऩको चुका हुआ नेता मान चुके थे इसलिए उन्होंने कोई कोशिश नहीं की बल्कि शरद को उकसाया कि वे जनता दल (यू) से खुद ही पलायन कर जाएं और उन्हें निकालने की तोहमत उनको मोल न लेनी पड़े और अंततोगत्वा नीतीश इसमें कामयाब हुए।

शरद यादव के सामने पहले ही दिन से यह सवाल रहा है कि वे अपने ही द्वारा तैयार किए गए जनता दल यू के घरौंदे को छोड़कर कहां शरण लें, जहां एक बार फिर उन्हें सर्वोच्च नेता की मान्यता मिल सके। लालू यादव एक बार फिर उनके सगे हो गये हैं,लेकिन वे भी उन्हें अब अपने ऊपर ढोने को तैयार नहीं हैं। उधर, अखिलेश की समाजवादी पार्टी भी उनका उपयोग करते हुए सतर्क है। उसे भी यह मंजूर नहीं है कि एक और अभिभावक को अपने सिर पर लादे।

अखिलेश की समाजवादी पार्टी में तो हालत यह है कि उन्होंने पार्टी में हावी रहने वाले पिता मुलायम सिंह यादव और छोटे चाचा शिवपाल को तो दूर धकेल ही दिया था। अब रामगोपाल भी बरायेनाम ही अखिलेश मार्गदर्शक रह गये हैं। अखिलेश उनके मुताबिक नहीं चलते बल्कि अखिलेश के मुताबिक उन्हें चलना होता है। हालत यह है कि मुलायम सिंह के समय रामगोपाल का पार्टी में जो कद था उससे वे बहुत ज्यादा बौने हो चुके हैं। लोग जल्दी में तो यह भूल भी जाते हैं कि समाजवादी पार्टी की अखिलेश के साथ एक और कद्दावर हस्ती है जिसका नाम रामगोपाल यादव है।

ऐसे में शरद यादव दूसरे दल में जाकर और ज्यादा बेआबरू होने की बजाय जनता दल यू में ही असली और नकली की लड़ाई छिड़वाकर किसी मजबूत मुकाम की तलाश में जुट गये हैं। उन्होंने नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में सांझी विरासत को बचाने के शीर्षक से सेमिनार कराया क्योंकि अब वे केवल सेमिनार कराने लायक ही बचे हैं। जनसभा जैसा शो कराने की उनकी हैसियत नहीं है। उनके सेमिनार में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल आये। उस दिन उनका भाषण बेहतरीन था। उन्होंने भाजपा के साथ संघर्ष के राष्ट्रीय फलक को अपने भाषण में बहुत करीने से उभारा। उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही कि देश में दो विचारधाराओं की लड़ाई है। एक विचारधारा के लोग कहते हैं कि देश हमारा है दूसरे लोग गैर हैं इसलिए या तो उन्हें हम खदेड़ेंगे या तो इस बात के लिए मजबूर कर देंगे कि वे दोयम दर्जे के नागरिक बनकर इस देश में बने रहें। दूसरी विचारधारा के लोग कहते हैं कि हम इस देश के हैं। इस देश में अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा के लोग कैसे भाईचारे के साथ रहें, हम इसके लिए पूरी कोशिश करने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगे।

राहुल का यह भाषण मर्मस्पर्शी रहा। जिसे भरपूर सराहना मिली। उनका मीडिया मैनेजमेंट भी अच्छा था। कई चैनलों ने उनके भाषण का सीधा प्रसारण किया, जिसका लोगों पर इंपैक्ट देखकर भाजपा के खेमे में घबराहट भी महसूस की गई, लेकिन पटना में सीन बदला हुआ था। लालू का भाजपा भगाओ देश बचाओ शो बिहार तक सिमटे उनके सरोकारों तक सीमित रह गया था। इस रैली में उन्होंने अपने दोनों पुत्रों तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव को भविष्य के मजबूत नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की। साथ ही नीतीश को सबक सिखाने के लिए कुछ भी कर गुजरने की मंशा दिखाई। लोगों ने कहा कि लालू की रैली सामाजिक न्याय की राजनीति को सींचने की कवायद न होकर पारिवारिक न्याय को मजबूत बचाने का उपक्रम थी और लोगों की इस टिप्पणी को गलत नहीं कहा जा सकता। इसीलिए इसमें शरद यादव सहित दूसरी पार्टियों के सभी नेता बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की हैसियत में आ गये थे।

कांग्रेस ने तो इसी को भांपकर केवल गुलाम नबी आजाद को भेजकर काम चला लिया था। रैली में न सोनिया पहुंचीं न राहुल। उनके केवल संदेश सुना दिये गये। ममता बनर्जी आयीं और उनके आने का मकसद सिर्फ इतना रहा कि वे यह जता सकें कि भाजपा को पटखनी देने का कोई प्रयास कहीं भी हो वे उसमें अपना कंधा देने जरूर पहुंचेंगी। अजीत सिंह के पुत्र जयंती चौधरी भी रैली में आये लेकिन उनके साथ नेपथ्य में कहीं न कहीं यह पुराना गाना जरूर बज रहा था कि गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा हाफिज खुदा तुम्हारा। गिरगिट को भी पीछे छोड़ने वाले उनके पिता चौ. अजीत सिंह ने राजनीति में हृदय परिवर्तन का ओलंपियाड तो जीत लिया लेकिन अपनी विश्वसनीयता समाप्त कर ली जिससे जयंत के राजनीतिक भविष्य की भी भ्रूण हत्या हो चुकी है। उनका साथ मरे हुए सांप को गले में लटकाने से ज्यादा महत्व नहीं रखता।

अखिलेश यादव राजनीतिक संभावनाओं से ज्यादा रिश्तेदारी निभाने की गर्ज से पटना पहुंचे थे। वह भी इसलिए कि जब समाजवादी पार्टी में उठापटक चल रही थी तो लालू ने मुलायम सिंह की तुलना में उनके साथ रिश्ते को तरजीह दी। इसलिए वफादारी का तकाजा कहता है कि वे भी परीक्षा की हर घड़ी में लालू का साथ दें।

ऐसे में शरद यादव ने वही राग अलापा कि असली जद यू तो उनके साथ है। वे इसके लिए चुनाव आयोग में पहले भी जा चुके हैं और 17 सितंबर को उन्होंने नई दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के तमाशे का ऐलान करके इस खाई और असमंजस को और चौड़ा करने का संकेत दिया है। जाहिर है कि शरद हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे के अंदाज में काम कर रहे हैं। दूसरी ओर नीतीश परम निश्चिंत हैं। उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अपनी पार्टी को हिस्सेदार बनाने का फैसला पहले ही लागू कर दिया है। उन्हें इस बात से बड़ा सुकून है कि इसके पहले शरद यादव खुद ही अलग रास्ता नाप गये। जिससे उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दिलाकर फिर संजीवनी देने के धर्मसंकट से वे बच गये हैं।

नीतीश भी इस बीच बेहतरीन अखाड़ेबाज साबित हुए हैं। उन्होंने शरद को जमीन सुंघाने के लिए लाजवाब दांव-पेंच दिखाए। सही बात तो यह है कि राष्ट्रपति चुनाव के बहुत पहले नीतीश भाजपा के साथ जाने का मन बना चुके थे। लेकिन उन्होंने वक्त इसलिए लिया ताकि विपक्ष की ओर से शरद यादव का नाम राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित होने की संभावना को समय रहते कुचल सकें। अगर विपक्ष उन्हें राष्ट्रपति पद के प्रत्याशित कर देता तो वे जीतते भले ही नहीं लेकिन वे राष्ट्रीय राजनीति में शक्तिशाली केंद्र बनकर उनके लिए तमाम समस्याएं पैदा कर सकते थे। इसलिए विपक्ष की बैठकें जब राष्ट्रपति पद के लिए हो रही थीं उस समय वे जानबूझ कर बैठकों से किनारा करते रहे लेकिन ब्लफ देने के लिए शरद यादव को इन बैठकों में भेजते रहे। ताकि विपक्ष उन्हें माइनस करके अपनी रणनीति बनाने की ओर तब तक अग्रसर न हो सके जब तक निर्णायक चौसर न बिछ जाए।

लोग भले ही इस का श्रेय दे रहे हों कि दलित राष्ट्रपति का शिगूफा फेंककर मोदी ने विपक्ष को चित करने का क्या कमाल किया लेकिन सही बात यह है कि यह कमाल नीतीश का था। उन्होंने मोदी को समझाया कि वे बिहार के उस समय के राज्यपाल रामनाथ कोविंद जिनसे उनकी शानदार ट्यूनिंग थी, का नाम राष्ट्रपति पद के लिए आगे लायें। जिसके कारण यह चुनाव दलित कार्ड के लिए चर्चा का विषय बन जाएगा और ऐसे में विपक्ष की मजबूरी हो जाएगी कि वह भी दलित प्रत्याशी को सामने लाये यानी शरद यादवम् स्वाहा और उन्होंने इस तरह शरद यादव का सत्यानाश कर दिया।

लेकिन शरद यादव चाहे जितनी कोशिश करें पर नीतीश के रुख में आये बदलाव को लेकर उन्हें अवसरवादी साबित नहीं कर सकते। सही बात यह है कि सबसे बड़े अवसरवादी तो खुद शरद यादव हैं। अगर सांप्रदायिकता से लड़ने के उनके इरादे इतने ही पक्के थे तो जनता दल के समय पक्षद्रोही बनकर वे भाजपा के खेमे में क्यों चले गये थे। लोग इस बात को भी नहीं भूले हैं कि जब मोदी के नाम पर लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ देने से नीतीश कुमार मना कर रहे थे तब शरद यादव की खिचड़ी भाजपा के साथ पक रही थी, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अकेले उनकी पार्टी किसी करम की नहीं है। इसलिए भाजपा के साथ रहेंगे तो राजग के अध्यक्ष होने के नाते कुछ इतना अच्छा पा जाएंगे कि बहुत अप्रत्याशित हो यानी अगर किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो प्रधानमंत्री पद का फल भी उनकी झोली में आ टपक सकता है। वरना ताकतवर और मलाईदार मंत्री पद तो उनके लिए आरक्षित रहेगा ही। लेकिन नीतीश ने उनकी दाल नहीं गलने दी।

इस बीच जीतनराम मांझी को सनकाकर उन्होंने जिस तरह नीतीश की बेइज्जती कराई उससे नीतीश ने उनका फन कुचलने का इतना मजबूत इरादा बना लिया कि जिससे डिगने की कोई गुंजाइश आगे नहीं बची थी। इसलिए नीतीश ने उनके राजनीतिक करियर की जड़ें खोद डाली हैं। अब तो उनके सामने यही रास्ता बचा है कि वे नीतीश को ठिकाने लगाएं भले ही इसके लिए उन्हें लालू को भस्मासुरी वरदान क्यों न देना पड़े।

लेकिन लालू ने खुद ही खेल बिगाड़ा है। लालू पॉलीटिकल लाइन में ईमानदार हैं इसमें संदेह नहीं। नीतीश इस मामले में उनकी बराबरी नहीं कर सकते लेकिन नीतीश के मन में भी यह अहसास तो था ही कि वही पॉलीटिकल लाइन ज्यादा ठीक है जिसके लालू हामी हैं लेकिन पॉलीटिकल लाइन के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन की उच्च परंपराएं और मूल्यों की भी कोई अहमियत है। लालू इस बात को भूल गये जबकि इसके बिना कोई पॉलीटिकल लाइन अपनी सार्थकता खो सकती है इसलिए अंततोगत्वा उनसे संबंध निर्वाह के लिए अपनी राजनीतिक साख की बलि चढ़ाना नीतीश को गवारा नहीं हुआ तो यह लाजिमी था।

दूसरे सारे उसूल नीतीश के लिए क्यों हैं। शरद यादव ने उन मुलायम सिंह के लिए क्यों अभी तक मुंह नहीं खोला जिनको उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा के खिलाफ जनता दल परिवार की एकता का सिरमौर बनाया था। पर वे दगा दे गये थे। आज वे खुलेआम भाजपा और मोदी की बड़ाई कर रहे थे। उनकी मोदी से सार्वजनिक रूप से कान में बात होती है। किसी भी भाजपा विरोधी मोर्चे में वे आना गवारा नहीं करते। लेकिन अगर मुलायम सिंह बुला दें तो शरद यादव अभी भी बेशर्मी से उनके कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं जबकि पहले उनकी मुलायम सिंह से बनती नहीं थी। मुलायम सिंह के विधानसभा चुनाव के समय के रोल से मुंह की खाते-खाते बचे नीतीश बेहद आहत थे लेकिन इसकी परवाह न कर मुलायम सिंह के सपा के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में जनाब शरद यादव कौन सी धर्मनिरपेक्षता मजबूत करने गये थे। इसलिए शरद यादव तो एक पाखंड रच रहे हैं और कांग्रेस भी समझती है कि नीतीश के साथ निजी खुन्नस निकालने के लिए अपने को इस्तेमाल होने देने की उसकी सीमा क्या होनी चाहिए। कांग्रेस अभी नीतीश के धर्म निरपेक्ष खेमे में लौटने की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं कर रही और लालू का परिवार जिस तरह के आरोपों में उलझा है उसे देखते हुए एक राज्य की राजनीति के लिए देश भर में अपनी साख कहीं न गंवानी पड़ जाए, इसका भी ख्याल कांग्रेस को है। शायद यही वजह है कि सोनिया और राहुल बहाना करके लालू रैली से दूर रहे।

इस रैली को एक और झटका मायावती के रवैये से भी लगा है। जिस पर रैली में किसी ने भी मुंह नहीं खोला। भाजपा के दो एजेंट हैं जो सीबीआई की गर्दन में फंसी अपनी जान बचाने के लिए उसकी बोली बोलने को मजबूर हैं। एक तो मुलायम सिंह हैं जिन्हें भाजपा ने इसलिए लगा रखा है कि वे अखिलेश को ब्लैकमेल करके बसपा के साथ उनके अजेय साबित हो सकने वाले गठबंधन को संभव न होने दें और दूसरी मायावती, जो भाजपा के इशारे पर ही निर्णायक क्षणों में अपनी बात से मुकरने को मजबूर रहती हैं।

दरअसल लड़ाई बहुत साफ है। भाजपा वर्ण व्यवस्था की बहाली के लिए काम कर रही है जिसमें भक्ति भाव की जहरखुरानी से उसने ओबीसी और दलितों के एक वर्ग को भी बेसुधी की हालत में करके अपने पाश में जकड़ लिया है तो दूसरी ओर समता और भाईचारे की व्यवस्था के लिए काम करने वाली राजनीतिक शक्तियां हैं। भाजपा नाम तो राम का लेती है लेकिन उसका काम मारीच नीति से प्रेरित है पर वैश्वीकरण के इस दौर में जब यह स्थापित हो चुका है कि सारी दुनिया में बुनियादी मानवीय मूल्य एक जैसे हैं तो किसी तरह के उपनिवेशवाद के लिए कोई गुंजाइश तलाशना अब बेकार हो गया है। वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक उपनिवेशवाद है जो इस दौर में सलामत नहीं रह सकती। इसे खत्म होना ही होगा। भाजपा केवल व्यक्तियों को मुट्ठी में कर सकती है लेकिन प्राकृतिक रुझान की अग्रसरता को नहीं।


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