बाबागीरी में गुंडों और अय्याशों की पैठ

By: jhansitimes.com
Sep 15 2017 06:38 am
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(editor-in-chief, K.P SINGH) आसाराम, रामपाल, भीमानंद के बाद गुरमीत राम-रहीम के कारनामे खुले जिसके बाद संत समाज में अपनी साख बचाने की तड़पड़ाहट घुमड़ उठी है। हिंदू साधू-संतों के सर्वोच्च संगठन अखाड़ा परिषद में 14 बाबाओं को फर्जी घोषित करके धार्मिक क्षेत्र की शुद्धिकरण की प्रभावी शुरुआत की गई है। फर्जी बाबाओं की सूची में शामिल किए गए कई स्वयंभू संतों ने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की धमकी दे डाली है। अकेले अखाड़ा परिषद के बूते धर्मसत्ता में व्याप्त अराजकता का निवारण हो पाएगा, यह कल्पना मुश्किल है। जब तक समाज विवेक और जागरूकता का परिचय नहीं देगा तब तक धर्म के नाम पर पनपते मजाक को रोकने की कुव्वत किसी में नहीं है।

संत के लिए धर्म में इतनी पाबंदियां तय हैं कि साधारणतया कोई भी व्यक्ति संत बनने के लिए तैयार नहीं हो सकता। इसके लिए बहुत जुनूनी और समर्पित व्यक्ति चाहिए। लेकिन गुरमीत राम-रहीम के कारनामों से उजागर हो गया है कि लोगों की अंधभक्ति के कारण संत समाज में लोगों की भीड़ आ गई है। अपराधी तो फिर भी कोई नियम-संयम मान सकते हैं लेकिन इन्हें उच्छृंलता के मामले में किसी भी हद तक जाने में कोई रंज नहीं है।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि ने 2015 में गाजियाबाद और नोएडा में रियल एस्टेट का काम करने वाले और बीयर बार चलाने वाले सचिन दत्ता को एक समारोह में महामंडलेश्वर की गुरुतर उपाधि प्रदान कर दी थी। इस दौरान हेलीकॉप्टर से सचिन दत्ता पर फूल बरसाये गये थे। अपनी संतई के लिए विख्यात समाजवादी पार्टी के आदरणीय नेता शिवपाल सिंह यादव भी इस कार्यक्रम में शामिल थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें इतनी बड़ी हैसियत से नवाजे जाने की प्रमाणिकता क्या होगी। लेकिन नरेंद्र गिरि को यह कृपा करने के लिए जबर्दस्त आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। यह दूसरी बात है कि फिर भी उन्होंने तात्कालिक तौर पर अपना रुख नहीं बदला। पर अब अपने रवैये में नाटकीय सुधार करते हुए नरेंद्र गिरि ने सचिन दत्ता को भी फर्जी बाबा करार दे दिया है।

महामंडलेश्वर की उपाधि मिलने के बाद शासन और प्रशासन में संत को वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलना शुरू हो जाता है लेकिन क्या कोई असली संत सरकारी सुविधा का भूखा हो सकता है। तथाकथित संत और ब्रह्मचारियों ने लोलुपता में सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। यह नये जमाने का रामराज है। इसमें साध्वी और योगी मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री बनने के लिए न्योछावर हुए जा रहे हैं। इस कारण न मैं तेरी कहूं न तू मेरी कहे की तर्ज पर पुराने मठों के महंतों ने संदिग्ध पृष्ठभूमि के रातोंरात बने स्वयंभू संतों पर उंगली उठाने का साहस करना बंद कर दिया था। यह स्थिति जारी रहती लेकिन जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो अखाड़ा परिषद को सामने आना पड़ा।

धार्मिक प्रतिष्ठानों की गरिमा से खिलवाड़ का हालिया दौर दरअसल राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत में आया जब भीड़ बढ़ाने के लिए छद्म संगठन विहिप ने हर ऐरे-गैरे को साधू का दर्जा दिलाना शुरू कर दिया। इस आंदोलन में धर्मसत्ता नाम की सत्ता की ईजाद की गई जिसका मकसद था एक समानांतर सत्ता के तौर पर धर्माचार्यों को उभारना ताकि गली-चौराहे के लंपट भगवाधारियों के मन में वर्चस्व के लिए उद्दत महत्वाकांक्षाएं पैदा की जा सकें। ध्यान देने वाली बात यह है कि अध्यात्म में सारी सत्ताएं यहां तक कि, खुद की एकता विलोपित हो जाती हैं, वही व्यक्तित्व धर्म के नियामक तंत्र में स्थान प्राप्त कर पाता है। धर्म में कहा गया है कि साधना का प्रस्थान बिंदु तब आता है जब हर तरह की पहचान, हर तरह का अहम विघलित हो जाता है। इस दौर में बाल-बच्चेदारों को शंकराचार्य तक की मान्यता दे दी गई। धार्मिक पदों को निस्तेज करने का जितना अपराध इस दौर में हुआ कभी नहीं हुआ।

भारतीय समाज में लोग धार्मिक नहीं धर्मभीरू हैं। उन्हें ईश्वर का उतना डर नहीं है जितना उनके तथाकथित प्रतिनिधियों का है इसलिए भगवा पहनकर अपने ही घर डकैती डालने वालों तक को रोकने का साहस इस समाज में पीड़ितों तक के बीच ठना है। हालत यह है कि आसाराम बापू अपनी नाबालिग शिष्या के साथ रेप के अपराध में 2013 से जेल में बंद हैं। देश के बड़े से बड़े वकील उन्होंने खड़े नहीं किए लेकिन जमानत नहीं करा पाए क्योंकि अभियोजन के पास उनके खिलाफ अकाट्य सबूत हैं। लेकिन उनके भक्तों की लाखों की तादाद है जो अभी तक बापू को पूजती है और वे कहते हैं कि बापू खुद जेल में बने रहने के लिए लीला कर रहे हैं। जिस दिन वे चाहेंगे उस दिन उन्हें बाहर निकलने से कोई नहीं रोक पाएगा। इतनी मूर्खता दुनिया के शायद ही किसी समाज में हो।

भारत सचमुच सोने की चिड़िया था लेकिन इस देश में 95 प्रतिशत लोग रोटी और कपड़ा तक को तरसते थे। वजह थी संसाधनों पर गैर उद्यमी और गैर नवाचारी मानसिकता से ओतप्रोत लोगों का कब्जा, उन्होंने कलदार,सोना-चांदी जमीन में गाड़ रखा था। आजादी के बाद स्थिति में परिवर्तन आया लेकिन अब देश फिर उसी स्थिति में लौट रहा है। हाल ही में एक सर्वे में पता चला था कि देश के केवल 4 मंदिरों में जो सोना है वह भारत सरकार के गोल्ड रिजर्व से 40 गुना ज्यादा है। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि सोना पाप की जड़ है क्योंकि महाराज पारीक्षित ने कलियुग को सोने में आश्रय प्राप्त करने के लिए अधिकृत किया था तो पाप की सामग्री का ईश्वर के घर में यानी मंदिर में क्या काम है।

हर कोई साधू-संत बनकर इन मंदिरों के वैभव से होड़ लेना चाहता है। जिसका नतीजा है कि बाबाओं के मठों में ही सारा धन जमा होता जा रहा है। विलासिता इसका अनिवार्य परिणाम है। ऐश्वर्य और विलासिता साधू-संतों का चरित्र नष्ट कर देती है और बिना चरित्र के कोई कैसा संत है,लेकिन लोग तो ऐसे नकली संतों के चरणों में लोटे जा रहे हैं क्योंकि लोग अपराध बोध से ग्रसित हैं। वर्ण व्यवस्था और दूसरे कारणों से उनके दिमाग में पापों का बोझा जो है।

बाबा साहब अंबेडकर ने 1932 में लाहौर में जाति-पात तोड़क मंडल के अधिवेशन के लिए तैयार अपने भाषण में हिंदू समाज से अपनी धार्मिक व्यवस्था को संगठित करने के लिए मौलिक ग्रंथों, स्मृतियों और संहिताओं की घोषणा तत्काल करने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि इन्ही के अनुरूप हिंदू धर्म में धार्मिक पद के लिए दूसरे धर्मों की तरह न्यूनतम योग्यता निर्धारित की जाए लेकिन हिंदू धर्म को पापाचार का अड्डा बनाने की मंशा रखने वालों ने यह नहीं होने दिया। एक अलग मुद्दा उठ रहा है कि जितने भी संत पापाचार में पकड़े गये हैं वे सभी गैर ब्राह्मण हैं क्योंकि हिंदू धर्म में गैर ब्राह्मणों को किसी मंदिर-मठ में पीठाधीश्वर बनने की इजाजत नहीं है। यह तर्क सही है लेकिन इसे लागू करना मुश्किल है क्योंकि हिंदू धर्म में कोई नीति-संहिता के मुताबिक काम नहीं हो रहा है।

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी, जमींदारी की पृष्ठभूमि से आये न्यायाधीशों ने सीलिंग एक्ट को विफल करने के लिए मंदिर के नाम पर धड़ाधड़ जमीन छोड़ी। इसके बाद यह होना चाहिए था कि इस जमीन और उसकी आय में गबन न हो पाये। आमदनी, खर्च का आडिट हो। एक-एक खर्च के लिए प्रमाणित वाउचर लगवाया जाए लेकिन यह जमीन निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल की जा रही है। धर्म के लिए इसकी आमदनी में कोई जवाबदेही नहीं है। अब हिंदू धर्म का कबाड़ा नहीं होगा तो क्या होगा। क्या अखाड़ा परिषद यह भी परामर्श देगी कि मंदिर की जमीनों से धर्मार्थ कार्य नहीं हो रहे उन जमीनों को सरकार जब्त कर लेगी।


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