काम की बजाय अपराजेयता के आतंक को भाजपा ने दी अपनी रणनीति में सर्वोपरि जगह

By: jhansitimes.com
Aug 22 2017 08:28 am
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(K.P SINGH, EDITOR-IN-CHIEF)  भाजपा की रणनीति बहुत कुछ साफ हो चली है। साफ-सुथरी राजनीतिक व्यवस्था बनाने और तार्किक विकास को गति देने की चुनौती के मामले में उसने अंततोगत्वा हारी मान ली है। आप चाहे जितने हक पर हों लेकिन भारतीय समाज में लड़ाई जीतने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है। साम, दाम, दंड, भेद हर तरह के पैंतरे अपनाने पर ही भारतीय समाज में विजय सम्भव है। यह धारणा भगवान श्रीकृष्ण के जमाने से कायम है और कायम बनी हुई है इसलिए हक की लड़ाई के योद्धा अपने को कामयाब करने के लिए यहां दूसरे के हक छीनने में किसी तरह का धर्मसंकट अनुभव नहीं करते।

गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए हुए चुनाव में यह बात बहुत स्पष्टता के साथ उजागर हुई। भाजपा गुजरात में राज्यसभा की दो सीटें जीतने की स्थिति में थी लेकिन तीसरी सीट जीतने के लिए उसने जबर्दस्ती की जिसका सुख तब उसे और ज्यादा महसूस हो रहा था जब यह दिखाई दे रहा था कि अगर अहमद पटेल हारे तो चूंकि वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार हैं इसलिए कांग्रेस की ज्यादा बड़ी हेटी होगी। इस जीत को सम्भव बनाने के लिए भाजपा ने सारी मर्यादाएं तोड़ीं। पहले तो गुजरात कांग्रेस विधायक दल में प्रलोभन देकर तोड़फोड़ कराई। इसके बाद भी काम नहीं बना तो कर्नाटक के जो कांग्रेसी मंत्री गुजरात के पार्टी विधायकों को सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध करा रहे थे उनके यहां आयकर की ताबड़तोड़ छापेमारी हुई। यह लिखने का मकसद संबंधित मंत्री को क्लीनचिट देना नहीं है, लेकिन गुजरात में राज्यसभा के चुनाव के समय ही इस तरह की तेजी क्यों दिखाई गई और उक्त चुनाव के नतीजे आने के बाद भ्रष्टाचार के महासमुद्र में स्वच्छता के स्वप्निल द्वीप खोजने में जुटे केंद्र सरकार के कोलम्बस कहां लापता हो गये। इसका हिसाब तो आखिर उनको देना ही चाहिए।

जब कोई कार्रवाई समग्रता में होती है तो उंगली उठाने की मंशा रखने वाले कमजोर पड़ जाते हैं लेकिन सिलेक्टिव कार्रवाई व्यवस्था के कर्ताधर्ताओं की मंशा को संदेह के घेरे में ला खड़ा करती है। भाजपा की सरकारों की कार्यशैली इसी विरोधाभास को इंगित करने वाली है। उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी की राजनीतिक शैली इस इंतहा तक थी कि भाजपा नेताओं का खूनी दमन करने में भी कसर नहीं छोड़ी गई। पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी इसको ज्यादा अच्छी तरह से बता सकते हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें भी राजनीतिक हिंसा का शिकार होना पड़ा था। लेकिन विधानसभा के अंदर उस समय तांडव मचाने वाली राजनीतिक ताकतें आज भाजपा नेतृत्व के लिए आदर और श्रद्धा का पात्र बनी हुई हैं। नेताजी महान नेता हैं, यह सोच उनसे अनधिकृत रूप से उनको उपलब्ध सरकारी गाड़ी छीनने में बाधक बन जाता है। नेताजी लोकसभा में जब भाषण करते हैं तो भाजपा के नेता दत्तचित्त शिष्य की तरह उन्हें सुनने में गौरव अनुभव करते हैं। नेताजी ने पिछले दिनों लोकसभा में बताया कि सबसे पहले सांसदों को शपथ लेनी चाहिए कि वे अपनी पत्नियों के साथ कोई अत्याचार नहीं करेंगे क्योंकि हिंसा के शिकार वर्गों में महिलाएं सर्वोपरि हैं। अगर उनके प्रति हिंसा के भाव को लेकर डर पैदा होगा तो समाज में हिंसक मनोवृत्ति का अपनेआप सफाया हो जाएगा।

नेताजी ने कितनी सुंदर बात कही और यह बात केवल वे ही कह सकते हैं क्योंकि उनकी असल पत्नी के जिंदा रहने के कई वर्षों तक नेताजी उप पत्नी से काम चलाते रहे थे और उनसे विधिवत विवाह उनकी मृत्यु के बाद कर पाये। उनके नये विवाह को जितने बरस हुए हैं उससे डेढ़ दशक पहले उनके दूसरे पुत्र का अवतार हो चुका था। पहली पत्नी पर नेताजी के इस आचरण की वजह से कई वर्षों तक क्या गुजरती रही होगी, यह कहने की जरूरत नहीं है। फिर भी नेताजी ने पत्नी के प्रति वफादारी की डींग हांकी तो भाजपाइयों ने उनका प्रतिवाद न कर भक्ति भाव से उनको सुना। इस दौरान कई सांसद ऐसे थे जिन्होंने अयोध्या में 1990 में कारसेवा के दौरान नेताजी की पुलिस की गोलियां झेली थीं। वे राम को अपना आराध्य मानते हैं और उनके लिए प्राण तक होम देने में गौरव अनुभव करने की बात कहते हैं। इसलिए उनका कहना था कि रामभक्तों पर गोली चलाने वाले नेताजी उनकी निगाह में कभी माफ नहीं होंगे। पर तमाम कार्यकर्ताओं को इस तरह की गप्पबाजी में भावुक बनाकर शूली पर चढ़ने के लिए तैयार करने वाले भाजपा के फर्जी भक्त आखिर उनके संहार का पुनीत कर्तव्य निर्वाह करने वाले नेताजी के भक्त हो गये हैं, यह कितना क्रांतिकारी परिवर्तन है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के हालिया चुनाव के पहले भाजपा के हलकों में पार्टी के लोगों की जमीन-जायदाद पर सत्ता के जोर पर सपाइयों का कब्जा सबसे बड़ा मुद्दा था। इसीलिए योगी सरकार ने पदारूढ़ होने के बाद सर्वोच्च प्राथमिकता में इस वायदे को शामिल किया था कि सपा के दबंगों द्वारा किए गए अवैध कब्जों को त्वरित गति से खाली कराकर उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाएगी जिससे नजीर कायम हो पर योगी सरकार अब इससे मुंह चुरा रही है। अगर उसमें शिवपाल सिंह के अंदर बहुत गुण दिखने लगे हैं तो फिर उसे बताना होगा कि कब्जा कराने वाले माफियाओं की शिनाख्त करने की उसकी परिभाषा क्या है। मुलायम सिंह जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो अपने गृह राज्य में अपनी ही पसंद के एसएसपी बृजलाल को उन्होंने किस कारण से निलंबित किया था, यह किस्सा लोगों को अभी भी याद होगा। तब जमीन कब्जे का ही मामला था जिसमें शिवपाल के इनवॉल्व होन की बात सामने आयी थी। छपा था कि कब्जा करने वाले शिवपाल समर्थकों को जब पुलिस ने बंद किया तो शिवपाल थाने की हवालात से उन्हें जबरन छुड़ाकर ले गये और इसके बाद जब शिवपाल पर बृजलाल ने कार्रवाई करने का इरादा जताया तो उनको निलंबित कर उन्हें नौकरी से मंसूख करने के साथ-साथ उनके जिंदगी के सफर को रोकने का ताना-बाना बुना गया।

बृजलाल आज बीजेपी में हैं और चुनाव के पहले ही बीजेपी में शामिल हो गये थे। तब सपा से त्रस्त होने के कारण भाजपा नेता उद्वेलित थे और बृजलाल को हीरो के रूप में पेश कर रहे थे, लेकिन आज भाजपाइयों के हीरो शिवपाल हैं और अपने हीरो को दुखी न करने के लिए उन्होंने बृजलाल को हाशिये पर धकेल रखा है। बात अकेले शिवपाल की नहीं है। झांसी मंडल का उदाहरण दें तो अवैध कब्जा करने वाले सबसे बड़े सरगना कौन हैं। उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है। वे दिखावे के लिए भाजपा सरकारों के खिलाफ पत्रकार वार्ताओं में जमकर जहर भी उगलते हैं। फिर भी उनका बाल बांका नहीं किया जा रहा। रिक्शा वाले छाप लोग एकाध प्लाट के कब्जे को आधार बनाकर माफिया के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं ताकि आंकड़ों की बाजीगरी से अपने वायदे के अमल में ईमानदारी का दिखावा भाजपा कर सके। क्या यह बात लोगों की निगाह से ओझल है।

भाजपा अव्यक्त तौर पर जनमानस में यह स्थापित कर रही है कि साफ-सुथरी व्यवस्था के लिए दोटूक लड़ाई लड़ने का हौसला असम्भव है। इसलिए लोग भाजपा से अपेक्षा न करें। भाजपा ने लोगों से दूसरे वरदानों का वायदा किया है, वे अपना ध्यान उन्हीं वरदानों में केंद्रित करें। इन वरदानों में भारत को अमुक संप्रदायमुक्त बनाना और आरक्षण के दंश से निजात दिलाना शामिल है। यह काम हो सके इसके लिए भाजपा को सत्ता में बनाए रखना जरूरी है और जिसके लिए भाजपा जो स्याह-सफेद करे लोग उसके बारे में आलोचकों की प्रतिकूल टिप्पणी को कोई तवज्जो न दें।

इसीलिए तमाम सरकारी एजेंसियों और संस्थाओं के सत्ता को बनाये रखने के लिए दुरुपयोग को लेकर भाजपा जो आलोचना करती थी, आज सत्ता में आने पर वह उसी नीति को अमल में ला रही है। बिहार में गठबंधन तुड़वाने के लिए मीसा और तेजस्वी के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी कराई गई लेकिन जैसे ही नीतीश भाजपा शरणम् गच्छामि हुए उसके बाद इस मामले में उत्साह को फना कर दिया गया। इस सीरियल के गुजरात एपीसोड के बाद भाजपा का असल चेहरा और ज्यादा उभऱ कर सामने आया है। कोई देश और कौम जो लंबे समय तक गुलाम रहती है आजाद होने के बाद भी उसकी गुलामी से जुड़ी ग्रंथियां खत्म नहीं हो पातीं। भाजपा ने जनमानस की इसी कमजोर नब्ज पर हाथ रखकर अपनी सफलता का ताना-बाना बुना है। सुशासन और अच्छे काम के चक्कर में पड़ने की बजाय भाजपा मनोवैज्ञानिक तरीके से लोगों को अपने समर्थन के लिए बाध्य करने का परिवेश रच रही है। एक जमाने में कांग्रेस ने भी यही किया था कि उसको हराया नहीं जा सकता इसलिए कई दशकों तक उसने राज किया। भाजपा भी साम, दाम, दंड, भेद से अपने को ऐसी ही करिश्माई पार्टी के रूप में पेश करने में लगी है जिसे हराया नहीं जा सकता।

भाजपा को अभी 50 प्रतिशत से बहुत कम लोगों का समर्थन हासिल है इसलिए अगर विपक्ष एकजुट होकर उसका मुकाबला करे तो भाजपा के पैर उखड़ सकते हैं। भाजपा यह सम्भव न होने देने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा विपक्षी एकता को छिन्न-भिन्न करने में लगा रही है। उसने सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग को इस स्वार्थ साधन का सबसे बड़ा औजार बनाया है। इसी का नतीजा है कि मायावती अब विपक्ष के महागठबंधन से कतराने की मुद्रा अपना चुकी हैं। पटना में इस महीने के अंत में लालू द्वारा बुलाई गई विपक्ष की संयुक्त रैली में भाग लेने से अनमनापन दिखाकर उन्होंने जाहिर कर दिया कि वे भाजपा के किस कदर दबाव में हैं। इसके पहले शरद यादव द्वारा दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित भारत बचाओ सेमिनार में भी वे नदारद रही थीं जबकि उक्त सेमिनार में राहुल गांधी ने बहुत समय बाद लाजवाब भाषण दिया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश में दो तरह के लोग हैं। एक भाजपा के लोग जो कहते हैं कि यह देश हमारा है इसलिए मुसलमान, दलित इस देश से भाग जाएं, दूसरे हम लोग हैं जो कहते हैं कि हम इस देश के हैं इसलिए देश को एकजुट बनाये रखने के लिए वे जितनी भी जरूरत होगी उतना ज्यादा झुकने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

मायावती ही नहीं कई और विपक्षी दल भी महागठबंधन की उक्त कवायद से नदारद रहे थे। इससे मीडिया को यह कहने का मौका मिल गया कि भाजपा इतनी अदम्य हो चुकी है कि उसका मुकाबला अब कई वर्षों तक सम्भव नहीं है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भी इस मामले में ढुलमुल है। मुलायम सिंह और शिवपाल तो परोक्ष रूप में भाजपा का हितसाधन कर ही रहे हैं अखिलेश भी कहीं न कहीं नरम हो गये हैं। शायद उन्हें अपने पिता की समझाइश हो जो इतने कलाकार हैं कि ऊपरी तौर पर उनके खिलाफ अपने भाई को निभा रहे हैं लेकिन दरअसल वे अपनी दूसरी पत्नी, उनके पुत्र और अखिलेश को आय से अधिक संपत्ति जैसी किसी भी जांच की आंच से मुक्त रखने के लिए बहुत सचेत हैं। उन्होंने इसी मकसद से बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह, सरोजनी अग्रवाल और अशोक वाजपेयी को भाजपा में निर्यात किया है जबकि भाजपा में बाहरी नेताओं की आमद से समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्हें ज्यादा भाव मिलने से गर्दिश के दिनों के भाजपाई कुंठा का अनुभव कर रहे हैं।

लेकिन कुल मिलाकर यह तरीके गलत हैं। वीपी सिंह के आंदोलन के बाद भाजपा को अवसर देकर साफ-सुथरी राजनीतिक व्यवस्था की बाट एक बार फिर लोगों ने देखी थी लेकिन भाजपा उसे पूरा करने में खरी साबित नहीं हो पा रही। इसलिए अपराजेयता के आतंक से लोगों का समर्थन कबाड़ने की रणनीति पर उसका अमल है। जिससे लोगों का जल्द ही मोहभंग होना लाजिमी होगा।


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