अपराधियों और सफेदपोश नेताओं की गिरफ्त में पत्रकारिता, झूठ का कारोबार बना सच के लिए चुनौती

By: jhansitimes.com
Jun 16 2017 02:52 pm
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झांसी। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित इसलिए विदेशी सरकार की दमन नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था। उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य निर्माण की चेष्टा और हिन्दी प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी काफी तेज और पुष्ट था।  वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता ने जहां अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया और हिन्दी भाषा का झण्डा चंहुदिशा में लहराया। वहीं आज के दौर में हिन्दी पत्रकारिता का स्वरुप धीरे-धीरे बदलता चला गया है। एक तरफ  प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और डिजीटल मीडिया का तेजी से फैलाव हुआ हैं, उसी के साथ इसमें भी तमाम तरह से विकृतियां भी प्रवेश कर गई है।  

आज वर्तमान में मीडिया की तस्वीर को सामाजिक परिपेक्ष के आइने में देखा जाए तो अब नई फौज ने पत्रकारिता के मायने को ही बदल डाला है। पीत पत्रकारिता दम तोड़ रही है। वहीं समाज के समक्ष व्यवसायिक, चाटुकारिता, अव्यवहारिक शब्दावलियों की पत्रकारिता का एक नया मुखोटा सामने आ गया है। जिसने पत्रकारिता के मानक को ही बिखेर कर रख दिया है। समय के साथ इस क्षेत्र में ऐसे बदलाव आये हैं जिससे पत्रकारिता के आधारभूत स्तंभ पर प्रश्न चिह्नि लगने लगा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया में ऐसे तत्वों का प्रवेश हो गया जो कभी मीडिया से बचा करते थे। आज वह अपने निजी स्वार्थ के लिए समाचार पत्रों को बचाव का हथियार बना रहे हैं। वहीं, धनबल के बल ऐसे समाचार पत्रों के मालिक बनकर पत्रकारिता के मानक को ही बदलने में काफी हद तक सफल भी हुए हैें। अपने करतूतों को छिपाने के लिए मीडिया को हथियार बनाना शुरू कर दिया। समाचार पत्र और संपादकीय के स्वरूप को अपने ढांचे में ढालने लगे। वहीं, स्वच्छ और स्पष्ट लेखन की पारदर्शी पत्रकारिता सिमटती चली जा रही है। अब चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट, मात्र निगेटिव  सोच के दायरे में पत्रकारिता बंध कर रह गई है। साथ ही आपराधिक किस्म को लोग और सफेद पोश नेता पत्रकार बनकर रौब झाड़ रहें हैं। 

संपादकीय में मालिकानों का दलखल

एक समय था जब समाचार पत्रों के संस्थापक और संचालन कर्ता संपादकीय विभाग से खुद को दूर रखते थे। यहां तक की मालिकान संपादक व सम्पादकीय विभाग के पत्रकार से बचने की कोशिश करते और बहुत कम उनसे मुलाकात करते थे। एक मालिक अगर किसी संबंधी या प्रतिष्ठित व्यक्ति से संपादकीय के लोगों की मुलाकात कराता तो बेहतर सम्मान देते हुए उनके सामने प्रस्तुत किया जाता था। वह उन्हें नौकर नहीं बल्कि बहुत बड़ी शख्सियत समझते थे। जिसकी मिशाल दैनिक आज के संस्थापक शिवप्रसाद गुप्त ने उन्ही के अखबार में संपादक पाडारकर को दी थी। जिसका आज भी लोग काशी की नगरी में सम्मान करते हैं। दूसरी ओर आज के दौर में तथाकथित मालिकान संपादकीय विभाग और सम्पादक के गौरव, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा से अनजान हैं वह मात्र यह सोचते हैं कि हमारे यहां काम करने वाले एक साधारण व्यक्ति है। वहीं, मालिकान सीधे तौर पर अब समाचारों में हस्तक्षेप करते हैं। वह अपनी सुविधा के अनुसार समाचार पत्रों में खबरों को प्रकाशित करना चाहते जिससे उनका काम बन जाए। इससे पत्रकारिता कूपमंडूक सी होती जा रही है। 

पत्रकारिता में अराजकता

आज के दौर में पत्रकार बनने की एक होड़ सी बची है। जिसे देखो वह अपने को पत्रकार मानने लगा है। जिसे कोई बैनर नहीं मिला वह मोबाइल व वाट्सअप, फेसबुक व नेट पत्रकार बन गया। वहीं, कुछ ऐसे लोग जो कुछ सम्पन्न है उन्होंने टाइटल लेकर अखबार चालू कर दिया। और संपादक बन गये,यहीं नहीं मान्यता प्राप्त पत्रकार तक बने पड़े हैं जिन्हे कभी समाचार लिखने से कोई लेना देना नहीं है। इस प्रकार की आज के समय में काफी बड़ी फौज दिखाई दे रही है। वहीं कुछ ऐसे लोग हैं जो आपे चलाते हैं और पत्रकार हैं, कैमरा लेकर घुमते थे वह क्राइम रिपोटर हो गये। देखा गया है जिसे कोई काम नहीें मिला वह आज के दौर में पत्रकार का लेबल लेकर वाहन पर प्रेस लिखा लिया। इस प्रकार से पत्रकारिता के स्वरूप को विकृत कर समाज में ऐसी अवधारणा पैदा की जा रही है कि आमजन के अंदर भी अब इस स्वच्छ स्तंभ के प्रति नकारात्मक सोच पैदा होने लगी है। यहा तक देखने में आया है कि तथाकथित लोग वारदात , या ऐसी घटना जिसे परिजन सार्वजनिक नहीं करना चाहते वहां पर जानकारी मिलते ही लोग पहुंच जाते और सौदे बाजी तक करने लगते हैं। अब पत्रकारिता का स्तर यहां तक पहुंच गया है कि विज्ञापन के बदले अवैध कामों के व्यापारी व सफेदपोश नेता कठपुतली बनकर झूठी खबरों को परोस कर जनता को और पत्रकारिता के पेशों गुमराह करत ेहैं।  

एक नया ट्रेंड जनर्लिस्ट लिखने का

अब एक नया दौर देखने को मिल रहा है। जिस प्रकार दुकानदार, या फिर व्यवसायी जिस धंधे को करते  हैं वह अपने नाम के आगे सर नाम कारोबार का लगा देते हैं। इसी प्रकार से आज कल पत्रकार बनने वाले नये नवेले चेहरे कुछ अधिक ही प्रचलित होना चाहते हैं। इस लिये अपने नाम के आगे वह लोग जनर्लिस्ट लिखने लगे हैं। हालांकि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता है, इस पर कोई विरोध नहीं किया जा सकता लेकिन विचार व्यक्त करना हर किसी का अधिकार है। ऐसे पत्रकारों को मेरी शुभकामनाएं कि ईश्वर सद्वुद्धि दे कि पीत पत्रकारिता के आदि स्वरूप सारगर्भित मानक को समझे और परिमार्जित शैली भाषा के साथ इस मिशन को आगे बढ़ाये।  


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