जुमलेबाज नहीं क्रांतिद्रष्टा बनिये मोदी जी.... प्रधान संपादक के. पी सिंह

By: jhansitimes.com
Jul 31 2018 09:56 am
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुमलेबाजी की कला का वैसे भी कोई जबाव नही है। अपने इस अंदाज को उन्होंने लखनऊ में इंदिरा गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रधानमंत्री आवास योजना, स्मार्ट सिटी योजना और अमृत योजना की तीसरी वर्षगांठ पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए एक बार फिर उकेरा। उन्होंने अखिलेश यादव के लिए उनका नाम लिए बिना कहा कि योगी के पहले जो सरकार में थे उनसे वे काम के लिए कहते रहे लेकिन उस सरकार को अपने बंगले सजाने-सवारने से ही फुर्सत नही मिली काम की बात कैसे सुनती। केवल तालियां बटोरने की बजाय किसी सार्थक उददेश्य के लिए कोई बात कही जाये तो वह जुमलेबाजी नही रह जाती एक क्रांतिदृष्टा और जुमलेबाज के बीच यही अंतर होता है।

मोदी ने बंगले सजाने-सवारने पर चुटकी लेकर नब्ज तो सही पकड़ी लेकिन यह बात उन्होंने सिर्फ तालियां बटोरने और अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए कही न कि किसी नई लीक बनाने के मकसद से। काश उन्होंने जो कहा उसके पीछे राजनीति में पनपती जा रही वैभव और दिखावे की संस्कृति को बदलने का जज्बा होता। क्रांतिदृष्टा सड़ी-गली व्यवस्था के निहित स्वार्थों से लड़ता है जबकि उसे मालूम होता है कि इन शक्तियों की अपनी मजबूत हैसियत है। जिसके कारण उनको ललकारना जोखिम का सौदा साबित हो सकता है। पर जिन लोगों ने इसकी परवाह नही की उन्होंने ही हमेशा नया इतिहास रचा है। पर आज जमाना व्यवस्था की सड़ांध का प्रतीक बन चुके लोगों की दीवाल से टकराकर अपना सिर फोड़ने का नही रहा। यह ऐसी दीवानगी का जमाना नही है बल्कि यह सिरफिरेपन की बजाय बड़े सयानपन का जमाना है। यह तो मैनेजमैंट का जमाना है। जिसमें समाज के प्रभुत्वशाली तबकों को साधे रखकर दीर्घकाल तक सत्ता हाथ में रखने का मंत्र सिद्ध किया जाता है। इसलिए वर्तमान सत्ताधारियों के सारे कटाक्ष प्रतिवाद और व्यग्योक्तियां एकांगी होने के साथ-साथ मनोरंजन का माध्यम है दिशा बदलने के इरादे इनमें देखना भोलापन होगा।

सार्वजनिक जीवन में कुछ दशक पहले तक सादगी का बड़ा महत्व था। तब यह बात भी थी कि सरकारी खजाने का आयतन भी सीमित होता था। खासतौर से जनप्रतिनिधियों को चाहे वे सांसद, विधायक हो या मंत्री अनावश्यक तड़क-भड़क के लिए सरकारी खजाने का एक पैसा खर्च करने में भी दर्द होने लगता था। नौकरशाही भी अपने बोस लोगों की रीति-नीति की वजह से खुला खेल फरुर्खाबादी खेलने की बजाय सहम कर काम करती थी। लेकिन यह ढर्रा जल्द ही बदल गया। लोकतांत्रिक सरकारें जैसे ही कर बटोरने में औपनिवेशिक सरकारों को भी मात देने में जुट गई और सरकार का खजाना तंगहाली से उबरकर उफनाने लगा वैसे ही जनप्रतिनिधियों के हावभाव बदल गये। सड़क छाप लोगों में चुनाव जीतते और पद प्राप्त करते ही बंगले से लेकर हर चीज को जनता के पैसा के खर्च पर आलीशान बनाने की होड़ चल पड़ी। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस के लोगों ने बहुत बेदर्दी से सरकारी खजाने का इस्तेमाल अपने ढाटबाट दिखाने के लिए किया तो भाजपा के लोग भी कहीं से इसमें पीछे नही हैं। चाहे केंद्र की बात हो या राज्य की बात हो नये बनने वाले मंत्री को अपने पूर्ववर्ती से कितना भी टिपटाप बंगला मिले फिर भी उसमें नये सिरे से काम कराने से वह अपने को रोक नही सकता। सड़कछाप नेता भी पद पाते ही इतना शौकीन हो जाता है जैसे सोने की चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ हो। खुद नरेंद्र मोदी तक इस कुटेब से परे नही रह सके। एक महात्मा गांधी थे जो पढ़ाई से लेकर दक्षिण अफ्रीका में प्रेक्टिस के लिए पहुंचने तक सूटेड-बूटेड रहने के अभ्यस्त रहे लेकिन जब उन्हें लगा कि अपने गरीब देश में जनता से तादात्म्य में यह पहरावा एक बड़ी बाधा है। तो उन्होंने सुख-सुविधा की परवाह नही की और एक झटके में जीवन भर के लिए अधनंगे फकीर का बाना ओढ़ लिया। दूसरी ओर मोदी जी हैं जो हर मौके पर अपनी जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि का एहसान इस निरीह देश के लोगों पर थोपते-थोपते उनका कचूमर निकाले दे रहे हैं अगर वे यह सही बोलते हैं कि बचपन में गुजार के लिए चाय बेचते थे तो उन्हें सूट-बूट तो छोड़िये जैसे कपड़े मिल जायें वही बहुत था। फिर सत्ता पाते ही उन्हें ऐसा क्यों लगने लगा कि अगर उन्होंने सज-सवरकर रहना नही सीखा तो जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता नही हो पायेगी। कपड़े और ऊंचे रहन सहन के मोहताज तो फिल्म स्टार अथवा क्रिकेटर अथवा माडल होते हैं। जन नेता के लिए सजना-सवरना कोई मजबूरी नही है। महात्मा गांधी को अधनंगा रहने के बाद जितनी श्रद्धा और स्वीकार्यता मिली वह एक मिसाल है। वह जनमानस के बीच सबसे ऊंचे महात्मा और बापू के रूप में पहचाने जाने लगे।

बेशक इसके बावजूद हो सकता है कि मोदी का अपने दिखावे का खर्चा अपने ही दूसरे सहयोगियों से कहीं बहुत कम हो लेकिन यह नही भूलना चाहिए कि परिधान बदलने के मामले में उनकी शौकीन मिजाजी का एक प्रतीकात्मक प्रभाव व्यापक रूप से हुआ है जो सार्वजनिक जीवन में सादगी के मूल्यों के लिए बेहद क्षतिकारक सिद्ध हुआ है। भाजपा के चाहे प्रदेशों के राजनेता हो या केंद्र के अपने बंगले की साज-सज्जा कराने में वे दूसरी पार्टियों के नेताओं से कहीं कम नही हैं। जबकि भाजपा को अपने आप को पुरातन संस्कृतिवादी पार्टी कहने के नाते इस मामले में अलग नजीर स्थापित करनी चाहिए थी तब मोदी का अखिलेश को उलाहना देना भी ठीक था।

नेताओं की विलासी और एश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की बढ़ती ललक चक्रवृद्धि ब्याज की तरह सरकारी खजाने पर भारी फिजूलखर्जी लादने का कारण बनती है। वजह यह है कि जब नेता बदले तो नौकरशाही के मन में भी अदब लिहाज खत्म हो गया और वह भी सरकारी खजाने के अपनी सुख-सुविधा के लिए पूरी दरियादिली के रास्ते में चलने के लिए छुटटा हो गई। यही वजह है कि मनरेगा के प्रशासनिक व्यय से जो कि मजदूरों का हक है डीएम और सीडीओ साहबान के बंगलों में इटालियन कमोड लगाये जा रहे हैं जिनकी कीमत लाखों में है। उधर ट्रेफिक जुर्माने से जो बजट यातायात को सुव्यवस्थित रखने के लिए पुलिस के कप्तान साहबों को मिलता है। उसके जरिये उनके बंगले की बेहतरीन डेकोरेशन होती रहती है। देश में आडिट सिस्टम नाम की कोई चीज नही है। इसलिए अधिकारी खर्च के लिए जो मानक तय हैं उनसे परे जाने में कोई खौफ महसूस नही करते और सरकारी पैसे को खर्च करने में मनमानी का नंगा नाच करते हैं। समय बीतने के साथ-साथ फंडिग के लिए अधिकारियों की मदें बढ़ती जा रही हैं। वैसे-वैसे अपने ऐशोआराम के लिए सरकारी खजाने में मुंह मारने का अवसर भी उनके लिए बढ़ता जा रहा है।

लोग कहते हैं कि स्विटजरलैंड का विकास इसलिए है कि वहां नागरिक अपनी आमदनी में से 80 प्रतिशत सरकार को टैक्स देता है। लेकिन अगर देखा जाये तो इस देश में तो आम आदमी जिसके पास टैक्स देने से भागने का कोई रास्ता नही है। उसे 95 प्रतिशत तक टैक्स देना पड़ रहा है। फिर भी विकास कराने के लिए यहां की सरकार विदेशी कर्जा लेती है। रोटी-कपड़ा और मकान नागरिक की तीन बुनियादी जरूरतें हैं। जिनकी पूर्ति राज्य के लिए कम से कम खर्च में करना जरूरी है। लेकिन एक बेघर आदमी का यह हक सरकार आसानी से छीन लेती है क्योंकि उसका जमीनों के सर्किल रेट बढ़ाने का कोई पैमाना नही है। सरकार न हुई लुटेरों का गिरोह हो गई जो रातों-रात जमीनों का सर्किल रेट कई गुना बढ़ाकर एक अदद आशियाने के लिए परेशान आम आदमी के अरमानों पर पानी फेर देती है। सही बात तो यह है कि सरकार जिन्हें टैक्स देना चाहिए उनका कुछ नही उखाड़ पा रही है। एक चैनल पर दो वर्ष पहले खबर प्रकाशित हुई थी कि देश के अरब पति धन्ना सेठ और नेता खेती से करोड़ों की आमदनी का रिटर्न भरकर टेक्स देने के झंझट से छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे लोगों की जांच होनी चाहिए थी। पर यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और मीडिया को भी सैट करके इस मामले में शांत कर दिया गया। अब कल्पना करिये कि अगर यह हालत रही तो कितना भी टैक्स लग जाये लेकिन विकास की असली जरूरतों के लिए अपने संसाधनों से पूर्ति इस देश में होना असंभव है।

चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी आशु कवि से ज्यादा बड़े जुमलेबाज हैं इसलिए उनकी तुलनाएं भी अदभुत होती हैं। उक्त राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन भी उन्होंने इस महारत का नमूना पेश किया। जब उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी भी तो बिड़ला के यहां रुकते थे। फिर उनके उद्योगपतियों से संबंध रखने पर उंगलियां क्यों उठाई जा रही हैं। यह तुलना ढिठाई की इंतहा है। महात्मा गांधी जब बिड़ला जी के यहां रुकते थे तब हुकूमत अंग्रेजों की थी और गांधी जी अंग्रेजों से लड़ रहे थे। जाहिर है कि इन स्थितियों में बिड़ला जी को गांधी जी को रुकवाकर कोई फायदा नही हो सकता था। उल्टे हुकूमत के कुपित हो जाने से उन्हें व्यापार में नुकसान का जोखिम था। लेकिन अगर कोई हुकूमत किसी उद्योगपति पर अतिरिक्त अनुग्रह प्रदर्शित करें तो उसका सतर्क विवेचन इसलिए लाजिमी है कि इसमें स्थिति उल्टी हो सकती है। तथाकथित उद्योगपति को प्रधानमंत्री का कृपापात्र होने से व्यापार में अनुचित लाभ मिल सकता है।

यह भी मोदी की जबर्दस्ती है कि लोग उद्योगपतियों को गाली देते हैं मैं तो नही दूंगा। कौन सी सरकार है जो उद्योगपतियों को गाली देती है। सही बात तो यह है कि हर सरकार उद्योगपति को मान-सम्मान देती है तांकि वह रोजगार बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा पूंजी निवेश करें। फिर यह देश तो उस अध्यात्म परंपरा का देश है जिसमें धर्म और मोक्ष के साथ-साथ काम और अर्थ को भी बतौर पुरुषार्थ नवाजा गया है। मोदी देश के इस मर्म को समझते हो या न समझते हों लेकिन अन्य नेता इसको जानते रहे हैं। गाली दी जाती है उद्योगपति का नकाब ओढ़े टैक्स चोरों को। जैसे अंबानी का रिकार्ड है कि शुल्क चोरी की वजह से ही उन पर ट्राई ने जुर्माना लगाया था। धीरू भाई अंबानी के बड़े सुपुत्र हैं मुकेश अंबानी जो कि नरेंद्र मोदी के चहेते हैं और छोटे पुत्र है अनिल अंबानी जिन्हे मुलायम सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गैस आधारित विद्युत परियोजना स्थापित करने के लिए कौड़ियों के मोल जमीन दिलाई थी और आज तक वह परियोजना शुरू नही हो सकी है। वीपी सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वित्तीय मामलों की एक खुफिया एजेंसी से जब जांच कराई तो पाया गया कि हेराफेरी करके सबसे ज्यादा काला धन अंबानी ने इकटठा किया है। रेयान के जिस केमिकल को लेकर उनके और नुस्ली वाडिया के बीच में विवाद हुआ था उसमें उन्हें राजीव गांधी की कृपा से कोटा मिल गया था और बाद में उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने उस केमिकल को ब्लैक कर लिया। अकेले मोदी की आलोचना अंबानी और अडाणी पर कृपा करने की वजह से नही हो रही। इसके पहले कांग्रेस भी अंबानी की कानून से हटकर मदद करने के कारण आलोचकों के निशाने पर रही थी। यहां तक कि अटल बिहारी बाजपेयी के दत्तक दामाद से धीरू भाई अंबानी की दोस्ती के कारण अंबानी घराने को मिल रहे अनुचित लाभ की भी कम आलोचना नही हुई थी। बिड़ला और टाटा जैसे उद्योगपति हैं वैसे उद्योगपति अंबानी और अडाणी नही हैं। इसलिए उनसे गलबहियां प्रधानमंत्री करेगें तो उन पर उंगलियां उठेगीं हीं।

बहरहाल अखिलेश के एक बंगला हो जगत से न्यारा के रवैये पर प्रधानमंत्री द्वारा उंगली उठाना सार्थक होता अगर वे इस कुरीति पर ब्रेक लगाने के लिए ठोस इरादा बनाकर यह कहते। स्थिति यह है कि जनता की सहनशीलता से ज्यादा कर उस पर लग रहे हैं जो कि नेताओं और अधिकारियों के ठाट-बाट में खपे जा रहे हैं। इसलिए मजबूरी है कि सरकार और टैक्स बढ़ायेगी लेकिन अंदेशा यह है कि इसकी वजह से कहीं जनता में बगावत का बबंडर न मचल पड़े। इसलिए विरोधियों पर कटाक्ष करके अपने कर्तव्य की इतिश्री करने की बजाय प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वे भाजपा नेताओं को निजी शान-शौकत पर कम से कम सरकारी खर्च करने की न केवल नसीहत दे बल्कि इसके लिए बाध्य करें। साथ ही आडिट सिस्टम को पैना किया जाये तांकि अनुमन्य खर्च की लक्ष्मण रेखा की अवहेलना की गुंजाइश पूरी तरह रोकी जा सके।


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