कश्मीर से उत्तर प्रदेश की जुगत: बुरहान मसाला, भाजपा ने राष्ट्रवाद में बदल डाला

By: jhansitimes.com
Jul 23 2016 03:28 pm
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(अरुण सिंह चंदेल की कलम से  )मोस्ट वांटेड हिजबुल मुजाहिदीन कमाण्डर, 22 वर्षीय, बुरहान मुजफ्फरवानी 8 जुलाई 2017 को अपने दो साथियों के साथ भारतीय सुरक्षाबलों के हाथों एनकाउण्टर में मौत के घाट उतार दिया गया। सूत्रों के अनुसार यह एनकाउण्टर बुरहानी के वीडियो आने के बाद हुआ जिसमें उसने सुरक्षाबलों, सैन्य कालोनियों व कश्मीरी पण्डितों पर हमला करने की बात कही थी। 10 लाख के इनामी आतंकवादी के पिता मुजफ्फर वानी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य हैं, उसकी बहन 12वीं कक्षा में शीर्ष नामों में आती है। हिजबुल के पोस्टर-ब्वाय नाम से जाना जाने वाला यह आतंकवादी 15 अपराधों में वांछित था और 2010 में इस गुट में शामिल होने के बाद 120 लोगों को इसने अपने साथ आतंकवादी बनाया। यह इतना बेखौफ था कि मास्क पहनना भी यह जरूरी नहीं समझता था। वैसे कश्मीर में समय समय पर बड़े आतंकवादियों को मार गिराया गया और अनेक संगठन भी सक्रिय हैं जैसे लश्कर-ए-तेयबा, तहरीके तालिबान, जैश ए मोहम्मद, हरकत उल जिहाद ए इस्लामी आदि। लेकिन हिजबुल मुजाहिदीन (हम) के इस एक आतंकवादी को लेकर जो चर्चा चारों तरफ चली उसका बहुत बड़ा राजनीतिक कारण भी है। आने वाले समय में उ0प्र0 2017 में विधानसभा का चुनाव है। अगर इस घटना को वायरल कर राष्ट्रवाद फैलाया जाये तो इसका चुनावी समीकरण में भरपूर फायदा मिलेगा। ऐसा लगता है कि भाजपा की ऐसी सोच है क्योंकि जो वीडियो वायरल हुआ, जैसे सोशल मीडिया में इसकी चर्चा चली। इलेक्ट्रानिक चैनल ने जैसे रिपोर्टिंग दिखाई वह एक आतंकवादी को मारकर युद्ध जैसी स्थिति दर्शाती है और लगता है कि मौजूदा सरकार सबसे ज्यादा देशभक्त है। यह बात ठीक है कि मौजूदा सरकार किसी भी बड़ी घटना पर विजय पाने के बाद श्रेय लेती है पर उसको राष्ट्रवाद का चोंगा पहनाकर प्रचारित करवाना चुनावी काकटेल जैसे दिखता है। 

भाजपा को फायदा व कानूनी बदलाव

वैसे दूध का जला छाछ फूंक-2 कर पीता है। बिहार चुनाव हारने के बाद भाजपा भी हर चुनावी छाछ को फूंक कर पियेगी चाहे वह उ0प्र0 क्यों न हो। उ0प्र0 में चुनावों में साम्प्रदायिक धुवीकरण होता है तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। अगर नौजवानों के अन्दर किसी घटना से राष्ट्रवाद हिलोरें लेता है तो भी भाजपा को ही फायदा होगा क्योंकि कांग्रेस, बसपा, सपा व अन्य पार्टियां अभी राष्ट्रवाद फैलाने में अभी बौने हैं। भाजपा चुनावी नाव में बैठकर जीत की नदी पार करने के लिए कोई भी पैंतरा लगा सकती है। कई पैंतरे देशहित में होते हैं तो कई पैंतरे उल्टे पड़ जाते है। भाजपा द्वारा एकसमान कानून की वकालत भी देशहित के रूप में देख सकते हैं। इस देश का दुर्भाग्य है कि संविधान एकसमान नहीं है, हर धर्म के लिए अलग अलग व्यवस्था बनी हुई है, हिन्दुओं के लिए कुछ, मुसलमानों के लिए कुछ। इस व्यवस्था के कारण हिन्दू-मुस्लिम अलग-अलग नजर आते हैं। ऐसे ही देश में कश्मीर व अन्य प्रदेशों के लिए अलग अलग नियम हैं। यह देश समानता का अधिकार कैसे और समस्त विकास कैसे कर पायेगा, इस पर विचार करना चाहिये नहीं तो कश्मीर में उठी राजनीति उ0प्र0 ही नहीं अन्य प्रदेशों को भी झुलसा देगी। 

आओ जाने कश्मीर को 

 

भारत का स्विटजरलैण्ड कश्मीर का नाम कश्यप मुनि के नाम पर पड़ा, यह बात एक पौराणिक आख्यान के अनुसार प्रचलित है। वैसे केसर की भूमि होने के नाते यह क्षेत्र कश्मीर नाम से जाना जाने लगा। सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व 30वीं शताब्दी में कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रचार किया था। यहॉं हिन्दू राजाओं में ललितदित्य (697 से 738 ई0 तक) सबसे बलशाली और नाम वाले राजा हुए। बौद्धों से पहले हिन्दूओं का बोलबाला समस्त क्षेत्र में था। 13वीं व 14वीं शताब्दी में इस्लाम का आगमन हुआ। कश्मीर के मुस्लिम शासकों में जैन-उल-आब्दीन (1420 से 1470 ई0 तक) सबसे नामचीन शासक हुए जिन्हें कश्मीर का अकबर भी कहा जाता है। 1586 में मुगल सम्राट अकबर ने कश्मीर जीत लिया। 1975 में अहमद शाह अब्दाली के पास रहा, फिर पठानों ने 67 वर्षों तक शासन किया। महाराजा रणजीत सिंह ने जीत का अपने राज्य पंजाब में मिला लिया। बाद में डोगरा परिवार के राजा गुलाब सिंह को जम्मू सौंपा गया। वर्ष 1947 तक जम्मू में डोगरा शासकों का शासन रहा। 

-ः कश्मीर का विलय:-

यह बात सबको याद है कि वर्ष 1947 में धर्म के आधार पर विभाजन हुआ था। हिन्दू बहुल क्षेत्रों को भारत में रहना था और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को मिलाकर बना देश पाकिस्तान में रहना था। महाराजा और नवाबों को छूट दी गई थी कि वे भारत या पाकिस्तान में किसी एक को चुनें। जम्मू कश्मीर राज्य में कुल मिलाकर मुस्लिम आबादी के साथ साथ हिन्दू (कश्मीरी पण्डित एवं डोगरा आदि) भी थी। जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरीसिंह हिन्दू थे। महाराजा हरीसिंह ने जम्मू कश्मीर में भारत के विलय का विकल्प तत्काल नहीं चुना। वह लगातार पाकिस्तान से बात करते रहे। इस बात की उधेड़बुन में लगे रहे कि अपनी सत्ता कैसे बचायें। लेकिन शेख अब्दुल्ला कश्मीरी जनता के लोकप्रिय नेता थे। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय चाहते थे। क्योंकि भारत ने हिन्दू राष्ट्र बनने की बजाय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना बेहतर समझा था। महाराजा हरीसिंह ढुलमुल रवैया अपनाते रहे और 24 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों से 5000 छापामार कश्मीर में घुस आये। भारत ने आरोप लगाया कि यह योजना पाकिस्तान की थी, जोकि बाद में चौधरी मुहम्मद अली ने अपनी किताब में मानी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खां ने उन्हें 21 अक्टूबर 1947 को हो रहे इस हमले के बारे में बता दिया था। 26 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर कब्जे से निकलता दिखाई दिया तो महाराजा हरीसिंह जम्मू भागे और भारत विलय के राजी हुए। लेकिन महाराजा हरीसिंह के देर से निर्णय और तत्कालीन भारत सरकार के गलत फैसले से आज भी समस्या जस की तस बनी हुई है। 

गले की फॉंस, समस्या का समाधान

कश्मीर समस्या का समाधान के दावे सभी पार्टियां करती दिखती हैं। यहॉं तक कि पाकिस्तान दो मुहां बात कर समस्या का समाधान एक तो कश्मीर की आजादी, दूसरी तरफ अपना अभिन्न अंग बताकर करना चाहता है जबकि उसे यहां का इतिहास पता है। जब यह समस्या यहां से निकलकर बाहर पहुॅंची तब इस मामले में सुरक्षा परिषद में प्रस्तावों में स्पष्ट रूप से शर्त रखी गई थी कि पाकिस्तान वहां से जो कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में है, अपनी सेना हटाये, उसके बाद जनमत संग्रह कराया जा सकता है। कश्मीर में हो रही घटनाएं आज की नहीं है। यह आजादी के समय से हैं क्योंकि पाकिस्तान को बदला लेना है इसलिए आई.एस.आई. समस्त आतंकवादी गुटों को पनाह देती रहती है व फण्डिंग करती रहती है। आज भी पिछली सरकारों की तरह इस सरकार के पास स्पष्ट नीति नहीं है। अगर मौजूदा भारत सरकार चाहे तो इस समस्या का हल राजनीतिक तौर पर कर सकती है। हॉं यह बात सच है कि भाजपा कश्मीर में हो रही एक-एक घटना का राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। लेकिन इस बात से भी परहेज नहीं किया जा सकता कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ही कश्मीर समस्या को सुलझा सकती है। 

धारा-370 व भाजपा

भाजपा द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति की बात तो कई बार उठाई गई लेकिन जब पी.डी.पी. से गठबंधन हुआ तो इसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया। यह बात देश के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी। भारत से जो चूक हुई थी वह थी संविधान की धारा-370, जो शायद उस समय की मांग रही होगी। इसके अनुसार कश्मीर का अपना पृथक संविधान है। 1969 में इस कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा भी दिया गया। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी थी जो चुनावी फायदे के लिए लगातार इस धारा को खत्म कर कश्मीर को पूर्ण विलय की बात करती रही। लेकिन कश्मीर में पूर्णरूप से बहुमत में न आने के कारण वह शान्त हो गई, बाकी पार्टियां वोट की राजनीति के कारण मुॅंह बन्द किये रहती हैं। 

राजनीतिक कार्ड व कश्मीर

कश्मीर पर भारत ने सख्त रूख अपनाया और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दो टूक जवाब देते हुए गुलाम कश्मीर खाली करने की बात लोकसभा में कही। उधर पाकिस्तान ने कश्मीर कार्ड खेलते हुए 19 जुलाईं 2016 को काला दिवस घोषित कर  मनाया था। इधर भाजपा ने भी इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए मौके पर पाक को कड़ी चेतावनी दे डाली। अधर में फंसी महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री जम्मू-कश्मीर ने अमल की बहाली के लिए सभी दलों से सहयोग की मांग की। गृहमंत्री ने यह भी बताया था कि हिजबुल का हेडक्वार्टर मुजफ्फर, पाक अधिकृत कश्मीर में है। सूत्रों के अनुसार इसके 1500 सदस्य हैं, आजकल हेड सय्यद सलाउद्दीन हैं। यह गुट 1989 से सक्रिय हैं। भारत सरकार को आंख कान खोलकर यह जानकारी रखनी पड़ेगी कि पढ़े लिखे नौजवान इस आतंकवाद से क्यों जुड़ रहे है। जैसे बुरहान कक्षा-8 में 90 प्रतिशत अंकों से पास हुआ था और दसवीं कक्षा में पहुॅंच कर गन पकड़ ली थी। वह डाक्टर बनना चाहता था। वह मारे जाने के पहले वह सुरक्षाबलों के सामने रोया था। यह बात समझने की है। एक बदलाव के रूप में यह बात देखी जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रावधान लागू किया कि जम्मू कश्मीर के केस की सुनवाई बाहर अन्य प्रदेशों में भी हो सकती है। इसी तरह धारा-370 खत्म कर लोगों को रहने व जमीन खरीदने, इस क्षेत्र में व्यापार करने की छूट दिलाने की भारत सरकार को कोशिश करनी पड़ेगी। 

‘‘वतन कश्मीर को लुटेरों ने लूटा

इसके दामन को राजनीति ने लूटा,

भाई ने भाई को कश्मीर में लूटा

कल हिन्दु लुटा, आज मुसलमान लुटा,

बार बार पाकिस्तान ने इस जन्नत को लूटा,

धर्म मजहब ने इन्सानियत को लूटा,

केसर भूमि से अवध भूमि तक राष्ट्रवाद लूटा,

इस लूट में कांग्रेस से जो छूटा,

वो अब भाजपा ने लूटा,

देखते रहिये कि अब क्या बचा क्या लुटा’’

 


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