वीपी के नाम पर ताल ठोक कल्याण सिंह ने चौंकाया

By: jhansitimes.com
Jun 27 2018 07:16 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) उम्र दराज होने के बावजूद कल्याण सिंह को चुका करार दिया जाना जायज नही हो सकता। इस दौर में जब शीर्षतम पदों पर बैठे बुजुर्ग नेता फिटनेस मेें युवाओं को चुनौती देने का दमखम दिखा रहे हैं। उसी अंतराल में उम्र के बहाने उन लोगों को राजनैतिक निर्वासन में धकेला जाना अजब विरोधाभास है जो ऊर्जा से लबरेज हैं। कल्याण सिंह इसलिए राज्यपाल बनकर भी अपने अंदर की राजनैतिक कुलबुलाहट को विराम नही दे पा रहे हैं। अपने गृह प्रदेश में गाहे-बगाहे वे सांकेतिक तरीकों से राजनैतिक मुददे छेड़ने को सामने आ जाते हैं जिसके चलते उनकी पार्टी एक बार फिर उनसे परेशान है।

राजनीति में रिटायरमेंट की कोई उम्र तय नही है। मलेशिया में लोगों ने 92 वर्ष की उम्र में भी महातिर मोहम्मद पर प्रधानमंत्री के चुनाव में भरोसा बरकरार रखा क्योंकि उनकी क्षमता सक्रियता और स्वीकार्यता उम्र के इस पड़ाव पर भी बरकार है। कल्याण सिंह भी अभी अपनी राजनैतिक जिदंगी पूरी नही जी पाये थे। उनकी महत्वाकांक्षाएं अतृप्त छोड़ते हुए उन्हें भाजपा के नये नेतृत्व ने अपने असुरक्षाबोध की वजह से पार्टी में कामराज सा प्लान लागू करके पवेलियन में भेजने का इंतजाम कर दिया। जाहिर है कि वे इस फैसले को पचा नही पा रहे हैं। धधकती ऊर्जा पर ढक्कन लगाकर विस्फोट को निमंत्रण देने जैसा प्रयोग किया गया है। जिसकी परेशानी पार्टी को झेलनी ही पड़ेगी।

सोमवार को लोकबंधु वंचित वर्ग महासंघ ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चारबाग स्थित रविंद्रालय में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की जयंती पर पिछड़ा वर्ग महासम्मेलन का आयोजन किया। जिन्हें सामाजिक बराबरी रास नही है वे चाहे जितना कोसें कि वीपी सिंह को उनके कदम की वजह से दूसरे तो क्या ओबीसी के लोग भी याद नही करना चाहेगें लेकिन हकीकत यह है कि नेताओं की बात छोड़ दें पर आम पिछड़ों में अनुराग और कृतज्ञता में कोई कमी नही है। बहरहाल मंडल पर कमंडल की निर्णायक जीत फिलहाल हो चुकी है। ऐसे में प्रमुख लोग वीपी सिंह के नाम पर किसी आयोजन में जुटें इसकी कल्पना नही की जा सकती। दूसरी ओर डा. लोहिया का यह कथन ऐसी बिडंबनाओं के बीच हमेशा मौजूं रहेगा कि लोग उन्हें सुनेगे लेकिन उनके मरने के बाद। इस मामले में बाबा साहब अंबेडकर का भी उदाहरण सामने है। उन्हें 6 दिसम्बर 1956 को परिनिर्वाण प्राप्त हो गया था। उस समय न उनकी राजनैतिक पार्टी कोई बड़ी हैसियत मेें थी और न परिवार का कोई सदस्य। इसके अलावा भारतीय समाज के अपने उसूलों की वजह से अन्याय के खिलाफ मुहिम चलाने वाले को खलनायक का दर्जा प्राप्त हो जाता है। सो बाबा साहब भी इस नियति से परे नही थे। दशकों तक देश की मुख्य धारा की राजनीति में इसी हिकारत के चलते कोई उनका नामलेवा नही रहा। लेकिन जो लोग वास्तव में अपने विचारों और करनी के कारण युगपुरुष का रोल अदा कर जाते हैं उन्हें तत्कालीन सत्ता समाज कितना भी हाशिए पर धकेले लेकिन एक दिन वे ही उस समाज और देश के केंद्र बिंदु बनते हैं। इसी कुदरती कायदे कानून के तहत निर्वाण के 34 वर्ष बाद 1990 में वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री की हैसियत से उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न घोषित करने की जरूरत महसूस की जबकि वीपी सिंह की राजनीति का उनसे कोई सीधा सरोकार नही था। तत्कालीन भारत सरकार के इस फैसले के बाद बाबा साहब का नाम राष्ट्रीय महापुरुषों में सबसे ऊपर पहुंच गया। क्या वक्त वीपी सिंह के साथ भी अपने को इसी तरह दोहरायेगा।

उनकी जयंती के मौके पर आयोजित उक्त कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे कल्याण सिंह ने बाबा साहब अंबेडकर की तरह वीपी सिंह को भी वंचितों का मसीहा करार दिया। भाजपा में रहते हुए वीपी सिंह का ऐसा महिमा मंडन बहुत साहसिक है जो कल्याण सिंह की पार्टी को शायद ही रास आये।

वैसे बात अकेले कल्याण सिंह की नही हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पृष्ठभूमि के हवाले से जब यह कहा कि उनके जैसे का इस पद तक पहुंचना बाबा साहब के प्रयासों का परिणाम है तब कई अवसरों पर यह भी झलका कि वे इसमें वीपी सिंह का नाम भी लेने को उत्सुक रहते है लेकिन उन्हें पता है कि इससे पार्टी में उनके खिलाफ बड़ी बगावत हो सकती है। इसलिए उन्होंने अपने श्रद्धा सुमन बाबा साहब तक ही सीमित रखे।

भाजपा में कमंडल की जीत के बावजूद मंडल भी अपना असर गुप्त धारा की तरह दिखा रहा है। जिससे नई मोर्चाबंदियों के गुल खिलने की आशंकाएं पार्टी के अंदर बढ़ती ही जानी है। जहां तक कल्याण सिंह का प्रश्न है आज पूरे उत्तर प्रदेश में चर्चा हो रही है कि योगी ने प्रदेश में शासन व्यवस्था का बेड़ा गर्क कर दिया है। अगर कल्याण सिंह को आज की स्थितियों में जबकि केंद्र में भी भाजपा की सरकार है और सारे प्रमुख संवैधानिक पदों पर भाजपा के ही लोग बैठे हुए हैं। उत्तर प्रदेश को चलाने का मौका दिया गया होता तो शासन का स्वरूप कुछ और ही होता। उनकी सरकार विकास में अखिलेश और कानून व्यवस्था में मायावती को पीछे छोड़ देती। दूसरी ओर योगी का शासन बहुत ही निराश करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास के नारों की आंधी चलाकर विवादित मुददो के जिन्न को बोतल में बंद करने की रणनीति अपनाई थी। जब तक लोगों को उनकी नई-नई बातों के खोखलेपन का पता नही चला। तब तक वे अपने उददेश्य में कामयाब भी रहे। लेकिन बातों के साथ वे काम न कर सके इसलिए उनका जादू भी उतार पर आ गया है और जिसका नतीजा है कि अनुदारवादी हावी होने लगे हैं और विवादित मुददे फन काटकर खड़े हो रहे हैं जिससे उनके लिए मुश्किलें पैदा होती जा रही हैं।

जिस तरह से कल्याण सिंह जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे उस समय उनके साथ भी राजनीति हुई थी। वही स्थितियां अब मोदी के लिए दरपेश हैं। शूद्रों को सिफ्र ताड़ना का अधिकारी समझने वाले वर्ग को ओबीसी नेताओं को स्थाई तौर पर अपने सिर पर बैठाना कैसे गंवारा हो सकता है। इसीलिए कल्याण सिंह के जमाने में 18 महीने के भीतर ही राम मंदिर के मुददे पर हठयोग साधकर कटटरवादियों ने उनकी सरकार की बर्खास्तगी की इबारत लिख दी थी। इतना ही नही सरकार कुर्बान करने के साथ-साथ राम मंदिर मामले में कल्याण सिंह ने व्यक्तिगत तौर पर भी अदालत का कोप झेला। लेकिन उन्हें इस शहादत का क्या सिला मिला। पार्टी से बाहर हो जाना पड़ा। उन्होंने नई पार्टी बनायी तो हिंदू संगठन उनके साथ नही आये। मजबूरन उन्हें मुलायम सिंह से हाथ मिलाना पड़ा। इस कटु अनुभव के बाद कल्याण सिंह को समझ में आ गया कि धर्म के नाम पर जिन मान्यताओं को वे पोषित कर रहे हैं वे उदात्त नैतिकता और मानवीयता से ओत-प्रोत भाईचारे की बजाय सामाजिक भेदभाव और दमन का स्रोत हैं। सुनियोजित ढंग से वंचित बनाये गये वर्गों के लिए इस व्यवस्था में दोयम दर्जे की स्थिति को स्वीकार करना उनकी नियति है। जो कल्याण सिंह के साथ हुआ वही इतिहास क्या मोदी के साथ भी दोहराने की योजना बनाई जा रही है।

यह संयोग नही है कि मोदी सरकार के चार वर्ष पूर्ण होने के बाद नये चुनाव की आहट मिलते ही उनकी पार्टी के एक बड़े वर्ग के तेवर बदलने लगे हैं। राम मंदिर का मुददा हाल में जिस ढंग से गर्माने की कोशिशें शुरू हुई हैं उसके निहितार्थ समझे जाने चाहिए। भाजपा का मंतव्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव में भी स्पष्ट हुआ था। जिसमें पिछड़े मुख्यमंत्री का झांसा देकर भाजपा ने बहुजन समाज का वोट बटोर लिया। लेकिन जब फैसला करने का मौका आया तो अपनी वर्ण व्यवस्था वादी जहनियत की वजह से सारे पिछड़े नेताओं को अगूंठा दिखाकर योगी की ताजपोशी करा दी गई। मोदी का भी जितना इस्तेमाल होना था वह किया जा चुका है। धार्मिक दिग्विजय के बाद अब बारी सामाजिक दिग्विजय की है। जिसमें मंदिर मुददे पर उन्हें बलि चढ़ाकर योगी को राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए सामने लाने का खेल खेला जा सकता है।

सामाजिक दिग्विजय के लिए जरूरत उस आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने की है जिसने दलितों और पिछड़ों के लिए व्यवस्था के तिलिस्म के दरवाजे खोल रखे हैं। भाजपा में वंचित वर्ग के दूरंदेशी नेताओं को कहीं न कहीं इसका एहसास है। जिसकी अभिव्यक्ति कल्याण सिंह के भाषण में हुई। लखनऊ में अपनी हुंकार में उन्होंने साफ कर दिया कि वंचित एकजुट होकर राजनीति और प्रशासन में दावेदारी करें। ऊंचे पदों पर तो आज भी उनका प्रतिनिधित्व नही है। लेकिन डीएम, एसपी से लेकर थानेदार के पदों पर भी अपनों के प्रतिनिधित्व के बारे में उन्हें देखना होगा। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में इन पदों पर गैर सवर्णों की भागीदारी नाम के लिए रह गई है। इसे लेकर असंतोष भी सुलग रहा है। कल्याण सिंह के भाषण से इसको हवा मिलेगी। कल्याण सिंह ने साफ कहा कि आप लोग एक होकर जो हमें खुश कर सके उसे सब कुछ लुटा दो लेकिन जिसे हमारी परवाह नही है उसका बंटाधार करने से भी न चूको। कमंडल की राजनीति के उत्कर्ष के इस मोड़ पर वीपी सिंह का प्रासंगिक होना स्वाभाविक है। यह केवल एक आयोजन की बात नही है, लगातार पिछड़ों की छुटपुट लामबंदी में उनका स्मरण हो रहा है जो उनके नाम के अंडर करंट का परिचायक है।


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