मान्यवर के मिशन की ताकत की बदौलत ही मायावती राजनैतिक रूप से जिंदा है

By: jhansitimes.com
Jun 26 2019 09:50 am
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 लोकसभा चुनाव के पहले समाजवादी पार्टी से गठबंधन, अखिलेश को बबुआ बनाकर लोकसभा चुनाव में मंच साझा करने, गठबंधन प्रत्याशियों के पक्ष में वोट मांगने और चुनाव में डबल जीरों से दस लोकसभा सीटों पर सफलता के बाद अखिलेश एवं डिम्पल से मिले सम्मान का हमेशा आभारी रहने की जुगाली करने के बाद लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा के प्रत्याशियों का तन, मन, धन से सहयोग करने वाले सपाइयों का वोट न मिलने की तोहमत मढ़ना और अब अखिलेश यादव को धोखेबाज बताकर बहुजन समाजपार्टी को अपने परिवार की जागीर बनाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती के पल-पल बदलते गिरगिटी रंगों से समाजवादी पार्टी ही नही बहुजन समाज पार्टी का आम मिशनरी कार्यकर्ता भी हैरान है कि आखिर मायावती अपने स्वार्थ के लिए मिशन को किस हद तक चोट पहुंचा सकती है। पार्टी का मिशनरी कार्यकर्ता यह सोचने को मजबूर है कि मान्यवर कांशीराम के मिशन को बर्बाद करने में बहिनजी क्यों कोई कसर नही छोड़ रही है। 
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती का वैसे तो यह राजनैतिक इतिहास है कि वह अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकती है फिर भले ही उन्हें मान्यवर कांशीराम के बनाये गये मिशन उसूलों को क्यों न कुचलना पड़े। मान्यवर कांशीराम ने पंद्रह पचासी का नारा देकर जिस तरह से दलित, पिछड़े एवं मुस्लिम समाज को राजनैतिक प्लेटफार्म देने का काम किया था उस मिशन में वह काफी हद तक सफल रहे थे। क्योंकि बामसेफ के सहयोग से डीएसफोर आंदोलन ने दलित पिछड़ों एवं मुस्लिम समाज को अपने हक एवं अधिकार दिलाने की जो अलख जगायी थी उससे दलित पिछड़े समाज की एकजुटता को काफी हद तक मजबूती मिली थी। चूंकि जनपद जालौन ने बसपा को पहला विधायक देने का काम किया था। इसलिए बुंदेलखंड क्षेत्र को बसपा का गढ़ भी माना जाता है। जहां सबसे अधिक मान्यवर ने समय दिया था और दलित, पिछड़े एवं मुस्लिम समाज के ऐसे मिशनरी कार्यकर्ताओं की फौज तैयार की जो आज भी बसपा को जिंदा किए है। हालांकि इसमें बसपा सुप्रीमो का कोई योगदान रहा होगा ऐसा मिशनरी कार्यकर्ता कम ही मानते है। वह मानते है कि मान्यवर के मिशन की ताकत की बदौलत ही मायावती राजनैतिक रूप से जिंदा है। जिस दिन मिशनरी वर्कर मिशन से मंुह फेर लेगा उस दिन मायावती ग्राम प्रधानी का चुनाव भी नही जीत पायेगी और न ही किसी को जिता पायेगी। 
केन्द्र एवं प्रदेश की सत्ता से भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए जिस समय बुआ बबुआ ने लोकसभा चुनाव में गठबंधन का ऐलान किया उससे दलित पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों के साथ सेकुलर ताकतों के बीच देश भर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। जिसमें बुआ ने इस गठबंधन को लोकसभा चुनाव के बाद होने वाले चुनाव तक अटूट बताया था। यह ऐसा मौका था कि दलित पिछड़ों के बीच 24 साल से जमी नफरत की बर्फ पिघल गई थी और फिर लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से समाजवादी पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने तन, मन, धन, से सहयोग किया उससे दलित, पिछड़ों की एकजुटता का नया अध्याय लिखा गया था। बसपा के आम मिशनरी कार्यकर्ता सुप्रीमो के रवैये को लेकर जिस से नाखुश है उससे भविष्य में बसपा को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। क्योंकि मिशनरी कार्यकर्ता यह अच्छी तरह से जानता है कि मायावती को कभी भी पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के सुख-दुख से कभी कोई लेनादेना नही रहा है। पार्टी में अगर किसी नेता ने कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ भी बनाली तो उस नेता को पार्टी से बाहर करने में देर नही लगती है। यही बजह है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब राज्यों में जहां विधानसभा चुनावों में कुछ खास हासिल नही हुआ। वहीं यूपी छोड़कर पूरे देश में बसपा लोकसभा चुनाव में अपना खाता खोलने को तरस गई। उत्तर प्रदेश के साथ पूरे देश में मान्यवर के मिशन से जुड़े लोगों की बसपा से बेदखली और ऐसे लोगों की पार्टी में आमद जो सुप्रीमो एवं उनके पारिवारिक सदस्यों को इतना अधिक दौलतमंद बना सके कि फिर कानूनी शिकंजे से उन्हें बचाने के लिए गिरगिट जैसा रंग बदलने पड़े। 
बसपा का मिशनरी कार्यकर्ता पहले तो समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ने के पक्ष में नही था क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से सपा-बसपा के आम कार्यकर्ताओं के बीच दिली नजदीकिया बढ़ी थी उससे यह माना जाता था कि भले ही लोकसभा चुनाव में गठबंधन को घाटा उठाना पड़ा हो लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में सूबे की सत्ता से भाजपा को बाहर करने में गठबंधन जरूर सफल होगा। लेकिन गठबंधन तोड़ने के साथ ही समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव को धोखेबाज बताने तथा तमाम तरह के आरोपों को बसपा का मिशनरी कार्यकर्ता छिछली मानसिकता का परिचायक मानता है। सपा नेताओं पर इस तरह के हमलों की आड़ में बहुजन समाज पार्टी को परिवार की जागीर बनाने की मायावती की सफल चाल भी मानी जा रही है। 

भाई भतीजावाद ले डूबेगा बसपा को
जिस मिशन को लेकर मान्यवर कांशीराम ने जीतेजी घरवार सब त्याग दिया भाई भतीजों नाते रिश्तेदारों से सारे रिश्ते खत्म कर लिए थे। कोमा में जाने के बाद जिन मायावती ने अपने को स्वयंभू सुप्रीमो घोषित कर मान्यवर से उनकी मां, भाई भतीजों को नही मिलने दिया था। यहां तक अपने बेटे से मिलने के लिए मां को कोर्ट का दरबाजा खटखटाना पड़ा था। बसपा की वहीं सुप्रीमो पार्टी में खुलकर भाई भतीजावाद खेलने में जुट गई है। मिशनरी कार्यकर्ताओं की माने तो नगर निकाय चुनाव में वार्ड सदस्य के टिकट से लेकर लोकसभा चुनाव तक टिकटों की बिक्री ने वैसे ही पार्टी के आम मिशनरी कार्यकर्ताओं को हासिये पर ला दिया है। पार्टी का आम कार्यकर्ता अब बसपा के बार्ड सदस्य का चुनाव भी नही लड़ सकता है। जब तक वह निर्धारित फंड और कोआर्डीनेटरों की जेब गरम नही कर देता है। ऐसे में बसपा को अपने भाई भतीजे की जागीर बनाने का मायावती का फैसला निश्चित ही मिशन को नेस्तनाबूद करने में शायद ही कोई कसर छोड़े। 

गठबंधन न होता तो फिर जीरो लाती बसपा
 बहुजन समाज पार्टी का मिशनरी कार्यकर्ता पार्टी सुप्रीमो मायावती के इस बयान से कतई इत्तेफाक नही रखता कि सपा का वोट बसपा के प्रत्याशियों के पक्ष में ट्रांसफर नही हुआ। अगर चुनाव में सपा कार्यकर्ताओं ने तन, मन, धन, से सहयोग नही किया होता तो लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से बसपा को जीरो मिला होता। सपा की वजह से ही मुस्लिम वोट बसपा के पक्ष में एकजुट हुआ। गठबंधन की कीमत समाजवादी पार्टी को जरूर चुकानी पड़ी है। मायावती को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश करने से समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा गैर चमार दलित वोट के साथ ही पिछड़ा वोट भी भाजपा के पक्ष में चला गया। उसे सवर्ण वोटों से भी हाथ धोना पड़ा। लेकिन अब मायावती की बयानबाजी सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की निश्च्छलता एवं राजनैतिक ईमानदारी पर ऐसा प्रहार है जिसे अखिलेश के साथ एक बड़ी राजनैतिक धोखाधड़ी माना जा रहा है। जो बहुजन समाज पार्टी के मिशनरी गले नही उतरता। मिशनरी कार्यकर्ता मानता है कि ऐसा चरित्र कम से कम मान्यवर कांशीराम के मिशन के लोगों का तो नही हो सकता है।


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