शिवपाल के महिमामंडन में पूरी ताकत लगा रहे अब नेता जी, जानिए क्या है इसका बड़ा राज

By: jhansitimes.com
Jan 12 2017 10:22 am
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(प्रधान संपादक, के.पी सिंह की कलम से ) एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे जो त्रिपुरा अधिवेशन में गांधीजी के उम्मीदवार वी. पट्टाभिसीतारमैया को हराकर कांग्रेस अध्यक्ष बन गये तो गांधीजी ने उनका जीना हराम कर दिया। जब वे बुरी तरह बीमार पड़ गये थे तब गांधी जी ने उनके विरोध में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के इस्तीफे करा दिये। आखिर में सुभाष चंद्र बोस इतने मजबूर हो गए कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। यही नहीं उन्होंने अंग्रेजों को देश से खदेड़ने के लिए गांधी जी के अहिंसक आंदोलन तक सीमित न रहते हुए ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ने के लिए आजाद हिंद फौज बनाई जो काफी हद तक कामयाब रही। विचारकों और विश्लेषकों का एक वर्ग तो यह मानता है कि अंग्रेजों ने भारत को आजादी देने का फैसला गांधी जी के आंदोलन की वजह से नहीं बल्कि आजाद हिंद फौज से डरकर किया। जब उन्हें मालूम हुआ कि उनकी नौसेना से लेकर सेना की अन्य विंगों तक में नेताजी की इस फौज की घुसपैठ हो गई है और वे ज्यादा दिन तक हिंदुस्तान में हुकूमत कायम रखने के इरादे पर डटे रहे तो 1857 से ज्यादा मुश्किल स्थितियों का सामना उन्हें करना पड़ेगा।

 

इतना ही नहीं उन्हें यह भी अंदेशा सताने लगा था कि इसमें अपने तमाम फौजी अफसरों को गंवाकर उन्हें सीधी लड़ाई में हिंदुस्तानियों से मात खानी पड़ेगी। इस धारणा में कितनी सच्चाई है, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह बताने का मकसद गांधी जी को कमतर साबित करना नहीं है।

गांधी जी और सुभाष चंद्र बोस के सम्बंधों का एक और पहलू है जो इस विमर्श में बेहद प्रासंगिक है। यह पहलू है कि महात्मा गांधी से इतने टकराव के बावजूद सुभाष चंद्र बोस भारत की व्यापक जनता में उनकी स्वीकार्यता के कारणों को लेकर कहीं न कहीं उनके प्रति अपनी आस्था कभी खंडित नहीं कर पाए और इसीलिए उन्होंने ही इन प्रसंगों के बाद महात्मा गांधी को देश के लिए बापू का सम्बोधन दिया। सुभाष चंद्र बोस को भी इसीलिए नेता कहा गया कि उनमें भी क्षुद्रता का संस्पर्श नहीं था। वरना वे गांधी जी को बापू कहना तो दूर उनके प्रति इतनी कटुता और हिंसा से भरे होते कि उनका मूर्तिभंजन करने में सारी पराकाष्ठा पार कर देते।

यह नेताजी की एक परिभाषा है। इस परिभाषा को याद रखते हुए अगर वर्तमान के सर्वमान्य नेताजी मुलायम सिंह यादव को समाज तौलना चाहे तो यह परिभाषा क्या अर्थ ले लेगी, यह लोग ही बताएं तो अच्छा है। हम जैसे निरीह लेखकों के लिए इस पर प्रकाश डालने की बहादुरी न करने में ही गनीमत है। बाकी................।

नेताजी की समाजवादी पार्टी के संघर्ष की परिणति उनके काबू के बाहर हो चुकी है। बुधवार को उनका यह वक्तव्य इसकी मिसाल है। यह ऐसा दौर है कि जिसमें चिंतक भी अपनी साख को बेच दिया करते हैं। इसलिए वे इसकी मीमांसा कर पाने में असमर्थ हो चुके हैं। ज्यादातर चैनल यह मान रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में अब दोफाड़ को कोई नहीं रोक सकता। नेताजी को आखिर में अपने पुत्र से विधानसभा चुनाव के मैदान में दो-दो हाथ करने के लिए उतरना ही पड़ेगा, लेकिन मेरा अभी भी यह मानना है कि नेताजी की यह नौटंकी 17 जनवरी की डेडलाइन के एक दिन पहले तक चलेगी और आखिर में वे अपने पुत्र के आगे सरेंडर कर जाएंगे।

बुधवार को कार्यकर्ताओं के सामने अपने भाषण में उन्होंने इस बात की बहुत दुहाई दी कि कैसे और कितने संघर्ष करके उन्होंने समाजवादी पार्टी खड़ी की है इसलिए उसे बिखरने न देने के लिए वे हर सीमा तक कुर्बानी दे सकते हैं। इसे बिखेर कौन रहा है, उन्होंने बताया कि यह काम रामगोपाल यादव कर रहे हैं जो उनके चचेरे भाई हैं। जनाब रामगोपाल यादव कौन हैं, जब नेताजी जनता दल के एक अंग थे और इटावा में उनके मुख्य फाइनेंसर दर्शन सिंह यादव थे उस समय मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने फैसला किया कि वे तय करेंगे कि जिला पंचायत अध्यक्ष का उम्मीदवार कौन होगा। जो लोग यह कहते हैं कि नेताजी उनके साथ एहसान करने वालों को कभी भूलते नहीं हैं, उन्हें यह बात मालूम होनी चाहिए कि उस समय अगर एहसान की न सोचें तो मददगारों में इटावा में उनके लिए दर्शन सिंह का नाम सबसे ऊपर था और रामगोपाल उनके खानदान के होने के अलावा पार्टी में कोई वजूद नहीं रखते थे। लेकिन उन्होंने रातोंरात दर्शन सिंह का नाम काट दिया। सही बात तो यह है कि उस समय एक पार्टी सिस्टम काम कर रहा था इसलिए तब सचमुच यह बात थी कि किसी भी चुनाव में उम्मीदवार भले ही वह व्यक्ति मुख्यमंत्री क्यों न हो, तय करना एक आदमी का नहीं पार्टी के निर्णायक मंडल का काम होना चाहिए था। इस लिहाज से जिला पंचायत अध्यक्ष का उम्मीदवार जनता दल से दर्शन सिंह यादव को भी नहीं होना चाहिए था क्योंकि वे भी मुलायम सिंह की निजी कोटरी के आदमी तो थे लेकिन इटावा की राजनीति में सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल से लेकर जनता दल तक कई ऐसे कार्यकर्ता थे जिनकी हकदारी उनसे बहुत ज्यादा बैठती थी।

लेकिन मुलायम सिंह ने न पार्टी सिस्टम फ़ॉलो किया और न ही निजी राजनीतिक कॉमरेडशिप को कुछ समझा। इसकी बजाय दर्शन सिंह के विद्रोह की परवाह किए बिना तथाकथित प्रोफेसर रामगोपाल को खानदानवाद के मोह में जिला पंचायत अध्यक्ष का उम्मीदवार घोषित कर दिया। जिस पर उनके और दर्शन सिंह यादव के बीच लम्बी दुश्मनी चली। आज वे किस मुंह से अखिलेश से कह रहे हैं कि आप केवल मुख्यमंत्री रहिये और पार्टी को शिवपाल को चलाने दीजिए। विधानसभा के उम्मीदवार उन्हें तय करने दीजिए और किस मुंह से कह रहे हैं कि रामगोपाल उनकी पार्टी तोड़ रहे हैं।

पार्टी को लेकर उनका जो सांचा है उसमें उनका खानदान ही पार्टी का पर्याय है जिसमें रामगोपाल को उन्होंने शुरू से शामिल कर रखा है। फिर उनके और रामगोपाल के बीच पार्टी को लेकर अपनी और उनकी का मुद्दा कैसे बन सकता है। जहां तक शिवपाल और रामगोपाल के बीच द्वंद्व का मामला है, इसकी शुरुआत तो 2004 में ही हो गई थी, जब शिवपाल से नाराज होने के कारण सैफई महोत्सव में मुलायम सिंह द्वारा मंच से ऐलान करने के बावजूद रामगोपाल कार्यक्रम का संचालन करने के लिए तैयार नहीं हो पाए थे। उस समय मुलायम सिंह के अत्यंत नजदीकी आईपीएस अफसर और कानपुर जोन के तत्कालीन आईजी स्वर्गीय बीएल यादव सैफई में ही मौजूद थे और उन्होंने मुझसे रात में ही फोन पर कहा था कि नेताजी के परिवार में शिवपाल और रामगोपाल के बीच जिस तरह की खाई बढ़ रही है उससे आगे चलकर इस परिवार के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा होने वाली है। लेकिन उस समय तो मुलायम सिंह ने रामगोपाल को नहीं डपटा। शिवपाल तक रामगोपाल के मुकाबिल उनका फेवर न करने को लेकर मुलायम सिंह से खिन्न रहे थे। लेकिन आज वे रामगोपाल पर इतना ज्यादा हमलावर हो रहे हैं तो यह मानना एकदम फर्जी है कि ऐसा उनके द्वारा अनुज शिवपाल के प्रति अत्यधिक लगाव की वजह से किया जा रहा है।

दरअसल रामगोपाल के प्रति अचानक मुलायम सिंह की दग्धता का कारण दूसरा ही है। मुलायम सिंह को सबसे ज्यादा चुनौती इस बात से महसूस हुई है कि उनका अपना बेटा अखिलेश जिसे वे इतना चाहते हैं, उस पर रामगोपाल का इतना वश कैसे हो गया। वे रामगोपाल के खिलाफ पार्टी पर वर्चस्व की नहीं बेटे के लगाव के मामले में बढ़त की लड़ाई लड़ रहे हैं। बेटे के मुकाबिल राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर भी उनके द्वारा प्रतियोगिता करने का कोई सवाल नहीं है। लेकिन उन्हें यह पराजय सहन नहीं हो रही कि उसकी ताजपोशी का श्रेय जाहिरा तौर पर उनके खिलाफ जाकर रामगोपाल हथिया लें। इसलिए वे 17 जनवरी के पहले तक आक्रामक रहकर अखिलेश को बाध्य करना चाहते हैं कि इमोशनल ब्लैकमेलिंग से अखिलेश उनके सामने सरेंडर होकर रामगोपाल को किनारे कर दें। इसके बाद अगर अखिलेश अध्यक्ष भी बने रहना चाहें तो उन्हें कोई उज्र नहीं है।

दूसरी ओर अखिलेश भी उनके पुत्र हैं और उनसे कम शातिर नहीं हैं। उन्हें भी पता है कि जब उनको मुख्यमंत्री बनाया गया था उस समय भी पिताजी के साथ हाथ बंटाने में चाचा शिवपाल का योगदान उनसे बहुत अधिक था। उस समय भी भ्रातृप्रेम का तकाजा था लेकिन तब तो पिताजी ने सारी चीजें किनारे करके बहुत ही सधे ढंग से अचानक मुख्यमंत्री पद उन्हें दिलवा दिया था। फिर आज वे भाई के प्रति अपने को न्योछावर करने का दिखावा क्यों कर रहे हैं। उनकी कमजोरी भाई नहीं कोई और है। जिसकी वजह से वे जाने-अनजाने में उन्हें निपटा देने के लिए अपना इस्तेमाल होने दे रहे थे। उनके सारे खास लोगों को पार्टी से हटाया गया तब उन्होंने शिवपाल को नहीं टोका। आखिर में उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में नये चुनाव में पेश करने से भी उन्होंने मना कर दिया और ऐन मौके पर शिवपाल ने और दृढ़ता से उनकी दावेदारी को नकार डाला। तब भी पिताश्री उन्हें बचाने नहीं आये। ऐसे में उनके राजनैतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए सबसे बड़ा सहारा रामगोपाल ही बने। उन्हीं रामगोपाल को अब वे छोड़ दें तो यह न सिर्फ नैतिकता के तकाजे के हिसाब से गलत है बल्कि उनके खिलाफ जो षड्यंत्र हो रहे हैं, यह उसके मद्देनजर भी बहुत बड़ी चूक मानी जाएगी। क्योंकि नेताजी की विवशता फिर उन पर हावी हो सकती है। जिसके कारण रामगोपाल के साथ न रहने पर वे अकेले रह जाएंगे और उनका राजनैतिक वध हो जाएगा।

नेताजी अपनी हर गलत बात को जस्टिफाइ करते रहे हैं क्योंकि यह देश शक्तिपूजा का देश है। इसलिए इन दिनों वे महानता की अपनी ब्रांडिंग के लिए आये दिन कुछ न कुछ सुविचार प्रकट करते रहते हैं। जैसे कि उनका कहना है कि वे सीबीअाई से प्रमाणित ईमानदार हैं। बिल्कुल सच। क्योंकि लालबहादुर शास्त्री हों या गुलजारीलाल नंदा, इनका कोई मामला सीबीआई तक गया ही नहीं था। इसलिए सीबीआई इनको ईमानदार प्रमाणित कैसे करती और ठेकेदारी से लेकर लाइसेंस  बनवाने तक में पुलिस रिपोर्ट लगवाने वाले सब जानते हैं कि पुलिस ने जिसके चरित्र सत्यापन में उत्तम न लिखा वह काहे का उत्तम। इसीलिए हर माफिया को पुलिस का उत्तम चरित्र होने का प्रमाणपत्र लेकर तपाक से शस्त्र लाइसेंस हासिल हो जाता है जबकि खेती में खून-पसीना बहाने वाले आम किसान को पुलिस से यह रिपोर्ट हासिल करने में जमीन-आसमान के कुलाबे जोड़ने पड़ते हैं और फिर भी रिपोर्ट उसे हासिल नहीं हो पाती।

चुनाव चिन्ह विवाद पर कुछ दिन पहले लखनऊ से दिल्ली जाते समय उन्होंने मीडिया से कहा कि आप लोगों ने हमारा कितना साथ दिया है क्योंकि मैं ईमानदार हूं। सुप्रीम कोर्ट तक ने मुझे इसका प्रमाणपत्र दिया है। वाह रे नेताजी। सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक आपकी सम्पत्ति का मामला गया तो जिन लोगों ने यह समझा कि आपने कुछ गड़बड़ की होगी, वे साले मूर्ख थे। सीता मइया के खिलाफ भी भगवान के सुप्रीम कोर्ट में मामला गया था जिसकी वजह से उनकी अग्नि परीक्षा हुई और तभी वे सतीत्व की मानक बनीं। इसके अलावा कलियुग में आप हैं, जिन्होंने लीला के तहत अपने ऊपर सुप्रीम कोर्ट में मामला लगवाया और क्लीनचिट लेकर महानता का अकाट्य प्रमाण हासिल किया। आम आदमी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तो क्या सब ऑर्डिनेट कोर्ट में भी बेईमानी का मुकदमा नहीं चलता इसलिए साला सबसे बड़ा बेईमान वही है। भारत सरकार को एक आदेश जारी करना चाहिए कि जिनके खिलाफ किसी कोर्ट में कोई मुकदमा न चला हो उस नालायक को नागरिकता के अधिकार से वंचित किया जाता है। उसे शस्त्र लाइसेंस और ठेकेदारी का लाइसेंस देना तो दूर मतदान करने का अधिकार देना भी वर्तमान ईमानदार व्यवस्था को गंवारा नहीं है।

धन्य हैं नेताजी और धन्य हैं प्रजा जी। जो ऐसे प्रवचन को सुनकर भी उफनने का नाम नहीं लेती। बहरहाल बात हो रही थी शिवपाल सिंह यादव की। नेताजी के पारिवारिक द्वंद्व के पहले भी अपने कई  ब्लॉग में अखिलेश सरकार के शुरुआती दिनों में ही मैंने इस बात को नोटिस में लिया कि उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े अखबार लोहियाजी, आचार्य नरेंद्र देव आदि समाजवादी विचारधारा के महापुरुषों की जयंती और निर्वाण दिवस पर शिवपाल सिंह के लेख छाप रहे हैं। सोशलिस्ट इतिहास और विचारधारा के आधिकारिक विद्वान के रूप में उनकी छवि गढ़ने की यह मुहिम अनायास नहीं थी। समाजवादी पार्टी के पारिवारिकता में केंद्रित होने तक पार्टी के थिंकटैंक की पहचान रामगोपाल के हवाले थी इसलिए शिवपाल की इस कोशिश के पीछे भी मुख्य रूप से उन्हीं से होड़ थी। उसी समय यह अंदाज लग जाना चाहिए था कि तमाम लाक्षणिक तरीकों से भी समाजवादी पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई की आग तेज हो रही है।

पहले शायद मुलायम सिंह भी शिवपाल की इन कोशिशों से भिज्ञ नहीं थे, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि अगर शिवपाल का साथ देना उनको जस्टिफाइ करना है तो उनके लिए सार्वजनिक मंच पर सिर्फ इतना बताना ही पर्याप्त नहीं है कि वे उनके सबसे प्रिय अनुज हैं बल्कि लठैत की छवि से उबार कर उन्हें राजनीतिक आंदोलनों के पुरुषार्थी के रूप में भी उनको प्रमाणित करने के लिए काम करना पड़ेगा। इसीलिए बुधवार को उन्होंने कहा कि किस तरह इमरजेंसी के दौरान शिवपाल ने भी छिप-छिपकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मुलायम सिंह के इस हास्यास्पद बयान का खंडन देने के लिए कोई विरोधी पार्टी आगे नहीं आ रही।

मुलायम सिंह रामगोपाल पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन तमाम प्रसंग यह चुगली कर रहे हैं कि भाजपा से वे खुद मिले हुए हैं और उनके लोग मिले हुए हैं। अगर ऐसा न होता तो उनके पौत्र के वैवाहिक आयोजन में नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि जैसी हैसियत से आमंत्रित न होते। उनके तो भाजपा से मिलीभगत के पुराने दर्जनों उदाहरण हैं लेकिन इस लड़ाई में जिस तरह भाजपा उन लोगों का साथ दे रही है उसे एक्सपोज करने के लिए अमर सिंह को जेड प्लस सुरक्षा प्रदान किया जाना और रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव के बारे में यह कहा जाना कि सीबीआई ने यादव सिंह मामले में उन्हें कोई क्लीनचिट नहीं दी है, पर्याप्त है। इसलिए भाजपा इस पर आपत्ति क्यों करे। पर नेताजी खुद यह बताएं कि जब उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए आपातकाल का विरोध करने वाले लोगों को सम्मानित और पुरस्कृत करने के लिए लोकतंत्र सेनानी का दर्जा बनाया था तब उसमें शिवपाल का नाम क्यों नहीं रखा था। उन्हें शिवपाल के इमरजेंसी विरोधी संघर्ष का पता था तो उन्हें उनका नाम भी इसमें रखना ही चाहिए था। जबकि इस योजना का विरोध इस वजह से उनके समर्थक माने जाने वाले दलों ने किया था कि इसका सबसे ज्यादा फायदा संघ के लोगों को हुआ है।

वैसे शिवपाल सिंह से मेरे व्यक्तिगत पहचान जनता दल सरकार बनने के शुरुआती समय से ही है। इटावा में हाशिये पर पदस्थ एक आईपीएस अफसर के घर पर उनका और मेरा दो-तीन बार खाना हुआ। उरई में पहली बार उनका कार्यक्रम भी मैंने ही कराया लेकिन मुलायम सिंह के भाई होने के अलावा उनका कोई राजनैतिक परिचय है, इसकी जानकारी उन्होंने खुद भी मुझे कभी नहीं दी और न ही उनके आसपास रहने वाले किसी अन्य शख्स ने ऐसी कोई जानकारी दी। मुलायम सिंह ने उनके राजनैतिक परिचय के लिए उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष जरूर उन दिनों बनवा दिया था, लेकिन इटावा की राजनीति तक में उन दिनों उनसे ज्यादा कमलेश पाठक की चलती थी और कमलेश पाठक से भी मेरी घनिष्ट मित्रता रही है। जो मेरे कथन की गवाही दे सकते हैं। शिवपाल भइया के दरबार में कमलेश पाठक की ज्यादा पूछ को लेकर उनसे चिढ़े से भी रहते थे, लेकिन अब तो मुलायम सिंह के बयानों से यह लगने लगा है केवल उनके और उनके परिवार के लोग ही थे जिनकी वजह से दुनिया ने समाजवाद का नाम जाना।

अपनी तमाम खामियों के बावजूद हिंदी के लिए प्रतिबद्धता दिखाने और प्रशासन में मुसलमानों को भागीदारी का अहसास कराने के कदमों के लिए मुलायम सिंह को सराहा जा सकता है। पर उनकी अति संकीर्ण होती जा रही पारिवारिकता केंद्रित दृष्टि अंतिम समय में उनकी साख के लिए घातक साबित हो रही है। नेताजी अगर यह सोचते हैं कि यूपी में अखिलेश लोगों की पहली पसंद इसलिए बन गए हैं कि वे उनके लड़के हैं तो उन्हें यह गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए। अपने लड़के के नाते जब उन्होंने नादान अखिलेश को मुख्यमंत्री का पद सौंपा था तो लोग बहुत नाराज थे पर अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की सोच और लक्ष्य को जाति-धर्म के दायरे से बाहर निकालकर व्यापक बनाया और सपा में शालीनता की नई संस्कृति विकसित की व विकास के एजेंडे को सर्वोपरि रखने की भावना जगाई। वह सब कुछ उनका मौलिक कार्य है। जिससे जनता प्रभावित हुई है।

मुलायम सिंह अगर उत्तर प्रदेश में अगर इतने ही सर्वमान्य होते तो कभी तो उन्हें पूरा बहुमत मिला होता। सही बात यह है कि जब वे कुर्सी पर रहे चुनाव में उनकी पार्टी के प्रति नकारात्मक वोटिंग हुई। 2012 के चुनावों में अगर पहली बार सपा को सफलता मिली तो उसकी वजह अखिलेश के चेहरे की ताजगी और उससे भी ऊपर बेरोजगारी भत्ता व लैपटॉप वितरण के वायदे का युवा मतदाताओं पर असर रहा था। मुलायम सिंह ने मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए हमेशा भड़काऊ रास्ता चुना जिससे फायदा सबसे ज्यादा बीजेपी का हुआ लेकिन बदनाम मुसलमान हुए कि वे हमेशा नकारात्मकता को पसंद करते हैं जबकि यह एकदम गलत बात है। ऐसा होता तो भाजपा के साथ तीन बार सरकार बनाने वाली और गुजरात में नरेंद्र मोदी के प्रचार में जाने वाली मायावती को मुसलमानों का समर्थन कभी न मिलता। मुसलमान किसी भी और कौम से ज्यादा सुव्यवस्था को समर्थन देते हैं इसलिए उनकी नीतियों के साथ-साथ अखिलेश की सुव्यवस्थावादी सोच मुसलमानों में भी उनके प्रति सबसे ज्यादा लगाव का कारण बनी हुई है और अगर अखिलेश मुकाबले में रहते हैं तो मायावती ने कितने भी टिकट दिए हों, मुसलमानों का बहुमत अखिलेश के साथ होगा। लेकिन मुलायम सिंह फिर भड़काऊ बातें करने में लगे हैं। अयोध्या के गड़े मुर्दे उखाड़ने के लिए कारसेवकों पर गोली चलवाने जैसे भुलाये जा चुके प्रसंगों की चर्चा करके वे जो शॉर्टकट अपना रहे हैं उससे उसी तरह से भाजपा को फायदा हो रहा है जैसा मुजफ्फरनगर के दंगे के बाद उनके और उनके लोगों के बयानों के कारण 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हुआ था।

भाजपा की यह सबसे पसंद की बात है कि पारिवारिक डाह में बढ़त लेने के लिए मुलायम सिंह मुसलमानों को मोहरा बनाने की बातें करें ताकि उसे लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी राजनीति का उपजाऊ मैदान उत्तर प्रदेश में मिल जाए।

लेकिन यह सारी उठापटक 16 जनवरी तक है। इस डेडलाइन तक अखिलेश नहीं झुके तो मुलायम सिंह का झुकना तय है। राजनीति से इतर पारिवारिकता के आदर्श की बात की जाए तो पिता और पुत्र की यह अंडरस्टैंडिंग बेहद सुहावनी और सम्मोहक लगती है, इसका भी एक रचनात्मक पक्ष है। पारिवारिक स्निग्धता की इस परवाह के कारण ही भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विख्यात हुए क्योंकि उन्होंने पारिवारिक मर्यादाओं को न केवल खंडित नहीं होने दिया बल्कि उन्हें मजबूत बनाने में भूमिका निभाई। इसलिए सपा के समुद्र मंथन में झर रहे तमाम गरल के बीच पिता-पुत्र के अटूट लगाव का यह अमृत भी है।


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