सिर्फ चुनाव जीतने की चिंता खतरनाक

By: jhansitimes.com
Jun 15 2018 06:48 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) लोकबंधु राजनारायण जी के बारे में सुना एक संस्मरण याद आता है। लखनऊ में गोमती किनारे मोहन मीकिन्स वालों को एक डिस्टलरी खोलने की इजाजत देने पर विचार हो रहा था। राजनारायण जी इसके खिलाफ गोमती को प्रदूषण मुक्त रखने के नाम पर धरने पर बैठ गये। उनके पास अपने आंदोलनों में नौजवानों को बड़े पैमाने पर जोड़ने की महारत थी। नौजवान कार्यकर्ताओं की वे बेहद चिंता करते थे। कहा जाता है कि जनता पार्टी टूटने के बाद जब नये चुनाव हो रहे थे तो उन्होंने अपनी पार्टी के लिए 15 लाख रुपये चंदे में एकत्र किये। रकम से भरे सूटकेस लेकर उन्हें दिल्ली पहुंचना था लेकिन आगरा में पता चला कि बनारस के रहने वाले युवा जनता के दो पदाधिकारी वे सूटकेस हथियाकर चंपत हो चुके हैं। अब राजनारायण जी के गुस्से का ठिकाना नही था। उनका क्रोध देखकर जीआरपी के अफसरों को पसीना छूट गया। एक अफसर ने कहा कि आप तहरीर दें मुकदमा दर्ज करके उन बदमाशों को कहीं से पकड़कर लायेंगे चाहे वे आसमान में जाकर छुप गये हों या पाताल में। अफसर को उम्मीद थी कि राजनारायण जी उसके द्वारा यह दंभ भरने से प्रसन्न होकर उसकी पीठ ठोकेंगे लेकिन राजनारायण जी इतना सुनना था कि अफसर पर बमक पड़े। बोले साले रुपया मैने इकटठा किया, मेरे लड़के ले गये तू कैसे मुकदमा कायम करेगा।

तो विचित्र थे राजनारायण जी। मोहन मीकिन्स के खिलाफ धरने में दिन भर हो जाता था और नौजवान कार्यकर्ता भूखे, प्यासे बैठे रहते थे। लोकबंधु से यह न देखा गया। वे अगले दिन मोहन मीकिन्स के दफ्तर में पहुंच गये कि धरना दे रहे उनके लड़कों के खाने-पीने के इंतजाम के लिए चंदा दो। मोहन मीकिन्स के मालिकान ने कहा कि अपने ही खिलाफ धरने के लिए हमको ही चंदा देना पड़े यह तो नही होगा। राजनारायण जी बोले ऐसा ही होगा और आखिर में वे उनसे चंदा लेकर ही माने।

तो राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा उद्योगपतियों से चंदा लेने का चलन लोकतंत्र में शुरू से रहा है लेकिन उस समय राजनीतिक कार्यकर्ताओं का निष्कलंक संघर्ष किसी तप से कम नही होता था। इसलिए चाहे वो उनके खिलाफ हो पर उन्हें चंदा देने में यह गुमान करने की हिम्मत उद्योगपतियों में नही थी कि वे उन पर एहसान कर रहे हैं। इसलिए चंदा देने के बावजूद वे नेताओं से यह कहना तो दूर कि आंदोलन खत्म कर दो यह तक नही कह पाते थे कि थोड़ा ढीला रखो।

जब चुनाव प्रणाली मंहगी होने लगी तो यह अंदेशा जताया जाने लगा कि इतने ज्यादा खर्च के लिए राजनीतिक दल उद्योगपतियों से सीना तानकर चंदा नही ले पायेगें। इसलिए उन्हें अधिक चंदा जुटाने के लिए उद्योगपतियों के सामने अपने जमीर को बेचने के लिए मजबूर होना न पड़ जाये। राजीव गांधी ने अपने पहले चुनाव में जब अमेरिकी विज्ञापन एजेंसी री-डिफ्यूजन को महंगी दरों पर हायर किया तो इसका बहुत विरोध हुआ। लेकिन समय के महानद को सादगी के बांध के जरिये बहुत दिनों तक रोकना संभव नही था सो चुनाव प्रणाली में ज्यादा से ज्यादा खर्च कर बढ़त बनाने की होड़ बढ़ती चली गई। इसके बावजूद धनबल से चुनाव की पवित्रता की रक्षा की चर्चा अपनी जगह होती रहती थी। जनता दल के युग में वीपी सिंह ने राजनैतिक दलों के लिए सरकारी चुनाव फंड बनाने की बात कही जिसे उन्होंने पार्टी के घोषणा पत्र में भी शामिल किया। दूसरी ओर परिस्थितियों से समझौता कर उद्योगपतियों से उनकी शर्तों पर ज्यादा चंदा लेने का क्रम भी बढ़ता गया। फिर भी काफी दिनों तक राजनैतिक दलों के मन में यह विचार रहा कि चुनाव खर्च को सीमित रखने की किस तरह तरकीब निकाली जाये और इसके लिए जनता के दिल जीतने के आसान तरीके कैसे खोजे जायें। पर मोदी युग आते-आते इस मामले में लोकलाज बिल्कुल खत्म कर दी गई है। अब चुनाव खर्च के लिए किसी पार्टी के घोषणा पत्र में सरकारी फंड की व्यवस्था के प्रस्ताव की चर्चा तक नही होती।

सबसे बड़ी बात है कि चुनाव खर्च के धंधे में अब सब कुछ दो नंबर का हो गया है। पेड न्यूज को लेकर दैनिक जागरण जैसे अखबार बहुत बदनाम किये गये लेकिन सच्चाई यह है कि उस समय समाचार छापने के बदले में अखबार को जो आमदनी हुई वह आज हो रही उगाही के बरक्स कुछ नही है। पहले जिलों के पत्रकार चुनाव भर उम्मीदवारों की विज्ञप्तियां छापने के लिए सौंदा करके रुपया अपने जेब में डाल लेते थे। जागरण के मालिकान ने उन पर अंकुश लगाने के लिए विज्ञापन से चारगुनी दर में पेड न्यूज छापने की व्यवस्था बना दी। बिरले ही उम्मीदवार अपना समाचार छपवाने के लिए इतना खर्चा अफोर्ड करने की स्थिति में थे इसलिए नाम भर की पेड न्यूजें छपीं। फायदा यह हुआ कि इसकी वजह से उम्मीदवारों की रददी विज्ञप्तियों को छापने की बजाय पत्रकार अपने कालम पूरे करने के लिए चुनाव के बारे में इतिहास, नई उभरती प्रवृत्तियों और विश्लेषण पर आधारित वास्तविक कवरेज देने के लिए मजबूर हो गये। लेकिन चूंकि इससे उनकी सहालग खत्म हो गई थी। जिससे उन्होंने ऐसा हल्ला मचवा दिया कि लगा कि अखबार मालिकान द्वारा महापाप कर दिया गया है।

लेकिन परवर्ती स्थितियां तो बहुत भयानक हो गईं। गत चुनाव में उम्मीदवारों की बजाय सीधे पार्टियों से बहुत मंहगी दरों पर समाचारों को लेकर समझौते हुए जिसमें उन्होंनें अपनी सुविधा के मुददे, समाचार के कंटेंट, एगिंल और कार्टून आदि के लिए मीडिया संस्थानों की सेवाएं लीं। सबसे ज्यादा खर्च सोशल मीडिया को साधने पर किया गया। फेसबुक आदि पर करोड़ों की संख्या में फर्जी एकाउंट संचालित करने वाले पेड वर्कर लगाये गये। ये लोग जो मेटर और गढ़ी हुई इमेज धड़ाधड़ 24 घंटे शेयर करते रहते थे उन्हें डिजाइन करने वाले कम फीस नही लेते थे। यह भुगतान चुनाव आयोग की खर्च की सीमा से बचने के लिए चोर रास्तों से किया गया। इसलिए इसका कोई हिसाब-किताब नही है। लेकिन यह हिसाब-किताब सही मामले में आ जाये तो लोगों की आंखे फट जायेगीं। यह खर्चा पिछले चुनावों से कई हजार गुना ज्यादा रहा। रामचरित मानस का रूपक इस संदर्भ में याद आ जाता है। रावण का पुत्र मेघनांद जिस मायावी युद्ध में माहिर था वह कुछ आज के समय के इसी प्रपंची युद्ध की तरह था। बिडंबना है कि आज बात राम की हो रही है और काम मेघनांद का। अपने कार्यक्रमों के आधार पर जनता का विश्वास जीतने की बजाय मार्केटिंग के फार्मूले से बढ़त बनाने में विश्वास किया जा रहा है। जाहिर है कि यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही विनाशकारी शुरूआत है।

लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार चुनाव हुए हैं। कभी किसी राज्य की विधानसभा का और कभी किसी राज्य की। नगर निकायों के चुनाव तक में यह पैटर्न हावी रहा। ऐसे में पूरी राजनैतिक व्यवस्था चुनाव लड़ने और जीतने के प्रयोजन तक बंधी रह गई हैं जिसमें सरकारों ने अपने अस्तित्व के लिए अपनी कमान उद्योगपतियों के पास गिरवी रख दी है। उद्योगपति का चुनाव का पूरा खर्चा उठाने का ठेका है। बदले में सरकार वे नीतियां लागू करेगी जो उद्योगपति के दफ्तर में बनेगी। पहले कोई पार्टी इसलिए सत्ता में आने की सोचती थी कि समाज को बदलने का एजेंडा लागू करने की शक्ति उसे मिल जायेगी। तब सत्ता साधन थी लेकिन अब वही साध्य बन गई है। यह एक खतरनाक स्थिति है। इसीलिए मोदी सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसने चार वर्ष के कार्यकाल में समाज की भलाई का एक काम नही किया। उसने जो भी वादे, घोषणाएं कीं लफ्फाजी के लिए। पूंजी के दैत्य के प्रपंच के चलते अन्य सम्मोहन में मोदी भक्त तुकबंदी की तर्ज पर उन्हे बचाने की लचर और हास्यास्पद दलीलें करते रहते हैं। लेकिन खुद भाजपाई तक सच्चाई महसूस करने लगे हैं कि वे कितने खोखले हैं। भाजपा के भी जो असली कार्यकर्ता हैं उन्होंने अपने तरीकों से देश और समाज की खुशहाली के लिए सपना देखा था। इसलिए सत्ता में आने की उम्मीद न होने के समय से वे इस पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे थे जिसके कारण उन्हें अब लग रहा है कि उनकी पार्टी में भी कुछ बदलने वाला नही है तो उन्हें ठगे जाने, छले जाने की अनुभूति होना स्वाभाविक है। इस तरह का मोहभंग उन्होंने अटल के शासन में तो महसूस नही किया था। इसलिए यह नही कहा जा सकता कि यह बताने के पीछे भाजापा के लिए कोई दुर्भावना है।

लोगों ने कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का राजकाज देखा था। जिसके बारे में सुनियोजित ढंग से उन्हें इनके विनाशकारी कारनामों का एहसास कराया गया था। इसके कारण उनके मन में और ज्यादा कटिबद्धता रही कि इन शैतानों से छुटटी मिलने के बाद सब कुछ अच्छा करने का मौका मिलेगा पर अब वे किस घाट पर जायें। उन्हें यह मानने के लिए मजबूर कर दिया गया है कि वे धारा के तिनके हैं इसलिए चुनाव खर्च को कम करने भ्रष्टाचार पर रोक बाजारीकरण पर रोक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं के निजीकरण से जीवन की बदहाली के बाद इनकों फिर से सर्वाजनिक क्षेत्र में देने के प्रस्ताव पर विचार जैसी बातों पर उन्हें चर्चा तक करनी चाहिए। इस तरह एक अंधी सुरंग में पूरा समाज फंस चुका है। सरकार बदले या न बदले लेकिन जो भी सरकार रहे उस पर लगाम लगाने की कुब्बत जन मानस में बाकी रहना चाहिए। अगर आपके तरीके से सिस्टम ठीक नही चल रहा है तो उसे ठीक करने के लिए दूसरों विकल्पों को सोचो और उन्हें अमल में लाओ। दीनदयाल उपाध्याय का राजनैतिक कार्यक्रम हो या जेपी का संपूर्ण क्रांति का दर्शन आज भी ये चीजें प्रासंगिक हैं। उनमें क्या माडल निर्धारित किये गये थे यह नई पीढ़ी को बताये जायें तांकि वे उस फरेब से उबरकर व्यवस्था का बचाव कर सकें जो उनके इर्दगिर्द रच और कस दिया गया है।


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