पद्मावत का विरोध: कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना

By: jhansitimes.com
Jan 26 2018 06:24 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF,K.P SINGH) गुरुवार 25 जनवरी को करणी सेना की धमकियों के बीच पूरे देश में पद्मावत फिल्म कुल मिलाकर सफलता के साथ रिलीज हो गई। हालांकि उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनदेखी कर राजनीतिक मंतव्य से प्रेरित संगठनों ने इस दौरान तांडव करने में कोई कसर नही छोड़ी। यहां तक कि बच्चों को लेकर आ रही स्कूली बसों को भी निशाना बनाया गया। यह पहले से जाहिर था कि वर्तमान सरकारी निजाम की हमदर्दी और शह विरोध प्रदर्शन को प्राप्त है। इसलिए अराजक कार्रवाइयों को रोकने की इच्छाशक्ति नही दिखाई गई। सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का जैसी स्थिति रही। जिसकी वजह से विरोध प्रदर्शन की आड़ में गुंडागर्दी करने वालों के हौसले बुलंद नजर आये।

पूरी दुनियां में भारत गांधी के रूप में पहचाना जाता है। गांधी जी को बहुत लोग इस देश में ऐसे हैं जो पसंद नही करते। उनकी अपनी समझ हो सकती है जिसके कारण उन्हें यह अधिकार भी है। लेकिन गांधी जी का न तो अध्यात्मिक क्षेत्र से कोई संबंध था न ही उनकी कोई पुस्तैनी पृष्ठभूमि धार्मिक कर्मकांडों से जुड़ी हुई थी। बिरादरी से भी वे ब्राहमण न होकर वैश्य थे। राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े एक महापुरुष के लिए लोगों ने इसके बावजूद अध्यात्म में पेटेंट समझे जाने वाले महात्मा का संबोधन सूझा इसमें कोई अजीब बात नही है। यह स्वतः स्फूर्त संबोधन था क्योंकि जिन गुणों के मददेनजर इस देश के लोगों को महात्मा के रूप में किसी को पहचानना सिखाया गया है वे गांधी में इस कदर थे कि बरबस ही देश के बच्चे-बच्चे की जुबान से उनका चेहरा सामने आते ही महात्मा का संबोधन निकल पड़ता है।

आंदोलनों के संदर्भ में उनके उस गुण की पड़ताल की जानी चाहिए जो कि महात्मा के तौर पर मानक के रूप में लोगों में रचे-बसे हैं। महात्मा गांधी ने असयोग आंदोलन का नारा दिया था। इस आंदोलन के दौरान चैरीचैरा में हिंसा हो गई तो महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया। उनके इस फैसले से लोग आहत हुए। इस कारण उनकी आलोचना भी हुई। उस समय महात्मा गांधी की शुरूआत जैसी थी जिससे उन्हें यह अंदेशा होना चाहिए था कि जन भावनाओं के विरुद्ध जाने से उनके राजनैतिक व्यक्तित्व का अकाल हनन न हो जाये। पर महात्मा गांधी ने नैतिक प्रतिबद्धता की खातिर हर जोखिम मंजूर किया।

गांधी जी की स्वीकारता पर विवाद हो सकता है लेकिन महात्मा के रूप में इस तरह का आचरण निर्विवाद रूप से स्वीकार्य था और है। जमाना बदल जाने से इसमें कोई अंतर नही आया। इसलिए हर नेता महात्मा बन भले ही न पाये लेकिन उसे महात्मा के अनुरूप लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखा जाना चाहिए। होना तो यह चाहिए था कि स्कूली बस में हुई तोड़फोड़ के बाद पद्मावत के विरोध में प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लोग इस पर दुख प्रकट करते और ऐसा करने वालों की निंदा भी उनके द्वारा अपेक्षित थी। बहुत अच्छा होता अगर वे इस आधार पर अपना आंदोलन लेने की भी घोषणा कर देते। वैसे भी उनके आंदोलन का कोई अर्थ नही रह जाने वाला था। क्योंकि राजपूत समाज के भी जो लोग फिल्म देखने गये थे लौटकर आने के बाद उन्होंने भी कहा कि फिल्म में राजपूतों का कोई निरादर नही किया गया बल्कि उन्हें फिल्म देखकर अपने राजपूत होने पर और ज्यादा गर्व हुआ है। फिल्म इतनी ज्यादा चर्चा में आ चुकी है और उसका प्रदर्शन रोका नही जा सका है। इस कारण अब फिल्म चलती रहेगी और उसमें दर्शक बढ़ेगें। हो सकता है कि फिल्म में जितनी दम न हो उससे ज्यादा सफलता उसको बाक्स आफिस पर मिले।

करणी सेना को दम दे रहीं सरकारे देश की सर्वोच्च अदालत को बता रही थी कि इसको रिलीज करने की तारीख गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले रखी गई है जबकि गणतंत्र दिवस की तैयारियों में कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के लिए बहुत व्यस्तता रहेगी। इसलिए पद्मावत की रिलीज की तारीख बढ़ा दी जाये। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को मंजूर नही किया। इसके बहाने संविधान का भी संदर्भ इस प्रसंग में आ गया क्योंकि गणतंत्र दिवस को संविधान लागू हुआ था यानि एक व्यवस्था लागू हुई थी। जब विदेशी शासन था उस समय भी महात्मा गांधी जैसे स्वाधीनता संग्राम के सेनापति यह याद रख रहे थे कि दूरगामी हितों को ध्यान में रखते हुए आंदोलन के बावजूद अनुशासन की सीमा को न लांघा जाये यानि उस समय भी उनको व्यवस्था की रक्षा की चिंता थी तब जब कि व्यवस्था विदेशी हाथों में थी। आज जबकि व्यवस्था खुद हमारे हाथों में है तो संविधान दिवस की पूर्व संध्या पर भी आंदोलन के समय इसे बचाये रखने का दायित्व को हम क्यों ध्यान नही रख पाये।

दुनियां में जापान का उदाहरण दिया जाता है जहां जूता फैक्ट्री में हड़ताल हो तो लोग फैक्ट्री जलाने की बजाय एक जूता ज्यादा बनाते हैं। लेकिन संयम और अनुशासन का ध्यान तब अपने आप ही रखने की बात आ सकती है जब आंदोलन नैतिक हो। लेकिन अगर आंदोलन के नैतिक औचित्य पर संदेह है तो विरोध के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी ही नही और भी विध्वंस और विनाश दिखाया जा सकता है। हरियाणा में कुछ समय पहले आरक्षण के मुददे पर जाटों द्वारा किये गये आंदोलन में महिलाओं की इज्जत तक से खिलवाड़ हुआ। देश अमूर्त नही होता। इस देश में उपद्रवियों तक की इच्छा रहती है कि दुनियां में यह महान देश कहलाये। देश व्यक्तियों से बनता है अगर यहां के लोगों के आचरण में महानता की परवाह नही होगी तो देश कैसे महान बन पायेगा। अकेले करणी सेना के ही प्रदर्शन की बात नही है। करणी सेना का प्रदर्शन संविधान लागू करने के दिवस के एक दिन पहले हुआ। इसलिए यह प्रासंगिक हो गया है कि विरोध प्रदर्शनों के तौर-तरीकों पर इस देश में विचार किया जाये। लोगों को अपनी ही सरकारी संपत्ति फूंककर भस्मासुर बनने से रोका जाये। विरोध के संयमित और शालीन तरीके भी प्रभावशाली हो सकते हैं।

जहां तक पद्मावत के विरोध प्रदर्शन की बात है यह एक बहाना था। जिस तरह से कुछ लोगों के प्रभुत्त पर आधारित परंपरागत व्यवस्था की फिर से बहाली का अभियान पिछले कुछ समय से चल पड़ा है यह उसी सिलसिले की एक कड़ी थी। ऐसे उददेश्य में नैतिक बल हो ही नही सकता। इस देश मेें देश भक्ति को दूसरों के अधिकार कुचले रखने की व्यवस्था के लिए हथियार बना लिया गया है। उपनिवेशवादी शासन राष्ट्र भक्ति और राष्ट्र द्रोह जैसी शब्दावली के प्रति बहुत आग्रही और संवेदनशील रहती है। अंग्रेज अगर सांकेतिक तौर पर भी अखबार में उनकी व्यवस्था के खिलाफ उनकी बात छाप दी जाये तो उसे राष्ट्र द्रोह में जेल भेज देते थे। ऐसा ही तमाशा आज दिखाने की कोशिश हो रही है। इस देश में अलग-अलग भाषा, नस्ल, जाति, धर्म, पहरावा और खानपान व रीतिरिवाज के लोग रहते हैं। इसलिए इस देश को चलाने के लिए सामजस्य का गुण व्यवस्था के संचालकों में होना चाहिए। अपनी लाठी से बहुसंख्यक लोगों को हांकने की प्रवृत्ति दर्शाकर इस भावना को अतीत में बहुत चोट पहुंचाई गई और इसीलिए इस देश की सैकड़ों साल तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहकर बहुत दुर्गति हुई। आजादी के बाद यह देश तरक्की करते हुए आज महानता की श्रेणी में रातों-रात नही आ गया। बल्कि देश की व्यवस्था में  समता और सहिषुणता पर दशकों से दिये जा रहे बल का नतीजा इस रूप में आया है। लेकिन कुछ वर्षों से यह चीजें डिरेल हो रहीं हैं। देश में निजाम बदलने के बाद आरक्षण के बहाने जिस तरह से इस देश में बहुजन समाज के खिलाफ विषवमन का सिलसिला शुरू हुआ है उससे यह साफ है कि कुछ लोग मिलजुल कर सारे देशवासी देश को चलाये इसमें यकीन नही रखते। यह उपनिवेशवादी मानसिकता है जिसे फिर से मूर्त रूप देने के लिए आतंक का परिवेश निर्मित किया जा रहा है। क्या पद्मावत के विरोध के बहाने दिखाई गई यह अराजकता आतंकवाद के उददेश्य की पूर्ति के लिए थी?


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