पर्शियन थियेटर शैली की झलक मिलती है कोंच की रामलीला में, साढे सोलह दशक पुरानी मान्यतायें

By: jhansitimes.com
Oct 03 2018 10:44 am
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उरई । उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन के कोंच की ऐतिहासिक और अनुपम रामलीला विश्व प्रसिद्ध रामनगर के समकालीन होने के कारण अपने आप में अद्भुत है। रामनगर (काशी) की रामलीला बर्ष 1830 ईसवी में काशीराज उदित नारायण सिंह के संरक्षण में प्रारंभ हुई थी और राजकीय संरक्षण पाकर देश देशांतर में अपनी ख्याति बना चुकी है, जबकि 1852 ईसवी में शुरू हुई कोंच की रामलीला मात्र जन सहयोग से पोषित होकर बिना किसी राजकीय संरक्षण के अपना पुराना बैभव बनाये रखने में सफल है। इसके विभिन्न मैदानी आयामों ने इसे देश की मैदानी रामलीलाओं के शीर्ष पर प्रतिष्ठित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कोंच की रामलीला में पारसी रंगमंचीय शैली बिल्कुल स्पष्टï दिखाई देती है। महत्वपूर्ण यह भी है कि एक सौ छियासठ बर्ष पूर्व स्थापित परंपरायें और अनुष्ठान आज भी उन्हीं मान्यताओं के साथ कायम हैं जो निश्चित रूप से इस रामलीला की बहुमूल्य थाती है।

कोंच ऋषि की तप:स्थली के रूप में विख्यात कोंच पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर बुंदेलखंड में अपनी एक अलग ही पहचान कायम रखने में सफल तो है ही, सांस्कृतिक चेतना का भी यह एक महत्वपूर्ण केन्द्र है जहां एक सौ छियासठ सालों से अनवरत मंचित होती आ रही रामलीला यहां की बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। कोंच की रामलीला का संचालन यहां की गल्ला व्यापारियों की नगर की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था धर्मादा रक्षिणी सभा अपने संसाधनों से बर्ष 1927 से करती आ रही है। कोंच की रामलीला का इतिहास भी कम विचित्र नहीं है, यह रामलीला पहले नगर से तीन किमी दूर स्थित ग्राम पडऱी में होती थी। जब बर्ष अट्ठारह सौ पचास ईसवी में वहां रामलीला का आयोजन चल रहा था तब वहां कोंच के भी कुछ धर्मशील लोग उसे देखने पहुंचे हुये थे। किसी बात को लेकर आयोजन कमेटी के लोगों के बीच विवाद हो गया और वह विवाद इतना बढ गया कि वहां रामलीला हो पाना सम्भव नहीं रह गया। तब कोंच से गये लोगों ने वहां की आयोजन कमेटी से आग्रह किया कि अगर पडऱी में रामलीला का मंचन सम्भव नहीं हो पा रहा है तो वे इसे कोंच ले जाने की इच्छा रखते हैं। पडऱी के आयोजकों को उनके इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं हुई और इस तरह यहां के धर्मनिष्ठ चौधरी विहारीलाल गौड़ और उनके साथ गये चौधरी दिलीप सिंह वहां से राम, लक्ष्मण, भरत और रिपुदमन के सजीव श्रीविग्रहों को कंधों पर लाद कर कोंच लाये थे।

यहां के इतिहास विदों की अगर मानें तो इस रामलीला के प्रारंभिक कालखंड में श्रीराम चरित मानस के माध्यम से नगर के प्रमुख मंदिरों, पवित्र स्थलों एवं बाग बगीचों में भगवान राम की मनोहारी लीलायें संपन्न होती थीं। बाद में भूतपूर्व ऑनरेरी मजिस्ट्रेट डॉ. गणेशप्रसाद पाठक के पूर्वज रामगोपाल पाठक के सद्प्रयासों से रामलीला स्टेजबद्घ हुई। सिरसा दोगढी के ठाकुर बिष्णुदयाल सिंह के भ्राताश्री ने एक बड़ी द्रव्य राशि भवन निर्माणार्थ प्रदान की थी। सन् 1911 के आसपास श्री रामलीला का प्रबंध संचालन पं. मजबूत सिंह तिवारी रईस के हाथों में था जिन्होंने अपने दायित्वों का पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निर्वहन किया। उस समय तक रामलीला का संचालन स्वतंत्र हाथों में था, बाद में सन् 1927 में गल्ला व्यवसायियों द्वारा धर्मार्थ कार्यों के लिये स्थापित की गई धर्मादा रक्षिणी सभा के हाथों में रामलीला का संचालन सौंप दिया गया जो अभी भी जारी है।

देश की सर्वश्रेष्ठ मैदानी रामलीला का खिताब 

कोंच की ऐतिहासिक रामलीला न सिर्फ बुंदेलखंड या उत्तर भारत बल्कि समूचे देश में ही अपने बिशिष्टï मैदानी आयामों की बजह से भारत की सर्वश्रेष्ठ मैदानी रामलीला का खिताब पा चुकी है। कोंच की रामलीला में कमोवेश तीन मैदानी आयामों को मेले के रूप में समाबिष्टï किया गया है जिनके कारण ही इसे यह बिशेष दर्जा अयोध्या शोध संस्थान द्वारा बर्ष 2009 में दिया गया था। राम वनवास के बाद स्थानीय सागर तालाब में सरयू पार मेले का आयोजन किया जाता है जिसे देखने के लिये तालाब के किनारों पर हजारों की भीड़ जुटती है। इसके बाद सीता हरण, मारीच बध और रावण-जटायु युद्घ को भी गढी के मैदान में मेले के रूप में दर्शाया जाता है जहां मुस्लिम बहुल इलाका होने के बाबजूद हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनूठी मिसाल के रूप में मुस्लिमों की सक्रिय सहभागिता रहती है। सबसे रोचक मैदानी आयाम दशहरा मेला होता है जहां राम-रावण युद्घ में सजीवता लाने के लिये रावण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों को गाडिय़ों पर बांध कर मैदान में दौड़ा दौड़ा कर युद्घ का सजीव चित्रण किया जाता है। दशहरा मेला ग्राउंड धनुताल के मैदान में पूर्वी छोर पर पचास फीट ऊंची लंका दृष्टïव्य होती है जिस पर जनकनंदिनी सीता को विराजमान कराया जाता है और यहीं पर रावण का सैन्य शिविर प्रतिबिंबित होता है, जबकि मैदान के पश्चिमी छोर पर राम का सैन्य शिविर लंका विजय हनुमान मंदिर पर दृष्टïव्य होता है। मेघनाद की अमोघ शक्ति से लक्ष्मण का अचेत होना, हनुमान का संजीवनी बूटी लाना, भरत का हनुमान पर वाण प्रहार और मेघनाद बध के उपरांत सुलोचना का विलाप जैसे दृश्यांकन इस मेले को बहुत ही खास बनाते हैं। मेला देखने के लिये कोंच नगर और आसपास के ग्रामीण अंचलों की कमोवेश चालीस से पचास हजार की भीड़ जुटती है।


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