पढ़ लीजिये, बुंदेलखंड में पानी के लिए दलितों की संघर्ष गाथा !

By: jhansitimes.com
Dec 22 2018 06:23 pm
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(रिपोर्ट - प्रदीप श्रीवास्तव ) अतिपिछड़े और सामंती बुंदेलखंड में पानी के लिए संषर्घ यहां के दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन, पानी के लिए दलितों के संघर्षों की कहानी सड़े-गड़े सामाजिक मान्यताओं और दलितों की शानदार लड़ाईयों को पेश करता है। यहां पर दलितों को पानी लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। सवर्णों के कुएं से पानी नहीं मिलने पर उन्हें सरकारी हैंडपपं के सहारे जीवन गुजारनी पड़ रही है। करीब एक शताब्दी पहले लिखे गए मुंशी प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआं बुंदेलखंड के गांवों में आज भी जिंदा है। 

बुंदेलखंड का कोई आधिकारिक नक्शा तो नहीं है, लेकिन भगौलिक स्थिति, भाषा और संस्कृति की समानता को देखते हुए यह मध्य प्रदेश के छह  और उत्तर प्रदेश के  सात जिलों से मिलकर बनता है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड की आबादी करीब 1.8 करोड़ है। इनमें 1 करोड़ पुरूष और 80 लाख महिलाएं शामिल हैं। बुंदेलखंड की करीब 80 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। इनमें भी 25 से 30 प्रतिशत आबादी दलितों की है, यह आबादी गांवों के बाहरी हिस्से में उपेक्षित रह कर गुजर बसर करने को मजबूर है। बुंदेलखंड न सिर्फ औद्योगिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा है, बल्कि यहां के समाज में सामंती मूल्य भी गहरे जड़ जमाए हैं। जाति व्यवस्था चरम पर है। दलितों से भेदभाव के मामले में भी बुंदेलखंड की स्थिति काफी खराब है। सूखे के कारण पानी को लेकर होने वाले झगड़ों में भी दलितों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है, जबकि पानी पर सबका हक होने के बाजवूद दलित आबादी को पानी से वंचित कर दिया जाता है। बुंदेलखंड के गांवों का आर्थिक व सामाजिक ढांचा बहुत धीमी गति से बदल रहा है। क्योंकि, यहां सामंती मूल्यों व मान्यताओं के खिलाफ कोई बड़ा जनआंदोलन नहीं हुआ है। महिलाओं को पर्दा करना पड़ता है, जबकि दलितों के साथ उठने बैठने में भेदभाव किया जाता है। यहां तक की गांवों में मनरेगा में काम के दौरान भी दलितों को उपेक्षा सहना पड़ता है। ऐसे माहौल में दलितों का पानी के लिए संघर्ष करना आम बात है। पुराने समय में हर साल पड़ने वाले सूखे को देखते हुए बुंदेलखंड में सैकड़ों की संख्या में तालाब और कुएं बनाए गए। गांवों के आसपास एक-दो तालाब और गांव के अंदर दो-चार कुएं जरूर मिल जाएंगे। यहां तक की कई गांवों में आबादी के बीच में ही तालाब हैं, जिससे सभी को आसानी से पानी मिलता रहे, लेकिन तब भी दलितों को पानी के लिए तरसना पड़ता है। 

वाॅटरएड इंडिया के फेलोशिप के तहत गांवों का भ्रमण करके और लोगों से बातचीत करके एक रिपोर्ट तैयार की गई। रिपोर्ट के अनुसार बांदा जिले के मोहनपुरवा गांव के संदीप कुमार वाल्मिकी कहते हैं कि पहले तालाबों और कुएं पर सवर्णों ने कब्जा कर रखा था, अब सरकारी हैंडपंपों पर उनका अधिकार है। गांव के हैंडपंप तो हम नहीं छू सकते है, लेकिन स्कूल के हैंडपंप जरूर हमारे के लिए वरदान हैं। यहां हमें पानी भरने से कोई नहीं रोक सकता है। जानकारों की मानें तो पुराने समय में तालाब व कुएं एक हद तक निजी संपत्ति के तौर पर माने जाते थे, इसलिए, सरकार ने गांव-गांव हैंडपंप लगवा दिए। जिससे सभी धर्म और जात के लोगों को आसानी से पानी मिलता रहे। बावजूद इसके, पानी के लिए दलितों को संघर्ष कम नहीं हुआ है। यहां के दलितों को पानी लेने के लिए कई प्रकार की लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई जगहों पर हैंडपंप से पानी लेने के लिए समय तय हैं। तय समय को सख्ती से पालन किया जाता है, जिससे वह किसी को छू न जाए। अगर तय समय पर पानी नहीं ले सकें तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। इसे लेकर कई बार झगड़े होते हैं, गांव के पंचायत में निपटारा नहीं होने की दशा में ऐसे झगड़े पुलिस और कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। 

चित्रकूट के पतौड़ा गांव के कैलाश वाल्मिकी कहते हैं कि दलितों में भी मेहतर या गंदगी साफ करने वालों को सबसे ज्यादा नीची नजर से देखा जाता हैं। दलितों में भी अहिरवार व दूसरी कई जातियां हैं, जिनके साथ पानी को लेकर कम भेदभाव किया जाता है, लेकिन वाल्मिकी, चमार, डोमार आदि गंदगी साफ करने वाली जातियों के साथ ही बहुत ज्यादा भेदभाव होता है। इन जातियों के घर अक्सर गांव के बाहर होते हैं, इसलिए इस वर्ग की महिलाओं या पुरूषों को गांव के अंदर के हैंडपंपों से पानी लेने की इजाजत नहीं है। हैंडपंप खराब होने की दशा में दलितों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। दलितों को हैंडपंप सुधारने के लिए किसी अपने जैसे ही दलित मिस्त्री को ढूंढना पड़ता है। गांवों में तो ऐसे मिस्त्री मिलते नहीं है, उन्हें महंगे दामों पर आसपास के शहर से ऐसे मिस्त्री को ढूंढना पड़ता है, जो उनके हैंडपंप को सुधार सके। ऐसे मिस्त्री भी मुंहमांगा दाम लेते हैं। दलितों का एक हैंडपंप सुधरने में कई-कई दिन लग जाते हैं। तब तक इन्हें गांव के सरकारी स्कूलों से पानी भरना पड़ता है। 

बुंदेलखंड में जल संचयन को लेकर काम करने वाले जन जल जोड़ों अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष संयज सिंह कहते हैं कि अधिकतर मामले तो पंचायत निपटा देती है। जो पुलिस तक पहुंचते है, उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती है। चूंकि, सामाजिक तानाबाना इस तरह है कि अगर दलित आवाज उठाता है तो उसकी आवाज दबा दी जाती है। दलित इस हकीकत को जानता है।  बुंदेलखंड के चित्रकूट के एक गांव में रहने वाली लक्ष्मीनिया की कहानी किसी उपन्यास के पात्र की तरह है। वह चित्रकूट के कर्बी ब्लाॅक के पतौड़ा गांव में रहती है। करीब साठ साल की लक्ष्मीनिया ने जिंदगी के सबसे खराब दिनों को देखा है। वह बताती हैं कि कई सालों पहले गांव में एक भी हैंडपंप नहीं था। केवल पांच कुएं थे, इनमें से मात्र एक कुंए से हमें पानी भरने की इजाजत थी। वह कुंआ भी गांव के बाहर गंदगी के बीच था। यह अक्सर सूखा रहता था, उपेक्षित था, इसलिए हमें इस्तेमाल के लिए मिल गया था। लेकिन इसका हम प्रयोग नहीं कर पाते थे। अक्सर गर्मियों के दिनों में जब कुंआ सूख जाता था, तो हम गांव के पास से बहने वाली नहर का प्रयोग पानी पीने के लिए करते थे। लेकिन, नहर का पानी भी हमें सीधे लेने की इजाजत नहीं थी। इसलिए, नहर से करीब पांच या दस मीटर दूर किनारे की ओर हम एक या दो हाथ का गड्ढा खोद देते थे। यह गड्ढा शाम को खोदते थे, जिससे रातभर में उसमें पानी भर जाता था। उस पानी को कपड़े से छान कर पीते थे। इस कार्य का भी समय निश्चित था। हम सूरज निकलने से पहले ही पानी को घड़े में भर लेते थे और यही पानी हमारे जीवन का सहारा था। 


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