विस्तार से पढ़ें, क्या सुलखान सिंह को सेवा विस्तार मिल पाएगा

By: jhansitimes.com
Sep 29 2017 07:35 am
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(editor-in-chief, K.P SINGH ) समाजवादी पार्टी की सरकार ने बेशक विकास की दिशा में बेहतर प्रयास किए थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में फिर भी उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। जानकार इसके पीछे कानून व्यवस्था को मुख्य वजह बताते हैं। इसीलिए योगी सरकार ने कार्यभार संभालने के बाद यूपी की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का भरोसा सबसे ज्यादा दिलाया था। लेकिन छह महीने में इस मोर्चे पर उसकी उपलब्धियां जनमानस की निगाह में निराशाजनक रही हैं। पुलिस के फीके दबदबे की वजह से राज्य में दुस्साहसिक और सनसनीखेज घटनाओं की बाढ़ आती रही। कमोवेश कानून व्यवस्था के मामले में योगी सरकार का हिसाब-किताब अखिलेश की विदा ले चुकी सरकार के संदर्भ में यथावत ही माना जाएगा।

ऐसा नहीं कि केवल विपक्ष और मीडिया ही इस मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा करने का जोश दिखा रहे हों। राज्य में कानून व्यवस्था न सुधर पाने की धारणा इतनी बलवती है कि सरकार के अपने भी इसे नकारने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। अखिलेश सरकार के समय सूबे के राज्यपाल राम नाइक प्रदेश की कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बेहद संवेदनशीलता बरतते रहे हैं इसलिए उन्हें वर्तमान स्थिति पर घेरा गया तो वे योगी की तरह वस्तुस्थिति से साफ मुकर जाने की दिलेरी नहीं दिखा सके। आखिर राज्यपाल योगी नहीं हैं जिन्हें यह भ्रम हो कि उनके शब्द ब्रह्म हैं इसलिए उन्हें कुछ कहने के पहले जनमानस के बीच अपनी विश्वसनीयता की चिंता करनी पड़ती है। अपनी सरकार होने की वजह से राज्यपाल अखिलेश के जमाने की तरह बेबाक नहीं हो सकते थे लेकिन धर्मसंकट में अपने को घिरा पाने के बावजूद कुछ हफ्ते पहले राज्यपाल प्रदेश की कानून व्यवस्था से जुड़े सवाल पर यह कह ही बैठे कि इस मोर्चे पर सुधार की जरूरत अभी भी है। थोड़ा लिखा बहुत समझना की तर्ज पर राम नाइक का यह कहना अर्थपूर्ण है।

यह दूसरी बात है कि सीएम योगी आदित्यनाथ को इस मामले में अपनी सरकार की हेती मंजूर नहीं है। हो सकता है कि अगर वे यह कहते कि कानून व्यवस्था सुधारने के लिए प्रदेश में ईमानदारी से प्रयास किए गए हैं। जिनका वांछित परिणाम न मिलने से सरकार भी चिंतित है, लेकिन हमारे मन में खोट नहीं है। इसलिए जल्द ही इस क्षेत्र में हमारे प्रयासों के लोगों के मनमाफिक नतीजे सामने आएंगे। तो उनकी इज्जत और साख ज्यादा बढ़ती। लेकिन योगी ऐसी किसी विनम्रता के कायल नहीं हैं।

खासतौर से कानून व्यवस्था के मामले में उन्हें लेशमात्र आलोचना भी बर्दाश्त नहीं  हो सकती क्योंकि यह मुद्दा सजातीय होने के कारण उनके अपने चहेते डीजीपी सुलखान सिंह के करियर से जुड़ा है। 30 सितंबर को सुलखान सिंह रिटायर होने जा रहे हैं, लेकिन सीएम योगी चाहते हैं कि केंद्र उनके सेवा विस्तार करे ताकि उनकी क्षमताओं का कुछ और समय तक लाभ प्रदेश को मिल सके। जबकि क्षमताओं के नाम पर सुलखान सिंह के खाते में ईमानदारी के अलावा कुछ नहीं है। उनके कार्यकाल में पुलिस की जबर्दस्त भद्द पिटी। न केवल संगीन घटनाएं नहीं रुक सकीं बल्कि पुलिस खुद की हिफाजत में भी नाकाम होती नजर आयी। रायबरेली में पांच लोगों की सामूहिक हत्या के मामले में पुलिस की करतूत के कारण ही भाजपा के सामने अपने सबसे प्रभावशाली समर्थक वर्ग की नाराजगी का मौका सामने आ गया तो सहारनपुर में जातीय दृष्टिकोण से पुलिस की एकतरफा कार्रवाई के चलते संघ परिवार के हिंदुत्व के शामियाने में छेद होते दिखने लगे।

छुटभैये बदमाश और अराजक तत्व तक खाकी का कोई खौफ न होने से जगह-जगह पुलिस पर हमलावर हुए। कई जगह जांबाज पुलिसजनों को इस माहौल के चलते शहादत देनी पड़ी जो कि विभाग की अपूर्णनीय क्षति के रूप में देखी जा रही है। सपा के दबंगों द्वारा जमीन-जायदाद पर कब्जे को खाली कराने की ताल सरकार ने पुलिस के भरोसे कार्यकाल शुरू करते ही बहुत जोरदारी से ठोकी थी, लेकिन पुलिस उसके भरोसे पर खरी नहीं उतर पायी। सपा कार्यकाल के माफियाओं का दमन भाजपा के लोगों ने भी जिलों-जिलों में झेला। इसलिए भाजपा का कार्यकर्ता उम्मीद कर रहा था कि उनसे गिन-गिन कर अपनी सरकार बनने के बाद पुलिस हिसाब लेगी,लेकिन उनका बाल बांका भी नहीं हुआ। संगठित अपराधों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई बेहद नरम रही है।

हालांकि मीडिया में इस महीने के पहले तक कानून व्यवस्था सुधारने में लगातार यूपी पुलिस के फिसड्डी साबित होने से तीव्र क्षोभ झलकता रहा था। लेकिन इस महीने मीडिया के सुर बदल गये। सरकार की ओर से मीडिया मैनेजमेंट की जादूगरी के चलते सितंबर के पहले महीने से अखबारों में आहिस्ते से सुलखान सिंह को सुपर कॉप साबित करने की कहानियां सामने लायी जाने लगीं। अब जबकि सुलखान सिंह को सेवा विस्तार मिलेगा या नहीं इस सस्पेंस के उजागर होने में कुछ घंटों का समय बाकी रह गया है। एक प्रमुख अखबार में फर्स्ट पेज की लीड स्टोरी उन्हें सेवा विस्तार मिलने की पूरी संभावना जताते हुए प्रकाशित की गई। यह स्टोरी सूचनात्मक नहीं है बल्कि विवरणात्मक है। इसमें बताया गया कि सुलखान सिंह के कार्यकाल में किस तरह पुलिस ने खुले इनकाउंटर में20 बदमाशों को ढेर किया। कैसे उन्होंने पुलिस के कमजोर दिल में मजबूती भरने का करिश्मा दिखाया जिससे पुलिस गोलियां बरसाते बदमाशों से कतराने की बजाय उनसे लोहा लेने का साहस दिखाने लगी।

यह खबरें पेंटेड और प्लांटेड हैं। अगर पुलिस में वास्तव में ऐसा बदलाव आया होता तो दो महीने तक लगातार लोगों की असुरक्षा को बढ़ाने वाली घटनाओं की सुर्खियां मीडिया में न छायी रहीं होतीं। अगर पुलिस का जांबाज चेहरा योगी को पसंद होता तो वे बड़े बाबू की तरह नौकरी करते रहे प्रकाश सिंह की बजाय उनकी पार्टी ज्वाइन कर चुके बृजलाल से डीजीपी के चयन के मामले में सलाह-मशविरा करते, जिन्होंने लखनऊ एसपी सिटी से लेकर मेरठ के एसएसपी तक के दौर में वाकई में उस कार्यशैली का प्रदर्शन किया जिसका खाका अखबारों में अब सुलखान सिंह के नंबर बढ़ाने के लिए खिंचवाया जा रहा है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ जब माफियाओं की गिरफ्त में चली गई थी तो अपने समय के दो युवा अधिकारियों ने सड़क पर एके-47 धारी बदमाशों से मोर्चा लेकर उनके हौसले पस्त कर दिए थे और यूपी पुलिस के इकबाल का जोरदार परचम अपराधियों की दुनिया में लहरा दिया था। इन अधिकारियों में एक थे बृजलाल और दूसरे अभी भी सेवा में हैं डीजी होमगार्ड सूर्यकुमार शुक्ला। वरिष्ठता में सूर्यकुमार भले ही तीसरे नंबर पर हों लेकिन लगातार तीन वर्ष तक केंद्र के मूल्यांकन में बेस्ट के रिमार्क को पाने वाले वे क्षमताओं में सबसे ऊपर हैं। लेकिन उनकी क्षमता की चर्चा करने से सुलखान सिंह की क्षमता का गुणगान अर्थहीन हो सकता है इसलिए सरकार यह गलती करने से रही।

सरकार ने फील्डिंग सजा ली थी, लेकिन कुछ अपशकुनकारी घटनाओं ने उसका मनोबल हिला दिया है। वृंदावन (मथुरा) में संघ के अखिल भारतीय समन्वय सम्मेलन में सहारनपुर के जातीय दंगे से निबटने के तरीके पर आरएसएस की नाखुशी पहला अपशकुन थी। इसके बाद खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट से जुड़े एक कुख्यात आतंकवादी के पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद छूट जाने की बदनामी दूसरा अपशकुन बनकर सामने आयी और तीसरा अपशकुन बीएचयू में छात्रा के साथ छेड़खानी के बाद भड़के बवाल में पुलिस की भूमिका पर उठे सवालों के रूप में सामने आया। योगी सरकार का कलेजा वाकई में मजबूत है वरना इन प्रश्नचिन्हों को देखकर कोई और सीएम होता तो खुद की फजीहत बचाने के लिए अधिकारी विशेष का मोह निश्चित रूप से छोड़ देता। पर योगी पुलिस की नाकामी झलकाने वाली हर घटना को विपक्ष की साजिश से जोड़कर चुटकियों में उड़ाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि सुलखान सिंह को अंतिम क्षणों में फुलप्रूफ सुरक्षा कवर दे सकें। देखना यह है कि केंद्र उनकी जिद का अनुमोदन करने का जोखिम कहां तक उठाता है। मीडिया की प्रायोजित खबरें कुछ भी हों लेकिन केंद्र की हलचलों से वाकिफ जानकार सूत्र बता रहे हैं कि विवादों से पार्टी का दामन बचाने के लिए केंद्र सुलखान सिंह की सेवा विस्तार की फाइल को वापस करने का मूड बना चुका है। वस्तुस्थिति जो भी हो लेकिन 30 सितंबर का इंतजार फिलहाल लोगों को बहुत बेसब्री से है।

समाजवादी पार्टी की सरकार ने बेशक विकास की दिशा में बेहतर प्रयास किए थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में फिर भी उसको पराजय का मुंह देखना पड़ा। जानकार इसके पीछे कानून व्यवस्था को मुख्य वजह बताते हैं। इसीलिए योगी सरकार ने कार्यभार संभालने के बाद यूपी की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने का भरोसा सबसे ज्यादा दिलाया था। लेकिन छह महीने में इस मोर्चे पर उसकी उपलब्धियां जनमानस की निगाह में निराशाजनक रही हैं। पुलिस के फीके दबदबे की वजह से राज्य में दुस्साहसिक और सनसनीखेज घटनाओं की बाढ़ आती रही। कमोवेश कानून व्यवस्था के मामले में योगी सरकार का हिसाब-किताब अखिलेश की विदा ले चुकी सरकार के संदर्भ में यथावत ही माना जाएगा।

ऐसा नहीं कि केवल विपक्ष और मीडिया ही इस मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा करने का जोश दिखा रहे हों। राज्य में कानून व्यवस्था न सुधर पाने की धारणा इतनी बलवती है कि सरकार के अपने भी इसे नकारने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। अखिलेश सरकार के समय सूबे के राज्यपाल राम नाइक प्रदेश की कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बेहद संवेदनशीलता बरतते रहे हैं इसलिए उन्हें वर्तमान स्थिति पर घेरा गया तो वे योगी की तरह वस्तुस्थिति से साफ मुकर जाने की दिलेरी नहीं दिखा सके। आखिर राज्यपाल योगी नहीं हैं जिन्हें यह भ्रम हो कि उनके शब्द ब्रह्म हैं इसलिए उन्हें कुछ कहने के पहले जनमानस के बीच अपनी विश्वसनीयता की चिंता करनी पड़ती है। अपनी सरकार होने की वजह से राज्यपाल अखिलेश के जमाने की तरह बेबाक नहीं हो सकते थे लेकिन धर्मसंकट में अपने को घिरा पाने के बावजूद कुछ हफ्ते पहले राज्यपाल प्रदेश की कानून व्यवस्था से जुड़े सवाल पर यह कह ही बैठे कि इस मोर्चे पर सुधार की जरूरत अभी भी है। थोड़ा लिखा बहुत समझना की तर्ज पर राम नाइक का यह कहना अर्थपूर्ण है।

यह दूसरी बात है कि सीएम योगी आदित्यनाथ को इस मामले में अपनी सरकार की हेती मंजूर नहीं है। हो सकता है कि अगर वे यह कहते कि कानून व्यवस्था सुधारने के लिए प्रदेश में ईमानदारी से प्रयास किए गए हैं। जिनका वांछित परिणाम न मिलने से सरकार भी चिंतित है, लेकिन हमारे मन में खोट नहीं है। इसलिए जल्द ही इस क्षेत्र में हमारे प्रयासों के लोगों के मनमाफिक नतीजे सामने आएंगे। तो उनकी इज्जत और साख ज्यादा बढ़ती। लेकिन योगी ऐसी किसी विनम्रता के कायल नहीं हैं।

खासतौर से कानून व्यवस्था के मामले में उन्हें लेशमात्र आलोचना भी बर्दाश्त नहीं  हो सकती क्योंकि यह मुद्दा सजातीय होने के कारण उनके अपने चहेते डीजीपी सुलखान सिंह के करियर से जुड़ा है। 30 सितंबर को सुलखान सिंह रिटायर होने जा रहे हैं, लेकिन सीएम योगी चाहते हैं कि केंद्र उनके सेवा विस्तार करे ताकि उनकी क्षमताओं का कुछ और समय तक लाभ प्रदेश को मिल सके। जबकि क्षमताओं के नाम पर सुलखान सिंह के खाते में ईमानदारी के अलावा कुछ नहीं है। उनके कार्यकाल में पुलिस की जबर्दस्त भद्द पिटी। न केवल संगीन घटनाएं नहीं रुक सकीं बल्कि पुलिस खुद की हिफाजत में भी नाकाम होती नजर आयी। रायबरेली में पांच लोगों की सामूहिक हत्या के मामले में पुलिस की करतूत के कारण ही भाजपा के सामने अपने सबसे प्रभावशाली समर्थक वर्ग की नाराजगी का मौका सामने आ गया तो सहारनपुर में जातीय दृष्टिकोण से पुलिस की एकतरफा कार्रवाई के चलते संघ परिवार के हिंदुत्व के शामियाने में छेद होते दिखने लगे।

छुटभैये बदमाश और अराजक तत्व तक खाकी का कोई खौफ न होने से जगह-जगह पुलिस पर हमलावर हुए। कई जगह जांबाज पुलिसजनों को इस माहौल के चलते शहादत देनी पड़ी जो कि विभाग की अपूर्णनीय क्षति के रूप में देखी जा रही है। सपा के दबंगों द्वारा जमीन-जायदाद पर कब्जे को खाली कराने की ताल सरकार ने पुलिस के भरोसे कार्यकाल शुरू करते ही बहुत जोरदारी से ठोकी थी, लेकिन पुलिस उसके भरोसे पर खरी नहीं उतर पायी। सपा कार्यकाल के माफियाओं का दमन भाजपा के लोगों ने भी जिलों-जिलों में झेला। इसलिए भाजपा का कार्यकर्ता उम्मीद कर रहा था कि उनसे गिन-गिन कर अपनी सरकार बनने के बाद पुलिस हिसाब लेगी,लेकिन उनका बाल बांका भी नहीं हुआ। संगठित अपराधों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई बेहद नरम रही है।

हालांकि मीडिया में इस महीने के पहले तक कानून व्यवस्था सुधारने में लगातार यूपी पुलिस के फिसड्डी साबित होने से तीव्र क्षोभ झलकता रहा था। लेकिन इस महीने मीडिया के सुर बदल गये। सरकार की ओर से मीडिया मैनेजमेंट की जादूगरी के चलते सितंबर के पहले महीने से अखबारों में आहिस्ते से सुलखान सिंह को सुपर कॉप साबित करने की कहानियां सामने लायी जाने लगीं। अब जबकि सुलखान सिंह को सेवा विस्तार मिलेगा या नहीं इस सस्पेंस के उजागर होने में कुछ घंटों का समय बाकी रह गया है। एक प्रमुख अखबार में फर्स्ट पेज की लीड स्टोरी उन्हें सेवा विस्तार मिलने की पूरी संभावना जताते हुए प्रकाशित की गई। यह स्टोरी सूचनात्मक नहीं है बल्कि विवरणात्मक है। इसमें बताया गया कि सुलखान सिंह के कार्यकाल में किस तरह पुलिस ने खुले इनकाउंटर में20 बदमाशों को ढेर किया। कैसे उन्होंने पुलिस के कमजोर दिल में मजबूती भरने का करिश्मा दिखाया जिससे पुलिस गोलियां बरसाते बदमाशों से कतराने की बजाय उनसे लोहा लेने का साहस दिखाने लगी।

यह खबरें पेंटेड और प्लांटेड हैं। अगर पुलिस में वास्तव में ऐसा बदलाव आया होता तो दो महीने तक लगातार लोगों की असुरक्षा को बढ़ाने वाली घटनाओं की सुर्खियां मीडिया में न छायी रहीं होतीं। अगर पुलिस का जांबाज चेहरा योगी को पसंद होता तो वे बड़े बाबू की तरह नौकरी करते रहे प्रकाश सिंह की बजाय उनकी पार्टी ज्वाइन कर चुके बृजलाल से डीजीपी के चयन के मामले में सलाह-मशविरा करते, जिन्होंने लखनऊ एसपी सिटी से लेकर मेरठ के एसएसपी तक के दौर में वाकई में उस कार्यशैली का प्रदर्शन किया जिसका खाका अखबारों में अब सुलखान सिंह के नंबर बढ़ाने के लिए खिंचवाया जा रहा है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ जब माफियाओं की गिरफ्त में चली गई थी तो अपने समय के दो युवा अधिकारियों ने सड़क पर एके-47 धारी बदमाशों से मोर्चा लेकर उनके हौसले पस्त कर दिए थे और यूपी पुलिस के इकबाल का जोरदार परचम अपराधियों की दुनिया में लहरा दिया था। इन अधिकारियों में एक थे बृजलाल और दूसरे अभी भी सेवा में हैं डीजी होमगार्ड सूर्यकुमार शुक्ला। वरिष्ठता में सूर्यकुमार भले ही तीसरे नंबर पर हों लेकिन लगातार तीन वर्ष तक केंद्र के मूल्यांकन में बेस्ट के रिमार्क को पाने वाले वे क्षमताओं में सबसे ऊपर हैं। लेकिन उनकी क्षमता की चर्चा करने से सुलखान सिंह की क्षमता का गुणगान अर्थहीन हो सकता है इसलिए सरकार यह गलती करने से रही।

सरकार ने फील्डिंग सजा ली थी, लेकिन कुछ अपशकुनकारी घटनाओं ने उसका मनोबल हिला दिया है। वृंदावन (मथुरा) में संघ के अखिल भारतीय समन्वय सम्मेलन में सहारनपुर के जातीय दंगे से निबटने के तरीके पर आरएसएस की नाखुशी पहला अपशकुन थी। इसके बाद खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट से जुड़े एक कुख्यात आतंकवादी के पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद छूट जाने की बदनामी दूसरा अपशकुन बनकर सामने आयी और तीसरा अपशकुन बीएचयू में छात्रा के साथ छेड़खानी के बाद भड़के बवाल में पुलिस की भूमिका पर उठे सवालों के रूप में सामने आया। योगी सरकार का कलेजा वाकई में मजबूत है वरना इन प्रश्नचिन्हों को देखकर कोई और सीएम होता तो खुद की फजीहत बचाने के लिए अधिकारी विशेष का मोह निश्चित रूप से छोड़ देता। पर योगी पुलिस की नाकामी झलकाने वाली हर घटना को विपक्ष की साजिश से जोड़कर चुटकियों में उड़ाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि सुलखान सिंह को अंतिम क्षणों में फुलप्रूफ सुरक्षा कवर दे सकें। देखना यह है कि केंद्र उनकी जिद का अनुमोदन करने का जोखिम कहां तक उठाता है। मीडिया की प्रायोजित खबरें कुछ भी हों लेकिन केंद्र की हलचलों से वाकिफ जानकार सूत्र बता रहे हैं कि विवादों से पार्टी का दामन बचाने के लिए केंद्र सुलखान सिंह की सेवा विस्तार की फाइल को वापस करने का मूड बना चुका है। वस्तुस्थिति जो भी हो लेकिन 30 सितंबर का इंतजार फिलहाल लोगों को बहुत बेसब्री से है।


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