पढ़ लीजिये, अधिकारी प्रेम ने कराई योगी की किरकिरी

By: jhansitimes.com
Dec 17 2017 09:24 am
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(Editior-in-Chief, K.P SINGH) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह शर्मनाक होना चाहिए कि जिन अफसरों के खिलाफ सपा सरकार में मलाई काटने की वजह से हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही थी उन्हें उनकी सरकार ने भी सिर पर बैठाने से गुरेज नहीं किया।

योगी के दावों से  तो ऐसा लग रहा था कि वे सपा सरकार को बेहद भ्रष्ट मानते रहे हैं इसलिए उस सरकार में जिसको प्राइम पोस्टिंग मिली उन्हें अब हाशिये पर जाना होगा। ईमानदार और काबिल लोगों को ही महत्वपूर्ण पोस्टिंग देने का वादा भी था लेकिन इसके बावजूद रामपुर में आजम खां के तलुवे चाटते रहे पहाड़ी ठाकुर राजीव रौतेला उनके राज में भी उन्हीं के गृह जनपद गोरखपुर और मैदानी क्षत्रिय राकेश कुमार सिंह कानपुर देहात के डीएम के रूप में पोस्ट हो गए। उन्होंने जो स्याह-सफेद किया था उस पर कोई कार्रवाई न होती अगर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने सीधे इनको निलंबित करने का फरमान न सुनाया होता। यूपी की सरकार कितने पाक-साफ तरीके से काम कर रही है यह उसकी एक बानगी है।

दोनों ही अधिकारी किस कदर गुस्ताख थे। रामपुर के मामले में इस पर एक निगाह डालने से साफ हो सकेगा। रामपुर जिले के दरियाब निवासी मकसूद ने दो वर्ष पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि हुसैन क्रेशर के मालिक गुलाम हुसैन नन्हें द्वारा कोसी नदी में अवैध रूप से खनन किया जा रहा है। 24 अगस्त 2015 को इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया कि रामपुर के डीएम दर्शायी गयी अनियमितता पर कार्रवाई करके अवैध खनन बंद कराएं। यह जानते हुए भी हाईकोर्ट के आदेश में कोई कलाकारी दिखाना नौकरी के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है, एक के बाद एक दो डीएम साहबान ने नन्हें खां के काम को लीगलाइज करने की जुर्रत उन्हें भंडारण का परमिट देकर कर डाली। फिर भी मकसूद पीछे पड़े रहे और नन्हें खां का संरक्षण करने के लिए जिम्मेदार उक्त दोनों आईएएस अधिकारियों को हाईकोर्ट ने निलंबन का प्रसाद दे डाला।

योगी सरकार जातिगत आधार पर नियुक्तियों के फेर में पड़कर अपनी शुरुआत ही खराब कर चुकी है। गोरखपुर मेडिकल कालेज में आक्सीजन सिलेंडरों में आपूर्ति में कमी की वजह से जब दर्जनों बच्चों की मौत हुई थी तभी लोगों की निगाह थी कि इसके लिए प्रमुख रूप से जो लोग जवाबदेह हैं डीएम राजीव रौतेला भी उनमें ऊपर हैं। अब उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या नहीं पर राजीव रौतेला को हटाया तक नहीं गया। इसी तरह इन पंक्तियों के लेखक को व्यक्तिगत रूप से जानकारी है कि राकेश कुमार सिंह की जानकारी में होते हुए भी जालौन जिले के कालपी से लगी कानपुर देहात की सीमा में यमुना नदी के अंदर पोकलैंड लगाकर बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया जा रहा था लेकिन शिकायतें होने के बावजूद आरके सिंह को कार्रवाई करना गवारा नहीं हुआ। रामपुर के उनके प्रीवियस कंडक्ट को जानते हुए भी योगी सरकार द्वारा उनकी ओर से आंखें मूंदे रहने का यह परिणाम था।

आईएएस संवर्ग के मामले में यह शिकायत आम है कि यह कॉडर औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार होने की वजह से निरंकुशता का अभ्यस्त हो चुका है। इसमें सबसे प्रतिभाशाली मानसमेधा को स्थान मिलता है। इसलिए जो आईएएस अधिकारी कुदरत से उन्हें मिले बौद्धिक शक्ति के वरदान को अपने समाज और देश की भलाई में फलीभूत करना चाहते हैं उन्हें वाहवाही भी कम नहीं मिलती पर ऐसे आईएएस अधिकारी बिरले हैं। ज्यादातर तो छुईमुई इगो के कारण न तो किसी की सुनना चाहते हैं और न कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे झलके कि वे सरकार की नौकरी कर रहे हैं। इन अधिकारियों को यह पता है कि वे जिस संवर्ग में चयनित हुए हैं उसकी गरिमा और प्रतिष्ठा के आगे कितना भी पैसा धूल बराबर है। फिर भी ज्यादा से ज्यादा रकम बटोर कर ही सुर्खरूह होने की मृग मरीचिका वे बुरी तरह उलझ चुके हैं।

पहले चयन प्रक्रिया कुछ इस प्रकार की थी कि खानदानी आधार वाले लोग ही इस पायदान पर चढ़ पाते थे। लेकिन इस बीच सामान्य घरों के लड़के संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में काफी सफल हुए, इससे उम्मीद थी कि अब इस सेवा का स्वरूप आम लोगों के लिए संवेदनशील होगा। लेकिन दहेज प्रथा ने इसमें अर्थ का अनर्थ कर दिया। आईएएस बनने के बाद अरबों-खरबों का काला धन बटोरने वाले माफिया इनको दामाद के रूप में खरीद लेते हैं और इसके बाद ससुराल के मुकाबले अपनी कमजोर स्थिति की वजह से इनकी जो हीन ग्रंथि उभर जाती है उसकी वजह से सारी शर्म-हया छोड़कर यह लोग पैसा कमाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने में लग जाते हैं।

भ्रष्टाचार के मामले में इनमें भय इसलिए नहीं होता कि इनका संवर्ग महाभारत के कर्ण की तरह वरदानी अमोघ कवच-कुंडल से आरक्षित होता है। संपत्ति का ब्यौरा देने के मामले में यूपी के ज्यादातर आईएएस अधिकारी सरकार के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं लेकिन उन पर क्या कार्रवाई हुई। शासन, लोकायुक्त, सतर्कता आदि में कितने ही आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांचें लंबित हैं लेकिन कार्रवाई की बजाय उनमें लीपापोती का खेल चलता रहता है। मध्य प्रदेश व अन्य राज्यों में तो आईएएस अधिकारियों के खिलाफ भी सरकार के स्तर से एक्शन हुए हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में तो तभी एक्शन होता है जब हाईकोर्ट का डंडा चलता है। अक्टूबर में गोंडा में हो रहे अवैध खनन की खबरें टीवी चैनलों पर वीडियो फुटेज के सबूतों के साथ चलीं तो योगी सरकार ने कई थानेदार और खनिज अधिकारी निलंबित कर दिए लेकिन डीएम का कुछ नहीं  बिगड़ा। योगी इतने भोले तो नहीं हैं जो यह न जानते हों कि यह कारगुजारी डीएम न चाहें तो कभी नहीं हो सकती थी।

मायावती इस बात को जानती थीं कि प्रशासन में सर्वशक्तिमान अगर कोई है तो आईएएस अधिकारी इसलिए अंबेडकर गांव के निरीक्षण में अगर उनके कुरेदने से खड़ंजा उखड़ गया तो डीपीआरओ या और किसी छोटे अधिकारी को बलि का बकरा बनाने की बजाय वे  सीधे डीएम और कमिश्नर को रगड़ती थीं।  इस नीति की वजह से वे आईएस अधिकारियों से अपनी मंशा के मुताबिक काम करा लेने में सफल थीं। उनकी सरकार में दूसरे कामों चाहे जितनी गड़बड़ी हो लेकिन उनका जो एजेंडा था उसमें टस से मस नहीं हो सकता था। वरना कांशीराम शहरी गरीब कालोनी जैसे प्रोजेक्ट को हर कस्बे में मूर्त रूप देना आसान काम नहीं था। लेकिन योगी तमाम अन्य सफेदपोश सरकारों की तरह आईएएस के ग्लैमर से चकाचौंध रहते हैं, उनकी महिमा के आगे नतमस्तक हैं इसलिए उनके किसी निर्देश का बखूबी पालन नहीं हो रहा। सही बात यह है कि उनके पास सरकार की उपलब्धियां बताने के नाम पर थोथे प्रवचन करने के अलावा कुछ नहीं है।

योगी ने जब कार्यभार संभाला था तब कई दिन सचिवों और विभागाध्यक्षों के प्रजेंटेशन का अवलोकन करने में उन्होंने गुजारे थे। लेकिन अधिकारी उनके पहले जितना इनोवेटिव काम कर रहे थे उतना भी इनोवेटिव काम व्यक्तिगत स्तर पर कोई अधिकारी किसी जिले में करता नहीं दिखाई दे रहा। आईएएस वीक में अधिकारियों ने फिर उनकी ललक समझकर अपना प्रजेंटेशन देकर उन्हें पुलकित किया। हालांकि इस दौरान योगी ने आईएएस अधिकारियों को लताड़ते हुए यह भी कहा कि उऩकी परफार्मेंश में गिरावट आई है जो चिंता की बात है। 8-9 महीने के कार्यकाल में उनके रवैये की वजह से लोगों में निराशा पैदा हुई है, लेकिन साथ ही वे कई मामलों में उनकी पीठ थपथपाने से नहीं चूके। अगर आईएएस अधिकारियों के प्रति उनका नजरिया जैसा वे बोले वैसा होता तो वह हालिया आदेश कैसे सामने आता जिसमें उन्होंने आईएएस अधिकारियों को आईपीएस अधिकारियों के अधिकारी हाईजैक करने का रास्ता खोल दिया है। इस रवैये से तो ढर्रा बदलने वाला नहीं है।

दरअसल जरूरत इस बात की है कि आईएएस अधिकारियों का दिमाग खुद को पैसा कमाने की मशीन बनाने की ओर से हटाया जाए। इसके लिए सतर्कता विभाग से एकमुश्त उन आईएएस अधिकारियों की परिसंपत्तियों की जांच कराई जानी चाहिए जिन्होंने अकूत दौलत कमाई है। इसे पता करने के लिए किसी बड़ी मशक्कत की जरूरत नहीं है। कल्याण सिंह सरकार के समय आईएएस एसोसिएशन के ही एक ग्रुप ने महाभ्रष्ट अधिकारियों के चुनाव के लिए गुप्त मतदान कराने का चौंकाने वाला प्रयोग किया था। जिसमें आये नामों में से कई को बाद में जेल जाना पड़ा था। यानी अकूत दौलत इकट्ठी करने वाले आईएएस अधिकारियों के चेहरे बहुत उजागर हैं। इनके खिलाफ लंबित शिकायतों को भी तत्परतापूर्वक तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाना चाहिए। माफियाओं के लिए यूपीकोका बन गया। जनप्रतिनिधियों के मुकदमे के लिए विशेष अदालतें बन रही हैं लेकिन आईएएस अधिकारी जो कि सारी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की गंगोत्री हैं उनके लिए कुछ नहीं हो रहा। जनहित गारंटी कानून को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी बताती है कि गवर्नेंस का क्या हाल है। विकास केवल भौतिक संसाधनों से नहीं होता, यह विकास का अधूरा वृत्त है। जो कि हुकूमत की गुणवत्ता के बिना पूरा नहीं हो सकता। हुकूमत की कुंजी आईएएस संवर्ग है। यह चाभी ठीक होगी तभी बेहतर शासन-प्रशासन के तिलिस्म का ताला खुल सकेगा।


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