पढ़ लीजिये, मायावती का असल वारिस कौन, भतीजा आकाश या कोई बाहरी

By: jhansitimes.com
Sep 20 2017 08:47 am
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बसपा राजनीतिक आंदोलन से जागीर में परिवर्तित हो गई है तो उसका भावी जागीरदार राज परिवार के ही वंश का कोई चेहरा हो सकता है, यह पहले से तय है। इसमें किसी तरह की बहस की गुंजाइश नहीं है। बसपा की मेरठ रैली में इसी प्राकृतिक रुझान के दस्तूर की तरह बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने लंदन रिटर्न भतीजे आकाश का परिचय यह संकेत देते हुए कराया कि देख लो उनके युवराज को क्योंकि भविष्य में आपको इसी की रहनुमाई में काम करना है। लेकिन यह मामला इतना सादा नहीं है जितना समझा जा रहा है।

इसके पहले जब मायावती ने अपने उत्तराधिकारी की चर्चा की थी तो यह कहा था कि वह दलित बिरादरी में से ही कोई होगा, उसकी उम्र अभी 18-19साल है लेकिन साथ-साथ यह भी कहा था कि उनका उत्तराधिकारी जो तय हो चुका है उनके परिवार में से कोई नहीं है। लोगों की निगाह उस समय उनके उत्तराधिकारी के बतौर तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजाराम पर जाकर टिक गई थी। मीडिया के एक बड़े हिस्से में यह खबर प्रकाशित-प्रसारित भी हुई। इससे मायावती ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दिखाई। चिढ़कर उन्होंने एक झटके में बिना किसी कारण के राजाराम को पदच्युत कर पैदल कर दिया और तत्काल उनकी जगह अपरिचित से चेहरे आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त कर डाला।

इसके बाद मीडिया के अटकलबाज आनंद कुमार वर्मा के नाम पर सट्टा खिलवाने लगे। मीडिया के विश्लेषक राजनीति के महापंडित कहे जाते हैं,लेकिन वे दरअसल बहुत भोले-भाले लोग हैं या लाल बुझक्कड़ टाइप के लोग हैं। जब राजाराम की उपाध्यक्ष पद से बर्खास्तगी हुई थी, मीडिया को तभी मायावती मंशा समझ में आ जानी चाहिए थी। राजाराम में कोई दोष था तो सिर्फ इतना कि वे मायावती के परिवार से नहीं जुड़े थे। इसलिए नादानी करने की बजाय मीडिया को शायद समझना चाहिए था कि मायावती ने कहा भले ही हो कि उनका उत्तराधिकारी उनके परिवार का नहीं होगा लेकिन दरअसल व्यक्तिवादी राजनीति का जो चरित्र है उसमें वे आसानी से परिवार के बाहर के किसी व्यक्ति को अपना राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपने की सोच भी नहीं सकतीं।

बहरहाल इस वर्ष अंबेडकर जयंती पर जब मायावती ने अपने भाई आनंद को बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने की घोषणा की तो जंगल में आग की तरह खबर फैल गई कि आनंद का ही नाम उन्होंने अपने जेहन में बसपा के आगामी सुप्रीमो के रूप में तय कर रखा है। मेरठ की रैली में हालांकि आकाश के अलावा उनके पिता आनंद भी मायावती के साथ मंच पर मौजूद रहे लेकिन मायावती ने एक बार फिर अटकलों को गच्चा दे दिया है।

आनंद की बजाय आकाश के नाम पर मायावती ने आश्वस्ति महसूस की तो इसके कारण समझे जा सकते हैं। पहला तो यह है कि मायावती लगभग 62 साल की होने को जा रही हैं जिसे निश्चित रूप से बहुत उम्र नहीं मानती होंगी। उन्हें लगता होगा कि अभी 17-18 साल और वे फुल फॉर्म में राजनीति की पारी खेल सकती हैं। इस बीच अगर भाई को प्रोजेक्ट कर दिया तो अपनी उम्र बढ़ती देख वे उतावले हो सकते हैं जिसमें उनके लिए जोखिम पैदा हो सकता है। मायावती ने इसके कारण उन्हें जहां का तहां थामकर आकाश का नाम उछाल दिया ताकि जब तक वे सक्षम हैं पार्टी में उन्हें कोई चुनौती देने वाला पैदा न हो। जो बाहर से ही नहीं उनके घर से भी आ सकता है। आकाश के पास अभी धैर्य धारण करने के लिए लंबा वक्त है और वे जब वे अपने करियर के बारे में निश्चिंत हो जाएंगे तो अपने पिता आनंद की किसी भी अनर्गल महत्वाकांक्षा के लिए सबसे बड़े ब्रेकर खुद ही रहेंगे।

वैसे रहस्य की एक बात यह भी है कि मायावती अतीत में अपने परिवार से बहुत खुश नहीं रही हैं क्योंकि जब उन्होंने कांशीराम के साथ रहने का फैसला किया था तो परिवार उनके विरोध पर उतारू हो गया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार तो वे अपने पिता की इस बात के लिए भर्त्सना सी कर बैठी थीं कि उन्हें तो अपने बेटे पर नाज था लड़कियों पर कहां, लेकिन अब लड़की की वजह से ही उनका नाम रोशन हो रहा है।

मायावती के गुरु कांशीराम की सोच पारिवारिक मोह से परे थी। उनकी धारणा थी कि अगर मिशन को सफल बनाना है तो परिवार के प्रति लगाव-जुड़ाव को खत्म करना होगा। कांशीराम के चंदा बटोरने और मुलायम सिंह जैसे समकालीन राजनीतिज्ञों का लगातार भयादोहन करते रहने को लेकर कई किंवदंतियां रही हैं लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जो भी अर्जन किया पार्टी और उस वंचित समाज के लिए जिसको उन्होंने अपना जीवन समर्पण कर दिया था। पार्टी के कोष से एक छदाम उन्होंने अपने परिवार के लोगों को नहीं लेने दी और न ही परिवार के किसी सदस्य को पार्टी में जीते जी कहीं फटकने दिया। मायावती को उन्होंने उनके लड़ाकू-जुझारू तेवरों से प्रभावित होकर न केवल अपनाया बल्कि मिशन के अपने उत्तराधिकारी के बतौर तय कर दिया जो कि न केवल उनके परिवार की नहीं थीं बल्कि उनके घर-गांव या क्षेत्र की भी नहीं थीं। उम्मीद थी कि मिशन जबकि अभी अपनी तार्किक परिणति पर नहीं पहुंचा है इसलिए मायावती भी अपने गुरु की परहेजगारी के मुताबिक ही कार्य करेंगी।

लेकिन मायावती ने निजी महत्वाकांक्षा के लिए मिशन को भेंट चढ़ाने की शुरुआत मान्यवर की आंखें बंद होने के पहले ही कर दी थीं। कांशीराम समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन अप्रिय स्थिति में टूट जाने के बावजूद मुलायम सिंह यादव को बहुजन परिवार का अंग घोषित करते रहे ताकि दोनों के बीच फिर से मेल-मिलाप की गुंजाइश बनी रहे, लेकिन मायावती वर्ण व्यवस्थावादी ताकतों के हाथों में अपने स्वार्थ साधन के लिए खेलती रहीं। मिशन में सामूहिकता का दबाव काम करता था जिसके खतरे को वे नजरंदाज नहीं कर सकती थीं इसलिए उन्होंने बहुजन को सर्वजन में बदल दिया और मिशन को अलक्षित कर दिया। जब भाजपा का ग्राफ रसातल में पहुंच गया था तब सामाजिक अनुदारवादियों के लिए बसपा को मायावती ने सबसे बड़ी शरण स्थली बनाया। जिसमें न केवल वे पनाह पा सके बल्कि अपनी राजनीति को फिर से बुलंदियों की ओर अग्रसर करने का मुकाम भी हासिल कर सकें। भाईचारा समितियों के नाम पर उन्होंने जातिवाद के बोतल में बंद होते जिन्न को फिर से आजाद उडा़न के लिए खोल दिया जिससे बहुजन की सामूहिकता तितर-बितर हो गई। गुजरात में सांप्रदायिक दंगों के नरमेद के दौरान उन्होंने जानबूझ कर नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार करने का फैसला लिया, जिससे बहुजन ताकतें हतप्रभ रह गई थीं। लेकिन वे निरुपायता के अलावा अब कुछ नहीं कर सकती थीं।

पर 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद इस वर्ष के विधानसभा चुनाव में बसपा की जो दुर्गति हुई उससे कुछ दिनों के लिए लगा कि मायावती ने अपनी गलत राजनीति से सबक सीखा है और फिर से अपनी राजनीति को सैद्धांतिकता के मुताबिक आगे बढ़ाने की जरूरत वे महसूस करने लगी हैं। लेकिन जब उनको मोदी सरकार ने बहुत ही बारीकी के साथ भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति की जांच के पिंजरे में कैद कर लिया तो उनकी हेकड़ी फिर जाती रही। आज मायावती ब्लैकमेलिंग के कारण पोशीदा तौर पर भाजपा की कठपुतली बन चुकी हैं। चाहे विपक्षी एकता से उनका सीटों के बंटवारे का बहाना लेकर पलायन कर जाना हो या गौवंश वध पर रोक जैसे मुद्दों का भौचक करने वाला समर्थन। उनके बयानों से साफ झलक रहा है कि वे भाजपा की उंगलियों पर नाचने को मजबूर हो चुकी हैं।

इस बीच आनंद के खिलाफ वित्तीय एजेंसियों ने घेरा कसा था। यादव सिंह के मामले में भी उनकी गर्दन कानून के शिकंजे में जकड़ी हुई है। अब समझना होगा कि मायावती इसके कारण लहू पुकारेगा का खेल खेल रही हैं जिसमें भाई के प्रति हमदर्दी की बजाय खुद को सुरक्षित कर लेने की चालबाजी ज्यादा है। आनंद और उनके परिवार के माध्यम से मायावती ने अपनी अकूल संपत्ति का निवेश किया है। ऐसे में उन्हें डर है कि सरकारी एजेंसियों के दबाव में आऩंद कातर हो गये और उन्होंने मुंह खोल दिया तो उनका बुरा हश्र होगा इसलिए भाई पर उनका लाड़ उमड़ पड़ा है। इस स्नेह बंधन को और मजबूत दिखाने के लिए आकाश को भी राजनीति में खींच लेना सिर्फ मायावती की ही रणनीति का हिस्सा हो सकता है। मायावती को इंतजार है 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का। अगर इसमें राजनीतिक विपत्ति के बादल छंटे तो फिर अपने उत्तराधिकारी को लेकर उनकी भाषा बदल सकती है इसलिए उनके पहले के इस बयान पर पूर्ण विराम नहीं लगाया जाना चाहिए कि उनका वारिस दलित समाज से कमउम्र का नौजवान है, जिसे वे अपने मन में तय कर चुकी हैं और जो उनके परिवार का नहीं हैं।


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