ट्यूशन पढ़ना छात्र, छात्राओं की मजबूरी, शिक्षक अपनी-अपनी कोचिंग को बता रहे बेहतर,अभिभावक परेशान

By: jhansitimes.com
Oct 12 2017 06:07 pm
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सैय्यद तामीर उददीन महोबा। शासनादेश को ताक पर रखकर सरकारी अध्यापक अपनी दुकानें चला रहे है, उन्हें न तो किसी अधिकारी का भय है, औन न ही समाज का। उन्हें मतलब है तो सिर्फ पैसा कमाने से। मालूम हो कि सन 2002 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अध्यादेश का नाम कोचिंग अध्यादेश रखा था, इसके अन्तर्गत नियम बनाया कि कोई भी व्यक्ति जो सरकारी कर्मचारी है वह टयूशन नहीं पढ़ायेगा और यदि वह पढ़ाते हुये पकड़ा गया तो उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही कर जुर्माना भी किया जायेगा, परन्तु न तो जनपद के शिक्षकों को अधिकारियों का डर है, औन न हीं समाज का। जिला सहित कई कस्बों के शिक्षक बेखौफ होकर अपनी कोचिंग की दुकानें चला रहे है। कोचिंग में माध्यमिक शिक्षकों से कहीं आगे प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक है नगर के कई मुहल्लों में प्राइमरी शिक्षक बेखौफ होकर कोचिंग चला रहे है, उनके घर के बाहर सुबह 6 बजेसे लेकर 10 बजे तक तथा शाम 4 बजे से लेकर 7 बजे तक साइकिलों का जमघट लगा रहता है।

 जिले में कई शिक्षक अपने घरों में पढ़ाते है,वहीं कुछ अध्यापक प्रैक्टिकल के नाम पर छात्रों का शोषण भी करते देखे जा सकते है ये अध्यापक स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों पर टयूशन पढ़ने का दबाव बनाते है, यदि कोई छात्र आर्थिक तंगी की वजह से टयूशन नहीं पढ़ता तो अध्यापक उसे प्रैक्टिकल में कम नंबर देकर फेल करने तक की धमकी दे डालते है, अबऐसे में बच्चें भी क्या करें या तो वह शिक्षकों की धमकी में आकर टयूशन पढ़ने को मजबूर हो जाते है, या फिर आर्थिक तंगी की वजह से अपना कैरियर ही दांव पर लगा देते है अगर जिले में यही हाल रहा तो सरकारी शिक्षक ऐसे ही अपनी दुकानें चलाते रहेगें शिक्षा के दिन व दिन गिरते स्तर के कारण छात्राओं को अब टयूशन पढ़ना जरूरी हो गया है। 

 उनका मानना है कि बिना टयूशन पढ़े परीक्षा में सफलता पाना आसान नहीं है, विद्यालयों में न तो कोर्स पूरा कराया जाता है और न ही इस बात की जानकारी दी जाती है, कि परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिये किस प्रकार की तैयारी की जाये। यही कारण है, कि टयूशन की प्रथा समाज में अपना स्थान बना चुकी है, टयूशन के इस रोग से यदि कोई वर्ग सबसे आहत है तो वह है गरीब अभिभावक शिक्ष सत्र प्रारम्भ होते ही गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, के शिक्षकों के आवास छोटे, छोटे विद्यालयों के रूप में तब्दील होते दिखाई पड़ रहेहै, जहां सिर्फ एक घंटे मेंएक साथ 15 से 20 छत्र छत्राओं को अध्ययन कराया जाता है इसके बदले में शिक्षक छात्र छात्राओं से 500 से 1000 रुपये तक वसूल कर रहे है, डिग्री कालेज में छात्र ,छात्राओ से विष्य के प्रश्न पत्र के अनुसार पूरे कोर्स का ठेका ले लिया जाता है इसका निर्धारित शुल्क 1500 से 2000 रुपये तक होता है, इसका ठेके में टयूशन के समय कोई पाबंदी नहीं होती है, बल्कि कम से कम अवधि में कोर्स पूरा दिया जाता है। टयूशन के लिये शिक्षकों द्वारा परोक्ष रूप से विद्यार्थियों पर दबाव भी बनाया जाता है, उन्हें प्रयोगात्मक परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने या कोई प्रश्न पत्र खराब हो जाने पर दौड़,धूप कर उत्तीर्ण अंक दिलाने का भी लालच दिया जाता है। 

 यंू तो प्रदेश की हर संस्था द्वारा टयूशन की प्रथा पर रोक लगाने के लिये तरह, तरह के निर्देश दिये जाते है, लेकिन उनका परिणाम सिफर ही रहता है, टयूशन की यह कथा कठोर कार्यवाही के अभाव में दिन व दिन और बढ़ती जा रही है यही कारण है कि छात्र, छात्राओं का अब टयूशन पढ़नपा अनिवार्य हो गया है छज्ञत्र भी अच्छी तरह समझ चुका है कि विद्यालय में शिक्षकों द्वारा कोर्स पूरा न किये जाने के कारण यदि उसे परीक्षा में सफलता प्राप्त करनी है तो टयूशन उसकी मजबूरी है। गरीब अभिभावकों के बच्चों की पढ़ाई के अतिरिक्त परिवार के भरण, पोषण के लिये भी दिन रात एक करना पड़ता है। इस सम्बन्ध में कई छात्रों का कहना है कि जब स्कूल में शिक्षक पढायेंगे ही नही ंतो टयूश नही एक मात्र सहारा है, छात्र कहे है, कि स्कूल के शिक्षक तो केवल घर पर टयूशन के लिये बुलाते है। 

स्कूल में तो वह केवल और शिक्षकों के साथ्ज्ञ गपशप करते देखे जाते है, कई छात्राओ का कहना है कि अब प्रायोगात्मक परीक्षा में अच्छे अंक भ उसी को मिलते है जो टयूशन पढ़ता है, यही कारण है कि एक, एक छात्र को कई, कई विषयों की टूयूशन पढ़ती पढ़ती है, कई करीब अभिभावक कहते है कि टयूशन की परम्परा गरीब अभिभावकों के लिये अभिशाप बन चुकी है।    


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