आरक्षण के बाबजूद नगर पालिका चिरगांव पर राजशाही का कब्जा, जीतते हैं किले के डमी

By: jhansitimes.com
Nov 03 2017 07:55 am
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(रिपोर्ट, अजय झा ) झांसी। कहने को राजशाही प्रथा खत्म हो गई है, लोगों को समान नजर से देखा जाता है। लेकिन बुन्देलखंड में झांसी की चिरगांव नगर पालिका ऐसी है जहां आजादी के बाद आज भी राजशाही प्रथा चल रही है। इस नगर पालिका पर राजा साहब के डमी प्रत्याशियों को प्रतिनिधित्व मिलता है। फिर चाहे यह सीट आरक्षित हो या अनारक्षित। 

यह है भौगलिक स्थिति

झांसी मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर है यह चिरगांव नगर पालिका। इस नगर पालिका में लगभग 13 हजार से अधिक की जनसंख्या है। चिरगांव नगर पालिका 1934 में नगर पंचायत थी। इसके बाद 1978 में नगर पालिका बन गई। इसी नगर पालिका में राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त का भी जन्म हुआ था। 

यह हैं राजा साहब....

 इस नगर पालिका में राघवेन्द्र जूदेव उर्फ संजले राजा रहते हैं। आजादी के पहले उनके दादा-परदादा यहां राजा हुआ करते थे। देश आजाद हुआ तो राजशाही प्रथा को भी समाप्त कर दिया गया था। लेकिन इस नगर पालिका में आज भी राजशाही प्रथा चली आ रही है। सरकार कोई भी आये और जाये लेकिन राज उनका ही चलता है। यहां आरक्षण का भी कोई असर नहीं दिखता है। 

अध्यक्ष कोई भी लेकिन हुक्म राजा साहब का चलता

जानकारों की मानें तो जब यह नगर पालिका नगर पंचायत थी तो उन्होंने अपने परिवार के सदस्य को पंचायत अध्यक्ष बनवाया था। इसके बाद से लगातार अध्यक्षी अपने ही पास रखी। फिर चाहे महिला हो या पुरुष या फिर आरक्षित सीट। इसके बाद समय बदलते ही इस नगर पंचायत को नगर पालिका का दर्जा मिल गया। नगर पालिका का दर्जा मिलने के बाद भी उन्होंने अपना ही कब्जा बनाये रखा। लोगों का कहना है कि जब कभी यह सीट आरक्षित हो जाती है तो वह अपने किले में काम करने वाले लोगों को डमी प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतार देंते हैं। जब वह जीत जाते है तो वह नाम के अध्यक्ष रहते हैं लेकिन हुक्म राजा साहब का चलता है। 

इस बार भी डमी प्रत्याशी उतरा चुनावी मैदान में 

ऐसा ही कुछ इस बार भी हो रहा है। चिरगांव सीट आरक्षित होने के कारण राजा साहब ने अपने किले में रहने वाले एक दलित युवक को उम्मीदवार बनाकर चुनावी मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि चिरगांव का मतदाता राजा साहब के डमी प्रत्याशी को चुनता है या फिर राजाशाही प्रथा की जंजीरें तोड़ता है। फिलहाल यह तो आने वाली 1 दिसम्बर ही तय करेगी कि इस बार वह अपनी राजशाही बचाने में सफल होते या नहीं, परिणाम का इंतजार करें। 


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