सरकार के रंग ढंग से सवर्णों में स्यापा.... बता रहे, चौंकाने वाला खुलासा प्रधान संपादक के.पी सिंह

By: jhansitimes.com
Aug 04 2018 10:29 pm
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लोक सभा चुनाव के नजदीक आने के साथ सरकार ने सामाजिक न्याय के मोर्चे पर जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले लेने शुरू किये हैं उससे सवर्ण आहत और स्तब्ध हैं फिर भी उन्हें मोदी सरकार न निगलते बन रही है न उगलते। विक्षोभ जताने के बावजूद वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं जिससे कोई निर्णय नही ले पा रहे हैं। उनके सामने विकल्प का संकट है। वैसे इस तरह के मुददों को लेकर समूचे सामाजिक द्वंद के पीछे भाजपा का कपटाचार है। उसने यथार्थ के निरूपण के बजाय लोगों की नादान मानसिकता को बढ़ावा दिया। अब उसकी मजबूरी यह है कि सत्ता में बैठने के बाद न्याय और व्यवहारिकता के अनुरूप कार्रवाइयां उसे करनी पड़ रही हैं जो उसकी घोषित नीतियों से मेल नही खाती। नतीजतन उसके मुख्य समर्थक अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।

भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ घोड़े को सफलता मिलने की शुरूआत होने के साथ ही सोशल मीडिया पर उसके समर्थकों की आकांक्षाएं और आशाएं सामने आनी शुरू हो गई थीं जिनमें आरक्षण की व्यवस्था और दलित उत्पीड़न के प्रावधानों को समाप्त किये जाने का विश्वास प्रकट किया जा रहा था। यह दूसरी बात है कि सरकार की बागडोर संभालते ही मोदी को जो विराट रूप दर्शन हुआ उसके कारण उनके सुर बदल गये थे और बाबा साहब की भक्ति का गान उनकी जबान से सुनाई देने लगा था। सवर्ण समाज इसको भांप न सका और इसे केवल राजनीतिक चतुराई मानकर अपने मंसूबों के ख्वाब में डूबा रहा।

मोदी को वर्ण व्यवस्था की बहाली का युग मानकर उसका आचरण उच्छृंखल होने लगा। जिसकी मार दलितों पर फिर पुराने समय जैसी दिखाई देने लगी। अचानक दलित दूल्हें के घोड़े पर चढ़कर बरात लाने से रोकने की जुर्रत सामने आने लगी। ऐसे मौकों का अधिक जश्न मनाने की कीमत कई जगह दलितों को चुकाने की नौबत आ गई। गौरक्षा के बहाने उनके दमन और उत्पीड़न का मोर्चा नये सिरे से खोला जाने लगा। यह भाजपा ने विरोधाभास बढ़ते जाने की आहट देने वाली परिघटनाएं थीं।

उत्तर प्रदेश में जब भाजपा सत्ता में आई तो सवर्ण सुपरमेसी के प्रदर्शन की पराकाष्ठा के लिए सारे तकाजे भुला दिये गये। यहां मुख्यमंत्री सवर्ण, पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष सवर्ण, मुख्य सचिव सवर्ण, डीजीपी सवर्ण, लगभग सभी जिलों के डीएम सवर्ण, सभी जिला पुलिस प्रमुख सवर्ण यहां तक कि सभी थानों के इंचार्ज भी सवर्ण। अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा में किस मानसिकता से काम होता है। भाजपा में कभी इस बात की जागरूकता नही रही कि जिससे इसके समर्थक यह समझ सकें कि विविधिता वाले समाज की व्यवस्था में सर्वप्रतिनिधित्व की जरूरत होती है जिसे वर्ण व्यवस्था में दरकिनार किये जाने के बहुत बुरे परिणाम यह देश भोग चुका है। सहारनपुर के जातीय दंगों में भी गलत मानसिकता के चलते ही प्रशासन ने एकतरफा भूमिका निभाई।

दूसरी ओर मोदी बाबा साहब के नाम का जाप तो करते रहे लेकिन उनकी हिम्मत यह नही थी कि वे समाज की परंपरागत व्यवस्था के बारे में लोगों की विकृत मानसिकता बदलने के लिए किसी साफगोई का साहस दिखा सकें। जिससे सवर्णों के मन में सदियों तक वंचितों के साथ किये गये भेदभाव और अन्याय को लेकर प्रायश्चित की भावना जागृत हो पाती। इसे लेकर शिकायतें और आपत्तियां भी उमड़-घुमड़ रहीं थीं जिसे भाजपा विरोधी नेताओं का दुष्प्रेरण कहकर अनदेखा नही किया जा सकता। खुद भाजपा के वंचित समाज के नेता पार्टी की इस रीति-नीति से खिन्न थे। जिसका इजहार पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की जयंती के सिलसिले में आयोजित कार्यक्रम में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने अपने भाषण में किया। वे यह कहने से नही चूंके कि व्यवस्था के शीर्ष संस्थानों में तो दलित और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व शून्य था ही अब तो थानाध्यक्ष स्तर तक उनकी भागीदारी को न्यूनतम किया जा रहा है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत का दो वर्ष पहले अंबेडकर जयंती समारोह के दौरान दिया गया भाषण भी उद्धृत करने योग्य है। अगर बाबा साहब के विचारों के अनुरूप भाजपा शासन में व्यवस्था बदल रही होती तो उन्हें इस दौर में यह कहने की जरूरत क्यों पड़ती कि अनुसूचित जाति के लोग जिस तालाब में उसे खोदते समय पेशाब तक कर देते हैं बाद में उसका पानी उन्हीं को नही पीने दिया जाता। वे जिस मूर्ति को तराशते हैं मंदिर में रखी जाने के बाद उसी के दर्शनों से दलितों को महरूम कर दिया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लोकतांत्रिक राजनीति में सर्वोपरिता के लिए रणनीति के तहत दलितों के प्रति हमदर्दी का वातावरण बनाने की कोशिश तो की लेकिन उनकों अधिकार संपन्न बनाने की बाबा साहब की मंशा के अनुरूप कार्य करना संघ को वर्ण व्यवस्थावादी सोच की वजह से कैसे गंवारा हो सकता था। बाबा साहब ने कहा था कि दलितों को दया नही चाहिए उन्हें अन्य कौमों की तरह ही आत्म निर्णय का अधिकार चाहिए। यह बात समूचे शूद्र समाज के लिए है। इसके दृष्टिगत व्यवस्था के सर्व समावेशी स्वरूप को सामने लाने का प्रयास होना चाहिए था। यह संयोग मात्र नही है कि भाजपा के केंद्र और राज्य के मत्रिमण्डलों में दलित और पिछड़ों को अहम पदों से दूर रखा गया है।

लेकिन मजबूरी यह है कि लोकतंत्र की राजनीति के तकाजे यह कहते हैं कि जिसकी जितनी संख्या भारी होगी। उसकी सत्ता में उतनी ही वजनदारी होगी। इस सूत्र को भुलाकर कल्याण सिंह को अपमानित करके भाजपा ने जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया था तो पिछड़े उससे विमुख हो गये थे। दलित और मुसलमान उससे वैसे भी दूर थे। नतीजा यह रहा कि सवर्ण समर्थन का झुनझुना बजाकर भाजपा उत्तर प्रदेश में किसी लायक नही रही। वह मुख्य विपक्षी दल के दर्जे तक से बहुत पीछे चली गई और मोदी युग की शुरूआत तक हर चुनाव में उसकी यही दुर्दशा होती रही।

इसलिए सवर्ण राज का सपना देखने में मदहोश भाजपा को लोक सभा चुनाव की रणभेरी बनजे के साथ ही जागकर उठ जाना पड़ा है। अचानक पार्टी के नेतृत्व से दलित और पिछड़ों के तुष्टीकरण के तीर निकलने लगे हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में गिरफ्तारी के प्रावधान की बहाली के लिए मोदी सरकार ने संसद में बिल पेश कर दिया है। पिछड़ा वर्ग आयोग को सवैधानिक दर्जा देने की पहल हो गई है। प्रमोशन में दलितों के आरक्षण के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाकर प्रभावी पैरवी की है। अब सवर्ण भाजपा के नेतृत्व से कह रहे हैं कि मेरी बिल्ली मुझे से म्याऊं और भाजपा का नेतृत्व उनकी कोसना सुनकर भी अनसुना कर रहा है।

भाजपा कपटाचार की अपनी ही राजनीति में उलझ गई है। वह पहले यह भ्रम पैदा किये हुए थी कि उसकी सत्ता नही है। वरना एक मिनट में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला संविधान का अनुच्छेद 370 छूमंतर हो जायेगा। उसने यह भी प्रतीत करा रखी थी कि उसकी सत्ता आ जाये तो आतंकवाद को बढ़ावा देना न बंद करने पर पाकिस्तान का अस्तित्व मिटा दिया जायेगा। यह भरोसा भी दिला रखा था कि अगर उसे जनता सत्ता सौंप दे ंतो अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई इंतजार नही करना होगा। पर यथार्थ यह था कि कोई सरकार हो यह सारे मामले इतने जटिल और चुनौतीपूर्ण हैं कि आसानी से नही निपटा सकती। पूर्व की सरकारें इसीलिए इन मुददों को टालती रहीं और देश में चक्रवर्ती शासन के बाद भी भाजपा को भी यही करना पड़ रहा है। इसी तरह इतिहास में हुए अन्याय की क्षतिपूर्ति वंचितों को देने की बाध्यता पिछली सरकारों के सामने भी थी और इस सरकार के सामने भी है। स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व पर आधारित सरकारों की व्यवस्था सार्वभौम तकाजा है। जिसके कारण न पिछली सरकारें वर्ण व्यवस्था को बहाल कर सकती थीं और न ही यह सरकार कर सकती है।

होना यह चाहिए कि इस मामले में जागरूकता का ऐसा अभियान चले जिससे सारे वांछनीय परिवर्तन सदभाव के माहौल में संपादित कराये जा सकें। उदाहरण के तौर पर सवर्णों के बीच यह भ्रांति है कि उनके बच्चों के लिए नौकरी सहित सरकार के सारे अवसर समाप्त हो गये हैं क्योंकि सरकार ने आरक्षण के जरिये इनको दलितों और पिछड़ों के हवाले कर दिया है। पर अगर आंकड़े आ जायें तो आनुपातिक तौर पर सवर्ण अभी भी चाहे नौकरियां हो  या दूसरे रोजगार के अवसर दलितों और पिछड़ों से बहुत आगे हैं। सवर्णों की आबादी देख ली जाये और इसके बाद यह देखा जाये कि कितने सवर्ण सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में हैं। इसके बाद यही सर्वें दलितों के बीच से एकत्र किया जाये तो पता चलेगा कि आज भी दलित सवर्णों के सामने कुछ नही हैं। उपभोक्ता क्रांति, बाजार के विकास और दलितों व पिछड़ों में व्यापक मध्य वर्ग के अस्तित्व में आने के बाद कारपोरेट दुनियां का तेजी से विस्तार हुआ है। जिसकी सारी नौकरियां और रोजगार के अवसर सवर्णों के हत्थे लगे हैं। यह केवल फोबिया है कि सवर्णों का रोजगार बहुत घट गया है। कोई भी वर्ग हो उसमें सभी लोगों को रोजगार देने और उसके हर आदमी की गरीबी दूर कर देने में कोई सरकार कामयाब नही हो सकती। इसलिए सवर्णों में भी गरीब होगें लेकिन आनुपातिक तौर पर देखें कि उनकी जनसंख्या के अनुपात में सवर्ण कितने गरीब हैं और दलितों में उनकी जनसंख्या के सापेक्ष गरीबों की संख्या कितनी है। आज भी दलित अगर व्यापक रूप से गरीब और वंचित न होते तो बीपीएल सूची में उन्हीं की आबादी न छाई होती। बहरहाल एक ओर भाजपा नेतृत्व के सामने दलितों और पिछड़ों के तुष्टीकरण की चुनौती है तो दूसरी ओर सवर्णों को साधे रखने की भी। दोनों पलड़े भाजपा कैसे साधेगी यह उसके राजनैतिक कौशल की बहुत बड़ी परीक्षा है।


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