बहिन जी! बुंदेलखंड में अपनों से ही बसपा नेताओं का बेगानापन, भाजपा के पैतरों को दे रहा मजबूती

By: jhansitimes.com
May 02 2018 12:11 pm
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अंकित चौधरी की रिपोर्ट- झाँसी। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का दलित प्रेम जगजाहिर है। मंत्री, संतरी और राजनेता सभी अपना घर छोड़ दलितों के घरों में भोजन करने पर उतारू हैं। वहीं दलितों के वोट बैंक को अपना परंपरागत वोट मानने वाली बहुजन समाज पार्टी के बुंदेलखंड और मंडल स्तर के नेता इन्हीं दलितों और गरीबों से मिलना तक गंवारा नहीं कर रहे हैं। जबकि बसपा मुखिया मायावती दिन-रात मेहनत कर रहीं हैं|   ऐसे में भाजपा का दलित प्रेम कहीं बसपा पर भारी न पड़ जाए। 

गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से शुरु हुई दलित प्रेम की कहानी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बाद अब उनके मंत्रियों और विधायकों के साथ-साथ नेताओं तक जा पहुंची है। सभी गांव में एक अच्छा सा दलित परिवार तलाशते हैं और रात में उसके यहां खाने-पीने का इंतजाम कराते हैं। इसके बाद होता है इस भोज का आयोजन। जिसका जमकर प्रचार-प्रसार किया जाता है। यह सब दलितों के करीब जाने और उनके वोट को भ्रमित कर भाजपा के पाले में लाने की कवायद मात्र है। यह सभी जानते हैं। झाँसी जनपद के प्रभारी मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह और बबीना विधायक राजीव सिंह पारीछा ने अपने साथियों के साथ बड़ागांव ब्लाक के ग्राम गढ़मऊ में रहने वाले एक दलित ग्रामीण के यहां भोजन किया। विधायक ने यहां ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और भाजपा को दलितों का सच्चा हितैषी बताया।

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वहीं पार्टी स्थापना से लगातार दलितों- पिछड़ों और गरीबों की राजनीति कर रही बसपा के कोर्डिनेटर कहे जाने वाले नेता अपने गरीब कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए हैं। कभी इनके नेता कांशीराम और मायावती के अलावा अन्य नेता दलितों के यहां बैठकर, रात बिताकर उनकी समस्याएं सुनते थे और वहीं चटनी रोटी के साथ भोजन करते थे। दलितों को भी लगता था कि यही पार्टी उनके लिए अधिकारों और अस्तित्व के लिए महफूज है। लेकिन समय बदला और पार्टी हाईटेक हो गई। देखते ही देखते मिशनरी कार्यकर्ताओं को पीछे छोड़ नए नेताओं की फौज सामने आ गई। इन नए नेताओं को बहन जी ने भी तवज्जो दी और लोकसभा, मंडल, जोन एवं जिला का कोआर्डिनेटर बना दिया। इन नेताओं की हालत ऐसी है, जो राजा तो बन गए, मगर प्रजा और समर्थक उनके साथ नहीं है। 

कार्यकर्ता इन नेताओं से मिलने का तरसते हैं। अपनी समस्याओं को बताने के लिए तरसते हैं। और तो और, ये नेता उनके फोन तक नहीं उठाते। हां, पैसे वाली पार्टी हुई कोई तो यही नेता उसके आगे-पीछे घूमते नजर आते हैं। ऐसे में यदि दलित बसपा की मूलधारा से भटककर अन्य दलकी ओर झुक गया तो फिर आगामी चुनावों में बसपा का क्या हश्र होगा? यह तो वही जाने, मगर जो भी परिणाम सामने आएंगे, वह अच्छे नहीं होंगे।


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