मायावती का सपना चकनाचूर कर रहे, बुंदेलखंड में बसपा की बागडोर संभाल रहे ये पदाधिकारी

By: jhansitimes.com
Jun 11 2018 09:26 am
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झाँसी,| बुंदेलखंड की बसपा इकाई के सामने एक कठिन प्रश्न है कि क्या बसपा गुटबाजी को भूलकर कभी एकजुट हो पाएगी? फिलहाल इसका जवाब 'न' में ही मिलता, लेकिन अब जिला स्तर पर रोजाना की बैठकों के जरिए आपसी समन्वय और एकजुट करने की बातें हो रही हैं, जो नए सवाल पैदा करते हैं। अगर बसपा के मिशनरी कार्यकर्ता, बफादार वोटबैंक  और बुंदेलखंड के बड़े नेताओं में इतना समन्वय होता तो पार्टी का विगत चनावों में यह हाल ही क्यों होता!

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बुंदेलखंड में बसपा पहले लोकसभा से बाहर हुई फिर विधानसभा चुनाव 2017 से , उसके बाद भी बसपा में बैठे राष्ट्रीय आलाकमान को लगता है कि कई बड़े नेताओं को जिम्मेदारी सौंपने से बुंदेलखंड में पार्टी की हालत सुधर जाएगी, मगर इसकी गुंजाइश कम ही नजर आती है। पार्टी के भीतर समन्वय की कोशिश कहीं और खाई पैदा न कर दे, इसका खतरा जरूर मंडरा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, " पूर्व नेता प्रतिपक्ष और मुख्य जॉन इंचार्ज बुंदेलखंड गयाचरण दिनकर कैडर कैम्प के माध्यम से बसपा के नेताओं को एकजुट करने में सफल रहे तो यह ऐतिहासिक होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो पार्टी को 2019 में फिर से नुकसान होना तय है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बसपा में जिला स्तर पर एक-एक दिन की बैठकों से  मिशनरी कार्यकर्ताओं और वफादार वोटबैंक की उपेक्षा के बाद आपसी समन्वय हो पाएगा?"

2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, चुनाव के लिए बमुश्किल एक वर्ष का ही वक्त बचा है। इसके बावजूद बसपा में गुटबाजी अभी भी है। यह बात जुदा है कि गुटबाजी खुलकर सामने नहीं आ रही है। पार्टी में लालाराम अहिरवार अपने अनमोल रत्नों के साथ अपना प्रभाव दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाया होने दे रहे हैं। इससे पार्टी में क्या संदेश जा रहा है, इसकी उन्हें परवाह भी नहीं है।

बसपा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, क्योंकि उन्होंने बुंदेलखंड के जॉन इंचार्ज लालाराम अहिरवार और उनके अनमोल रत्नों के सामने कुछ मुद्दों पर अपनी अलग राय जाहिर की थी। ये सभी निष्काषित पार्टी के वफादार समर्थक माने जाते हैं। इस पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने लामबंदी कर लालाराम अहिरवार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मन बना चुके हैं। 

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यह घटनाक्रम अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि पूर्व महानगर अध्यक्ष आनंद साहू को जिला जॉन इंचार्ज बनाए जाने पर नाराजगी के स्वर पिछली बैठक में उठे, क्योंकि आरोप है कि उक्त पदाधिकारीपार्टी के वफादार वोटबैंक के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं ।

राजनीति के जानकारों की मानें तो बसपा कार्यकर्ता अभी 2017 विधानसभा चुनाव और 2014 लोकसभा चुनाव की करारी हार अभी भूले नहीं हैं। दूसरी तरफ , भाजपा भी इस कोशिश में है कि बुंदेलखंड प्रभारी लालाराम अहिरवार के द्वारा हो रही कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के मुद्दे को ज्यादा प्रचारित किया जाए, जिससे लोगों में बसपा के खिलाफ आक्रोश जगाया जाए, ताकि बसपा को लाभ न मिले। 

बसपा में गहरी दखल रखने वाले एक जानकार का कहना है कि देश में भाजपा के खिलाफ माहौल है, जनता सत्ता में बदलाव चाहती है, मगर बसपा के बुंदेलखंड की बागडोर संभाल रहे कई वर्तमान पदाधिकारी ही नहीं चाहते कि बसपा को सत्ता हासिल हो। यही कारण है कि चुनाव से पहले पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को पार्टी से निष्कासन किया जाए, जो बसपा की सत्ता से दूरी और बढ़ा दे।


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