अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष: शालिनी, लक्ष्मी और संजना ने महिलाओं की बेरंग जिंदगी में भरे

By: jhansitimes.com
Mar 08 2018 11:51 am
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(न्यूज एडिटर मदन यादव की विशेष रिपोर्ट) झाँसी। नारी शब्द एक और रूप अनेक। जी हां, नारी  माँ, बहन, बेटी, दोस्त, पत्नी और प्रेमिका आदि कई रूपों में हमारे जीवन में शुरू से अंत तक शामिल रहती है। कुछ रूपों में वह सौम्यता, करुणा, त्याग और प्रेम का प्रतीक होती है, तो वहीं कहीं-कहीं उसका रौद्र रूप भी देखने को मिलता है, जिसके लिए कभी पुरुष तो कभी वह स्वयं भी जिम्मेदार होती है। हालांकि ज्यादातर पुरानी सामंती व्यवस्था और पुरुष ही श्रेष्ठ है, के अहम् के चलते अनेक पुरुष आज भी औरतों को पैरों की जूती जैसी घटिया सोच के साथ उसे घर की चाहरदीवारी और घूंघट, बुर्के में ही देखने के पक्षधर होते हैं। सारी छूट, मनमानी और उच्चश्रृंखल व्यवहार उन्हें बस अपने लिए ही जायज लगता है। 

"गृहिणी बड़ा ही मामूली सा शब्द, पर इसका अर्थ बहुत है गहरा है,

सारा गृह है जिसका  ऋणी, उसी को कहते हैं गृहिणी"

इसके विपरीत नारी की आजादी, उसके मन और शरीर पर उसके अपने निर्णय को मानने वाले पुरुषों की संख्या भी अब कम नहीं रही है। यहां यह कहना उचित  होगा कि नारी को घर के कुएं, दुपट्टे, ओढऩी से बाहर निकालकर उसे आकाश की ऊंचाई तक ले जाकर उसके सशक्तिकरण की मुहिम में अनेक पुरुषों की भागीदारी आज निरंतर बढ़ रही है। इसके विपरीत विडम्बना यह भी देखने को मिल जाती है कि अक्सर नारी ऐसे पुरुषों के सहयोग को याद रखने या मानने से ही इंकार ही कर देती है और थोड़ा सशक्त होते ही उच्चश्रृंखल होकर अलगाव की राह पर चल देती है। मेरे ख्याल से जो पुरुष स्त्री के लिए अपनी घटिया मानसिकता और पुरातन सोच बदलकर उसे नित प्रति एक नया आसमान मुहैया कराने या एक नया और मजबूत रास्ता बनाने को जुटे रहते हैं, उनको सम्मान या उनकी पहल को तवज्जो देना भी नारी का कर्तव्य होना चाहिए। जिससे और लोग भी प्रेरित हो सकें। बेशक यही अपेक्षा हम पुरुषों से भी कर सकते हैं। कल नारी के साथ ये अन्याय होता था, वो जुल्म होता था, जैसी बातों को हर वक्त तूल देने की बजाय यदि हम उन्हें भुलाकर वर्तमान में जीना शुरू कर दें तो निश्चय ही सभी का सम्मान बना रहेगा और किसी को अनहोनी स्थिति से गुजरने को भी मजबूर न होना होगा। नाजुक संबंधों के साथ नाजुक व्यवहार की एक अलग अहमियत और जरूरत है। 

शालिनी ने गरीब की लड़कियों को शिक्षा के साथ दिलाई सुरक्षा

लोग इस बात को भले ही साधारण तौर पर लें कि महिलाएं परिवार की देखभाल के साथ समाजसेवा का कार्य भी कर सकती हैं, लेकिन हकीकत यहीं है कि वर्तमान में महिला सशक्तिकरण की वाहक यह महिलाएं ही हैंं। इनके सेवाकार्यों को देखकर जो लोग इन पर उंगली उठाते हैं, ऐसे लोग इस कार्य में सहयोग करके देखें तो कार्य में आने वाली वह परेशानी समझ आएगी, जिनसे जूझना अब इनकी आदत सी हो गई है। ऐसा ही एक नाम है व्यापारी अशोक गुरबख्शानी की पत्नी श्रीमती शालिनी गुरबख्शानी का भी। इन्होंने समाजसेवा की शुरुआत अपने घर से की। वह बताती हैं कि उनके घर में एक बुजुर्ग काम करते थे, जिनके चार बच्चे थे। वह काम पर आते तो चारों बच्चों को साथ लेकर आते, जिसके लिए उनको मना किया जाता था। पर एक दिन जब उन्होंने अपनी परेशानी बताई कि दो लडक़े हैं, जो खेलते रहते हैं। साथ में दो बेटियां भी हैं, जिनके साथ उनके घर के पास रहने वाले कुछ शरारती तत्व छेडख़ानी करते हैं। ऐसे में श्रीमती गुरबख्शानी द्वारा कई जगह प्रयास किए गए, लेकिन उन बच्चियों के लिए कोई मदद नहीं मिल पाई। इस दौरान वह कुछ समाजसेवी संगठनों से जुड़ीं और उनके साथ मिलकर प्रयास किया। साथ ही उस समय जिला प्रोबेशन अधिकारी से मिलकर बच्चियों की मदद के लिए संभावनाएं तलाशी। परिणाम सकारात्मक निकला और दोनों बच्चियां  एक अनाथालय में रह रहीं हैं औैर एक अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं।  उनके पिता जब चाहे उनसे मिलने जाते रहते हैं और उनको त्यौहार व विशेष मौकों पर घर लाते रहते हैं। आज श्रीमती गुरुबख्शानी व्यापार मंडल की नगरअध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि  वह किसी को भीख नहीं देती है। वह उसको आजीविका के साधन उपलब्ध कराने में मदद करती हैं, ताकि उसके परिवार में दो वक्त का चूल्हा जलता रहे। इसके अलावा वह सांझा परिवार नामक संगठन से भी जुड़ी हुई हैं, जिससे वह समाजसेवा के अलावा सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहती हैं। इस समाज सेवा में उनके पति और परिवार के अन्य सदस्य भी सहयोग करते हैं, जिनकी बदौलत वे आज समाज में अपना खासा मुकाम बना चुकी हैं। 

लक्ष्मी ने एकता का मंत्र फंूक दिया महिलाओं को रोजगार

झांसी में ललितपुर राजमार्ग पर स्थित छोटे से गांव हंसारी जो कि अब नगर में शामिल हो चुका है, की रहने वाली लक्ष्मी देवी गोस्वामी एक मध्यम वर्गीय परिवार की सदस्या हैं। उनका शुरू से ही सोचना था कि वे अपने गांव व आसपास की ऐसी महिलाओं को एकजुट कर उन्हें रोजगार दिलाएंगी, जो अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का शिकार हैं। जो ऐसे माहौल में पली-बढ़ी हुई , जिन्हें समाज में महिलाओं के आगे आने पर इस पुरुष प्रधान समाज में केवल और केवल तिरस्कार झेलना पड़ता है। लक्ष्मी गोस्वामी का कहना है कि जब तक महिलाएं अशिक्षित रहेगी। उनका शोषण होता रहेगा। इसी कारण ये गाँव की महिलाओं को शिक्षा देने में जुट गई। इन्होंने महिलाओं को पढ़ाने के साथ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम भी करने की योजना बनाई। उन्होंने बताया कि कुछ महिलाओं को काम करके चार पैसे कमाने में ज्यादा रूचि है। इसलिाए  लक्ष्मी ने महिलाओं को तरह-तरह के अचार, मुरब्बा, पापड़ इत्यादि बनाने का काम शुरू कराया। एक समूह बनाया और सभी महिलाओं को उसमें शामिल कर इस छोटे से लघु उद्योग को शुरू किया। इससे होने वाली आय को वे सभी आपस में बांट लेती हैं। इससे अभी तक ये असहाय महिलाएं सादा जीवन जी रही थीं, अब उनके पास खुद का रोजगार है और वे अपने व परिवार के खर्चे के लिए पतियों की ओर आशा भरी नजरों से नहीं देखतीं, बल्कि जरूरत पडऩे पर वे उनकी मदद भी करती हैं। उनहें अच्छा लगता है अपने परिवार में आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने पर। लक्ष्मी बताती हैं कि इन सबसे भी बढ़ी बात यह है कि इन महिलाओं का अब परिवार में उस तरह का शोषण नहीं होता, जो पहले उन्होंने झेला है। लक्ष्मी को भी अपने सपने का साकार होते देख बेहद खुश होती है और वे ऐसी अन्य महिलाओं को भी आर्थिक रूप से सुदृढ़ और शिक्षित कर समाज में उनका सम्मान बढ़ाना चाहती हैं। 

संजना ने भी महिलाओं के उद्धार को किया यह काम

व्यापारी नेता संजय पटवारी की पत्नी श्रीमती संजना पटवारी महिला दिवस पर देश की आधी आबादी अर्थात महिलाओं को नमन करते हुए बताती हैं कि नारी है तो देश है। जब तक नारी का सम्मान नहीं होगा जब तक यह देश विश्व गुरु नहीं बन पाएगा। वह बताती हैं कि जब भी कोई गरीब कन्या की शादी की बात मुझे मालूम हुई, मैने बढ़चढक़र उनकी मदद की। ऐसे कई मामले हैं, जिन्हें वे बताने में झिझकती हैं और कहती हैं कि उनके नाम बताकर मैं उनके सम्मान को कम करना नहीं चाहती। संजना ने नारी सशक्तिकरण के लिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए छोटे-छोटे रोजगार के साधन उपलब्ध कराए तो अशिक्षित महिलाओं को मलिन बस्तियों में पहुंचकर पढ़ाया भी। इसके साथ ही वे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान में बढ़चढ़ कर सहयोग करने में खुद को गौरवांवित महसूस करती हैं। वे समर्पण सेवा समिति एवं महिला व्यापार मंडल के माध्यम से महिलाओं के लिए अनेकों जनकल्याणकारी कार्यों को अंजाम तक पहुंचाने में जुटी हैं। 


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