जिंदगी की आपाधापी में परिवार का बदल रहा स्वरुप...!

By: jhansitimes.com
Jun 09 2019 02:35 pm
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 दोस्तों आज बदलते और भागदौड़ भरे समय में हमारी जरुरतें और महत्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं कि उनकी पूर्ति करने के लिए हम कुछ भी करने से गुरेज नहीं करते हैं।जबकि जिस प्रकार पहले हमारे देश में संयुक्त परिवार हुआ करता अब  नहीं देखने को मिलता फिर भी।अब तो परिवार में सदस्यों की संख्या कम होती जा रही है,लेकिन जरुरतें इतनी अधिक हो गई हैं कि उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आज का हमारा समाज किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार नजर आता है...! अक्सर हम पहले देखते थे कि एक परिवार में तकरीबन लोगों की संख्या 15 से 25 या फिर इससे अधिक होती थी । लेकिन समय और जरुरतों के लिहाज से अब ये संख्या सिमटकर 7 से 8 होकर रह गयी है।

दरअसल समय के हिसाब से हमारी सोच इस कदर बदल गई है कि जिस परिवार में लोग अपनी बच्चियों का विवाह करना चाहते हैं,वो उस परिवार में सदस्यों की संख्या कम से कम चाहते हैं।ऐसा कहा जाए कि आज परिवार की परिभाषा मेरी पत्नी, मेरे दो बच्चे और मैं तक सिमट कर रह गई है तो गलत नहीं होगा(कुछ हद तक)।आप कह सकते हैं कि परिवार के सिमटते दायरे से माता-पिता,और भाई-बहनों के साथ ही अन्य सगे-संबंधी अलग होते जा रहे हैं।

अक्सर आप ऐसा सुन सकते हैं कि देश की आबादी ज्यादा बढ़ गयी है,जिसका कम होना जरुरी है और छोटे परिवार की धारणा ही देश को बढ़ती जनसंख्या से निजात दिला सकता है। काफी हद तक ये बात सही भी है कि जनसंख्या के विस्तार पर लगाम लगाने के लिए छोटे परिवार की अवधारणा सही हो सकती है,क्योंकि शिक्षा और सुविधा के समुचित विकास के लिए परिवार की संख्या कम होनी चाहिए..लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि बुद्धीजिवि समाज के लोग अपनी हर बात की व्याख्या अपनी सुविधा और इच्छानुसार कर ही लेते हैं।शायद यही वजह है कि छोटे परिवार के लिए अलग एलग तर्क दिए जाने लगे हैं।

ऐसे में आप कह सकते हैं जिस प्रकार से समय के साथ आगे बढ़ते हुए परिवार का स्वरुप छोटा होता जा रहा है उससे कुछ लाभ तो मिल सकता है,कुछ अच्छाईंया भी होंगी ऐसे बढते परिवार में,लेकिन विकसित समाज, आदर्श और सभ्यता-संस्कृति को विस्तार देने के लिए हम संयुक्त परिवार की अवधारणा को तिलांजलि नहीं दे सकते। आज आप शहरों में देखिए कि किस तरह छोटे-छोटे घरों में लोग रहने को मजबूर हैं। यहां तो खुद उनके लिए ही पर्याप्त जगह नहीं है, फिर औरों की बात भला कहां आती है! संयुक्त परिवार और बड़े परिवार की बात तो आप जाने ही दीजिए, आज एक परिवार में यदि माता-पिता और उनके दो बड़े बच्चे उनके साथ रहते हैं तो उनमें भी अनबन होती रहती है। वे एक-दूसरे के प्रति कोप और तनाव से भरे रहते हैं।

अंतत: हमारी जरुरतें लगातार बढ़ती जा रही हैं,क्योंकि हमारे सपने तब की अपेक्षा अब ज्यादा सप्तरंगी हो गए हैं,जिस कारण परिवार की अवधारणा बदलती जा रही है,संबंधों को विस्तार देने के लिए,समेटकर रखने के लिए हमारे पास वक्त और संसाधनो की कमी होती जा रही है।खैर विकास की राह पर निरंतर बढ़ना जरुरी तो है,सपनों को साकार करने लिए अरमानो के पंख भी लगने चाहिए,लेकिन संबंधो की दहलीज पर कदम रखकर आगे बढ़ कर नहीं।क्योंकि संबंध ही तो सनातन संस्कृति और भारत की पहचान है। संदीप कुमार मिश्र की कलम से :


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