भाजपा में दलितों का दिल जीतने की कवायद

By: jhansitimes.com
Apr 19 2018 07:27 pm
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 (EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH ) दलितों को उपेक्षित करके उन्हें हैसियत में रहने का सबक पढ़ाते-पढ़ाते उत्तर प्रदेश सरकार अब उनका दिल जीतने के जतन में लग गई है। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष के रूप में रिटायर आईपीएस बृजलाल की नियुक्ति और अंबेडकर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल को अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम का अध्यक्ष बनाने का जो कदम उठाया गया है उसके निहितार्थ समझे जाने चाहिए। देश और प्रदेश में लगातार ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिससे दलित भाजपा से कुपित हैं। इससे भारी राजनैतिक नुकसान का अंदाजा भी अब भाजपा नेतृत्व को डराने लगा है इसलिए भाजपा में खलबली मची हुई है। डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के भी पेंच कसे हैं। संभावना है कि उक्त दोनों नियुक्तियों के अलावा उत्तर प्रदेश में दलितों के लिए अभी कुछ और सकारात्मक फैसले किये जायेगें। केंद्रीय स्तर पर पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को बहाल करने के लिए अध्यादेश लाने का एलान भी रामविलास पासवान के माध्यम से हो चुका है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर खुलेआम यह जाहिर करने की कोशिश की है कि उनके प्रधानमंत्री बन पाने में न किसी संघ प्रमुख का एहसान है और न श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को इसका कोई श्रेय है। संघ और भाजपा की परंपरागत विचारधारा अटल बिहारी बाजपेयी के बाद लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह आदि पर ही जाकर अटकती उन तक पहुंचने का सवाल ही नही था क्योंकि सर्वोच्च कार्यकारी पद देने के मामले में उस विचार धारा का दायरा तय है। लेकिन लोकतंत्र वर्ण व्यवस्था से नही चलता। भाजपा को अब समझमें आया है कि लोकतंत्र में पार्टी के अस्तित्व के लिए बहुजन की भावनाओं के अनुरूप अपने को ढालना होगा। वह पुराना जमाना था जब उत्तर प्रदेश में इस बाध्यता को नजर अंदाज कर दिया गया था और कल्याण सिंह को हटाकर जातिगत कुलीनता के आधार पर मुख्यमंत्री बिठाने की कोशिश की गई थी। इसके तहत रामप्रकाश गुप्ता और उनके बाद राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाकर भक्ति काल को दोहराने के प्रयास में यह पार्टी सफल नही हो पाई। इसके चलते यह हुआ कि भाजपा के खिलाफ बहुजन इस कदर भड़क गया कि पार्टी लंबे समय के लिए उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबले से ही बाहर हो गई।

उधर भाजपा हिंदुत्व की रट लगाकर और मजबूत चेहरों को सामने रखकर भी केंद्र में स्पष्ट बहुमत का लक्ष्य हासिल नही कर पा रही थी। जिसकी नितांत आवश्यकता उसे अपने मौलिक एजेंडे को लागू कर पाने के लिए थी। (हालांकि यह एजेंडा तो अपने दम पर सरकार बनाने के बाद भी भाजपा अभी तक लागू नही कर पाई है।) चुनावी दौड़ में अपनी सीमा के पीछे भाजपा के रणनीतिकारों के सामने एक ही निष्कर्ष उभर कर सामने आया कि इस दौर में जब बहुजन को नेतृत्व का चस्का लग चुका है तो जब तक इस मामले में उसकी इच्छापूर्ति नही की जायेगी तब तक उसकी योजनाएं कारगर नही हो पायेगीं।

पहले सामाजिक परिदृश्य के समानांतर जो राजनैतिक परिदृश्य था उस पर एक निगाह डाल लें। संघ और भाजपा में सोशल इंजीनियरिंग का नारा सबसे पहले गोविंदाचार्य ने दिया था। आज वह नारा गुल खिला रहा है। लेकिन गोविंदाचार्य इतिहास के कूड़ेदान में फेकें जा चुके हैं। गो कि उन्होंने समय से पहले यह बात कर दी थी। बतर्ज लोहिया लोग उनकी बात सुनेगें लेकिन उनके मरने के बाद। गोविंदाचार्य अभी जीवित है और कामना है कि दीर्घायु हों पर उनके साथ लोहिया जी की यही कहावत चरितार्थ हुई। उस समय संघ और भाजपा में वर्ण व्यवस्थावादी दृष्टिकोण हावी था इसलिए गोविंदाचार्य की ‘हरकत’ संघ और भाजपा के महंतों को रास नही आई और उनकों निर्वासन में धकेल दिया गया। लेकिन सच्चाई तो सच्चाई है। बाबा साहब और महात्मा गांधी में वर्ण व्यवस्था को लेकर बहुत तीखा शास्त्रार्थ होता रहा था। गांधी जी वर्ण व्यवस्था में ही दलितों की बेहतरीय की संभावनाएं तलाशने के पक्ष में थे लेकिन बाबा साहब का कहना था कि दलितों को स्वयं को करुणा की वस्तु के रूप में देखा जाना स्वीकार्य नही है। उन्हें आत्म निर्णय का अधिकार चाहिए जिसमें नेतृत्व का अधिकारी भी शामिल है। अटल जी ने जब भारतीय जनता पार्टी का गठन किया था तो उन्होंने पहले चुनाव में पार्टी की ओर से जगजीवन राम को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का फैसला लिया था। पर भाजपा सत्ता को लेकर जिस माडल में विश्वास करती थी उसमें यह दुस्साहस स्वीकार्य नही हो सकता था। इसलिए 1980 के चुनाव में भाजपा की भद पिट गई।

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राजीव गांधी ने सबसे पहले सार्थक अंबेडकरवादी पहल की जब उन्होंने स्थानीय निकाय और पंचायती राज में जाति के आधार पर आरक्षण के फार्मूले को लागू कर दिया। इससे जमीनी स्तर पर दलितों और अन्य पिछड़ों में नेतृत्व के गुण और महत्वाकांक्षाऐं पनपना शुरू हुईं। बाबा साहब के आत्म निर्णय के दर्शन की सार्थकता को इस कदम से एक नया आयाम मिला। उनके बाद वीपी सिंह आये उन्होंने बाबा साहब को मरणोपरांत भारत रत्न दिया। क्योंकि उन्हें भारत के नव निर्माण में बाबा साहब की विचारधारा का महत्व समझमें आ गया था। अंबेडकरवाद इसके बाद देश की राजनीति के केंद्र में आ गया। दूसरा धमाका उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के जरिये किया। इसका प्रभाव जैसे-जैसे प्रकट हुआ हासिये पर रहे तबकों के उत्थान और महत्वाकांक्षा को तेज अग्रसरता मिली। इसलिए मोदी आज अगर प्रधानमंत्री बन पाये हैं तो बाबा साहब, राजीव गांधी, वीपी सिंह और गोविंदाचार्य के बीजारोपण की बदौलत हालांकि उनकी मजबूरी है कि वे बाबा साहब का नाम तो ले सकते हैं पर राजीव गांधी, वीपी सिंह और गोविंदाचार्य का नही।

इस दृष्टि से देखे तो परिस्थितियां कितनी बदल चुकी हैं लेकिन संघ और भाजपा में अभी भी रूढ़िवादियों का बोलबाला है जो बदलते जमाने की तस्वीर को नही देख पा रहे। उन्हें शूद्रों को आत्म निर्णय का अधिकार स्वीकार्य नही है। उन्हें शूद्रों में दास और भक्ति भाव का स्वरूप ही सुहाता है। इस माइंड सैट के कारण भाजपा में जानबूझकर दलितों में वे नेता उभारे जाते हैं जिनकी जुबान नही होती। चुनावी जरूरतों के लिए भाजपा ने रामविलास पासवान, उदित राज और कौशल किशोर जैसे दलित नेताओं का सहारा जरूर ले लिया था लेकिन सुग्रीव की बजाय बालि परंपरा के दलित नेताओं के प्रति सतर्कता की वजह से उसने इनकों हाशिये पर ही रखा गया। दलितों के साथ आस्था के नाम पर अत्याचार की नई श्रंखला इस दौर में शुरू की गई। जिसको लेकर खुला विद्रोह तत्काल इसी कारण नही हुआ क्योंकि भाजपा में मुखर नेताओं को काबू में रखने का मजबूत बंदोबस्त था। उत्तर प्रदेश में अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग में वर्ण व्यवस्थावादी चश्में की वजह से दलितों और ओबीसी को उपेक्षित कर दिया गया। नेता वह होता है जो लोगों से अपना अनुसरण करवा सकता हो। भीड़ के सामने समर्पण करके चलने वाला असली नेता नही हो सकता। मोदी में वास्तविक नेता के गुण मौजूद है लेकिन इसके बावजूद शुरू में पार्टी में अपने ज्यादा बिगाड़ से बचने के लिए वे रूढ़वादियों की मूढ़ताओं को सहते रहे। उनकी अगुवाई में हिंदुत्व की ऐसी छतरी तैयार हुई जिसके नीचे दलित भी सहर्ष आ जुटे थे। यह सुनियोजित ढंग से किया गया था क्योंकि ब्राह्मणों के बाद दलितों के समर्थन से विहीन हो जाने पर ही कांग्रेस मुक्त भारत के अपनी पार्टी के मंसूबे को वे कामयाब कर सकते थे। पर जब उन्होंने देखा कि रूढ़वादियों के कारण खेल बिगड़ रहा है और दलित हिंदुत्व की छतरी से छिटक कर जाने लगा है जिसके नतीजे में कांग्रेस को गुजरात में नया जीवन मिलने के आसार उजागर हुए तो वह हस्तक्षेप के लिए तत्पर हो गये। इस बीच उत्तर प्रदेश में रूढ़िवाद का प्रकोप ज्यादा रहा जिससे न केवल दलित बल्कि पूरा बहुजन भाजपा के विरोध में लामबंद हो गया। सपा-बसपा की दोस्ती में कुछ लोगो को मायावती के नेतृत्व में केंद्र में गठबंधन सरकार के गठन के आसार दिखने लगे। मोदी को एहसास हो गया कि यह फैक्टर भी भाजपा के समर्थन के क्षरण में अपनी भूमिका अदा करेगा। इसलिए उन्होंने नई पहलकदमी की मुद्रा साध ली है।

भाजपा में जो मूल दलित सांसद और विधायक हैं उनमें ज्यादातर निष्तेज हैं क्योंकि दलितों को पैदाइशी हीन साबित करने के लिए भाजपा में जानबूझकर कूड़ा माल को ही तर्जी दी जाती है। इसी सिद्धांत के तहत भाजपा बाहर से जिन दबंग दलित नेताओं को अपने यहां लाई थी उन्हें कोई अवसर देती नही थी तांकि सामाजिक यथास्थिति के लिए किसी तरह का जोखिम पैदा न हो सके। पर लगता है कि नई पहलकदमी में मोदी इसमें बदलाव ला रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बृजलाल और निर्मल के समायोजन से इसकी झलक मिली है। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को बेहतर पुलिसिंग के लिए प्रकाश सिंह से तो सलाह लेने की फर्सत थी लेकिन उनसे बहुत ज्यादा प्रोफेशनल और कामयाब रहे बृजलाल उन्हें अपने पूर्वागृह के नाते कभी याद नही आये थे। उनकी बुद्धि का यह दोष शायद भाजपा हाईकमार द्वारा दूर किया जायेगा। उत्तर प्रदेश में उक्त नियुक्तियां भले ही प्रतीकात्मक हैं लेकिन इससे भाजपा के शासन-प्रशासन की दिशा बदलने के संकेत उभरे हैं जो सकारात्क लक्षण हैं।


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