भाजपा जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के बीच हुई खाई, संगठनात्मक क्षरण शुरु

By: jhansitimes.com
Oct 12 2018 10:13 am
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झांसी। भारतीय जनता पार्टी का संगठात्मक ढांचा दरकने लगा है। जो कार्यकर्ता पूरे समर्पण भाव से पार्टी में जीत दिलाने को लगे हुए थे, अब वह अपने आप को समेटकर घर में बैठ गये हैं। क्योंकि आला पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने उनकी बात सुनना बंद कर दिया है। झाँसी सहित जनपद जालौन में स्थिति और भी खराब है। बेस वोट में ही गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। प्रदेश स्तर पर जानकारी है। लेकिन वह इसको खत्म करने में पूरी तरह से नाकामयाब है। इतना ही नहीं झाँसी में सांसद उमा भारती  तो जालौन जिले में सांसद भानु प्रताप वर्मा और विधायकों के बीच भी समांजस नहीं है। आपसी खींचतान में पार्टी को नुकसान हो रहा है। 

हाल में ही एक घटना ने ब्राह्मण वर्ग को नाराज कर दिया है। जिसकी भरपाई करने में जालौन जिले के पदाधिकारी लगे हुए हैं। उरई नगर पालिका अध्यक्ष अनिल बहुगुणा भाजपा के बागी प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़े थे। जबकि भाजपा ने दिलीप दुबे को अधिकृत प्रत्याशी बनाया था। लेकिन अनिल बहुगुणा की जीत हो गई। बगावत करने पर उन्हें पार्टी से अघोषित रुप से निकाल दिया गया था। कुछ दिन पहले ही भाजपा ने अघोषित रुप से ही अनिल बहुगुणा को शामिल कर अभयदान दे दिया। इस घटना ने भाजपा खेमे में उथल-पुथल ला दी। ब्राह्मण वर्ग नाराज हो गया, जनप्रतिनिधियों ने भी नाराजगी जताई। बूथ लेवल तक इस घटना का भरपूर असर हुआ। ब्राह्मण वर्ग को लगा कि हमारा अधिकार छीनकर गहोई समाज को अभयदान दिया गया है। इससे पार्टी में अच्छी खासी फूट पड़ गई। दो गुट एक दूसरे को नीचा दिखाने में लग गये हैं। 

दूसरी अन्य घटनायें भी इस बात को साबित करती है कि गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। पूर्व के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जो कार्यकर्ता पूरे समर्पण के साथ भाजपा को जीत दिलाने में लगा था। वह अब घर बैठ गया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इन कार्यकर्ताओं को उपेक्षित किया है। उनकी उम्मीद के मुताबिक न तो उनकी सुनवाई हो रही है और न ही किसी काम में मदद मिल रही है। जो चिन्हित माफियां है उन्हीं को सरंक्षण दिया जा रहा है। भाजपा का मेरा बूथ सबसे मजबूत कार्यक्रम कागाजों तक ही सिमटकर रह गया है। कार्यकर्ता घर में बैठा है। पिछली घटनाओं से इतना दुःखी है कि पड़ोंसी का वोट भी डलवाने के में दिलचस्पी नही है। बूथ लेवल की बैठकें भी एक बंद कमरे में औपचारिकता में हो रही है। न तो जोश है और न ही आगे की रणनीति बनाई जा रही है। इधर जनप्रतिनिधियों के हाल खराब है। 

भोगनीपुर-जालौन-गरौठा सांसद भानु प्रताप वर्मा की ईमानदारी की छवि जरुर है, लेकिन उनसे कार्यकर्ता खुश नहीं है। सांसद को तलाश करना एवरेस्ट की चोटी चढ़ने के सामान है। अगर साक्षात दर्शन हो गये तो पीड़ित को न्याय दिलाने वह बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं कल्याणी योजनाओं का लाभ भी छात्रों को दिलाने में अक्षम हैं। इससे आम जनता तो दूर पार्टी  कार्यकर्ता ही दुःखी है। इसके अलावा विधायकों से भी वर्चस्व का शीत युद्ध जारी है। तीनों विधायक एक गुट बनाकर अपना वर्चस्व कायम रखने की जुगत में लगे हुए है। जबकि सांसद अलग-थलग हैं। उनकों जिले की गतिविधियों से कोई मतलब नहीं, बस औपचारिका स्वरुप सांसदीय हो रही है। 

जिले के कालपी-माधौगढ़ और उरई विधायक को इस बात का एहसास हो गया है कि उन्हें दुबारा मौका नहीं मिलेगा। इसलिए जितना हो सके आर्थिक रुप से जड़ों को मजबूत कर लो। इसीलिए वह अपने-अपने खास गुर्गों की टीम बनाकर आर्थिक लाभ के लिए लगे हुए हैं। क्षेत्र के विकास और पात्रों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहें। इसके अलावा जिलाध्यक्ष की भूमिका भी संतोषजनक नहीं है। इतना जरुर है कि निष्क्रिय व्यक्ति को ताज पहनाकर महाराथी अपना खेल कर रहे हैं। संगठात्मक रुप से भाजपा जिलाध्यक्ष उदयन पालीवाल की कार्य प्रणाली से भी कार्यकर्ताओं में रोष है। जिसके कारण जिले में भाजपा संगठात्क रुप से कमजोर हो गई है। आगामी चुनाव के लिए उसकी तैयारी शून्य है। जनप्रतिनिध, पदाधिकारी और कार्यक्ता अलग-अलग दिशाओं में भाग रहे हैं जबकि समर्थक और जनाता खुशफहमी का शिकार है। जिससे उभरने पर स्थिति भयाभय हो जायेगी। 


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