आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कहां तक दंगल हांक पायेगी योगी की सरकार, पढ़ लीजिये- KP सिंह के साथ

By: jhansitimes.com
Jun 10 2018 04:37 pm
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चार उपचुनावों की हार ने योगी सरकार के पूरे यश पर कालिख पोत दी है। अभी तक सत्ता संचालन की दैवीय शक्ति प्राप्त होने के गुमान में किसी भी जबाब देही से स्वयं को परे मान रहे योगी को अब महसूस करना पड़ा है कि अपनी रीति-नीति से लोगों को संतुष्ट करना उनकी जिम्मेदारी है वरना उनका राजनैतिक वजूद धूमकेतु की तरह मिटते देर नही लगेगी। वैसे तो योगी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा के पहले के किसी भी मुख्यमंत्री की तुलना में अधिक दृढ़ प्रतिज्ञ नजर आते हैं। लेकिन अगाध रामभक्ति के बावजूद उन्होंने शासन को लेकर राम के ही मंत्र की अनदेखी करने की कोताही कर डाली जो आश्चर्यजनक है। राम भगवान होते हुए भी अपने मन की न करके जन भावनाओं को अपनी कार्यनीति का आधार बनाते थे और इसलिए वे जन भावनाओं की टोह लेते रहने के लिए काफी पापड़ बेलते थे। वे रात में भेष बदलकर विचरते थे और लोगों की अपने बारे में कानाफंूसी सुनने की कोशिश करते थे। कपड़े धोने वाले प्रजा के एक सदस्य के मुंह से जब उन्होंने सीताजी को उनके रावण के कब्जे में रहने को लेकर जन चर्चाओं का नमूना सुना तो उन्हें लगा कि मर्यादाओं के पालक के रूप में उनके शासन की छवि को इस प्रसंग से कहीं न कहीं बटटा लग रहा है और इस वजह से अपने शासन को निष्कलंक रखने के लिए उन्होंने प्राणों से प्यारी मां सीता का भी उस समय त्याग कर दिया जब वे गर्भवती थीं। राम अगर सिर्फ व्यक्ति होते तो ऐसा निष्ठुर फैसला कदापि नही लेते। लेकिन राजा की बिडंबना है कि राज्य की प्रतिष्ठा और इकबाल के लिए व्यक्तिगत जीवन को बलिदान कर दे और राजा के इसी कर्तव्य के पालन के लिए राम को सीता त्याग के मामले में असीम दुख के वरण का फैसला लेना पड़ा।

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बहरहाल सांसद और विधायक सरकार के बारे में जो फीड बैक देते हैं उसे जनता का फीड बैक मानकर योगी सरकार ने कई बार फैसले किये। लेकिन मुख्यमंत्री योगी को यह समझना चाहिए कि तथाकथित माननीय के आग्रह निहित स्वार्थों से प्रेरित होते हैं। अगर अधिकारी सचमुच कानून के राज के लिए स्टील फ्रेम की भूमिका निभाने को अपने को तत्पर रखता है तो ज्यादातर जनप्रतिनिधि उसे अड़ियल और अहंकारी करार देकर हटवाने के लिए लग जाते हैं। उस अधिकारी को वे मिलनसार मानते हैं जो उनके चेले चपाटों के गलत धंधे चलवाने में हर तरह की सहूलियत देने के लिए प्रस्तुत रहता हो और उसे बनाये रखने की सिफारिश करने में नही हिचकते भले ही वह आम लोगो ंके लिए कितना ही नुकसानदेह क्यों न हो। इसलिए कल्याण सिंह सांसद विधायकों के कहने से न तो बहुत ज्यादा अधिकारी हटाते थे और न ही पोस्ट करते थे। हालांकि ऐसा भी नही होना चाहिए। बेहतर तो यह है कि मुख्यमंत्री कार्यभार संभालने के बाद हर जनप्रतिनिधि से डीएम और एसपी के पद के लायक पांच -पांच अधिकारियों के नाम सुझाने के लिए कहें। इनकी सूची बनाकर जिलों के कुंजी पदों पर उन्हें 80 प्रतिशत अधिकारी इसी सूची से नियुक्त करने चाहिए तो शायद बेहतर प्रशासन के स्वरूप का एहसास लोगों को कराया जा सकता है। चूंकि जनप्रतिनिधि धरातल से जुड़े होते हैं इसलिए उन्हें लोगों की अपेक्षा के अनुरूप काम करने वाले अधिकारियों के नाम आसानी से पता चल सकते हैं। ऐसी सूरत में वे इस मामले में निष्पक्षता भी बरतेगें जब उनको मालूम है कि जरूरी नही कि जिन अधिकारियों के नामों की संस्तुति वे कर रहे हैं उनकी नियुक्ति उन्हीं के जिले में हो। जिन अधिकारियों के नाम कई जन प्रतिनिधियों की सूची में कामन होगें वे निश्चित रूप से बेहतर होगें। इस तरह यह तरीका ज्यादा ठीक साबित होना चाहिए। यह दूसरी बात है कि अगर योगी इस तरीके को अपनाते तो बंसलों के जैसों को अपनी दुकान सजाने का मौका नही मिल पाता। भाजपा के एक जन प्रतिनिधि ने योगी के बारे में कविता लिखकर उन्हें असहाय साबित किया है जो गलत नही है। योगी के कम से कम अफसरों के सैटप के मामले में ज्यादातर फैसले पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के दलाल करते हैं और जो किस मापदंड को अपनाते हैं यह बताकर मुसीबत मोल लेने की कोई जरूरत नही हैं। क्योंकि प्रदेश में बच्चा-बच्चा अब इससे वाकिफ हो चुका है।

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योगी सरकार जब पदारूढ़ हुई तो अधिकारियों के तबादलों को लेकर कोई दिशा वह तय नही कर पाई थी। कार्यभार संभालने के बाद योगी ने लंबे समय तक पुरानी सरकार के अधिकारी यथावत बनाये रखे। वे शायद यह दिखाना चाहते थे कि शहसवार के बदलने से मंजर अपने-आप बदल जाता है और वे ही घोड़े ठीक से दौड़ने लगते हैं जो नाकारा करार दे दिये गये होते हैं। शुरू में अधिकारी उनकी परख और क्षमताओं को तौल नही पाये थे इसलिए सस्पेंस में होनें के कारण वे सहमे-सहमे काम करते थे। जिससे यह धारणा बन गई थी कि योगी सरकार का जलजला पहले की सरकारों से कुछ अलग ही होगा। लेकिन जल्द ही योगी की अनुभवहीनता की परतें उघड़ती चली गईं और इसे अच्छी तरह भांपते ही अधिकारी बेलगाम होने लगे। जब हाहाकार मचना शुरू हो गया तब योगी को नौकरशाही के ताश के पत्ते फेटने का निर्णय लेना पड़ा।

लेकिन नये अधिकारियों की तैनाती से भी प्रशासन की गुणवत्ता में सुधार के लक्ष्ण पैदा नही हो पाये। दरअसल नये अधिकारियों को यह मुगालता हो गया कि योगी के सोचने का जो ढंग है उसके तहत अब चाहे कुछ हो वे अधिकारियों को दो-तीन साल से पहले इधर-उधर नही करेगें। अधिकारियों में कुर्सी को लेकर यह निश्चिंत भाव उनके मगरूर रवैये के रूप में छलकने लगा। यहां तक कि वे जन प्रतिनिधियों को भी ठेंगे पर रखने से बाज न आने की कोशिश करते दिखाने लगे। नतीजतन जब जन प्रतिनिधियों का क्रदंन बढ़ा तो मुख्यमंत्री ने कई अधिकारी इधर से उधर किये और विधायकों को समुचित सम्मान देने के बार-बार दिशा निर्देश जारी किये। फिर भी प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त दिखाने का उनका मंसूबा साकार नही हो पाया। अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की लड़ाई जनमानस में स्वार्थी गिरोहों के मुर्गा युद्ध के तौर पर देखी गई। जिसके चलते अफसरों के तबादलों से आम जनता में उत्साह का संचार नही हो पाया जबकि अफसरों के बड़े पैमाने पर तबादले भी लोकतंत्र में जनमानस को आलोड़ित करने के कारक बनते हैं।

इस आपाधापी के बीच योगी सरकार की छवि अकर्मण्य सरकार के बतौर गहराती रही। जिससे लोग इतने निराश हो गये कि उप चुनावों में वे इस सरकार के तख्ता पलटने की घंटी बचाने में जुट पड़े। एक उप चुनाव का नतीजा प्रतिकूल होता तो मान लिया जाता कि कोई स्थानीय कारण होगें लेकिन हर उप चुनाव में पराजय तो यह जताने लगी कि जनता ने इस सरकार की सीआर ही खराब करने की ठान ली है। जहां तक भाजपा के खिलाफ महागठबंधन का प्रश्न है यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि राजनीति में चुनावी गठबंधन में हमेशा दो और दो के जोड़ का मतलब चार नही होता। उदाहरण के तौर पर विधानसभा के आमचुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जब गठबंधन किया तो जहां समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार था वहां कांग्रेस के बहुतायत समर्थकों ने सपा के उम्मीदवार की बजाय भाजपा के उम्मीदवार को वोट दे दिया और जहां कांग्रेस का उम्मीदवार था वहां समाजवादी पार्टी के लोगों ने भाजपा को वोट दे दिया। क्योंकि उस समय भाजपा की लहर चल रही थी। अब यह लहर नही हैं और भाजपा के संदर्भ में नकारात्क आधार पर वोटिंग हो रही है इसलिए उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा है।

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इसलिए सीएम योगी उप चुनावों के परिणाम से बेहद विचलित हो उठे हैं। तेज-तर्रार सरकार की छवि सामने लाने के लिए उन्होंने एक ओर जन चैपालें आयोजित करके लोगों से सीधे संवाद में फैसले सुनाने का तरीका अख्तियार किया, दूसरी ओर उन्होंने एक ही दिन में फतेहपुर और गोंडा दो जिलों के डीएम निलंबित कर दिये। वैसे तो इन जिलों में कई और अधिकारी भी उन्होंने निलंबित किये लेकिन मायावती का पैटर्न अख्तियार करते हुए उन्होंने उच्चाधिकारियों पर गाज गिराने की रणनीति अख्तियार की है और कहा भी है कि कनिष्ठ अधिकारियों तक ही कार्रवाई सीमित रखने से जबावदेह प्रशासन का उददेश्य पूरा होना संभव नही है। इसलिए सीधे सर्वोच्च स्तर पर कार्रवाई की जायेगी। मायावती भी मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, डीजीपी, डीएम और एसपी पर निलंबन का चाबुक चलाती थीं। क्योंकि वे कहती थी कि जब सारे अधिकार उच्चाधिकारियों के पास है तो बिगाड़ रोकने की जिम्मेदारी भी उनकी होनी चाहिए। अगर शासन उच्चाधिकारियों के कान खीचे रहेगा तो निचले स्तर पर प्रशासन की लगाम वे खुद ही संभाले रहेगें। हालांकि योगी की कार्रवाई से आईएएस एसोसिएशन बिफर पड़ी है और उसने दोनों जिलाधिकारियों के निलंबन के मामले में उचित प्रक्रिया का पालन न किये जाने का आरोप लगाते हुए मुख्य सचिव को ज्ञापन भी दिया है।

कांग्रेस को औपनिवेशिक सरकार से विरासत में सत्ता मिली थी। इसलिए उसके दृष्टिकोण कांग्रेस सरकार पर हावी रहते थे। जिसके तहत कांग्रेस की सरकारें दामादों की तरह आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के रौब-रुतबे का संरक्षण जनता के हितों की कीमतों पर करती थी। ये अधिकारी भी इसी के चलते अपने को कांग्रेसी मानते थे और जब पहली बार केंद्र में कांग्रेस की जगह जनता पार्टी की सरकार बनी तो घुसपैठिया सरकार मानकर अधिकारियों ने उसके साथ असहयोग किया। मुलायम सिंह जैसे नेताओं के सामने इसके कटु अनुभव थे इसलिए जनता दल का दौर आते-आते उत्तर प्रदेश में इन अधिकारियों को उनकी औकात अच्छी तरह समझाने का चलन राजनीति में चल पड़ा। लेकिन बाद में माल काटने के लिए मुलायम सिंह ने भी अफसरशाही से चटटे-बटटे का संग बना लिया। मायावती का मामला इस संदर्भ में अलग रहा। भले ही उनके द्वारा रुपये लेकर अधिकारियों की पोस्टिंग की जाने की किवदंतियां फैली रहीं हों लेकिन मायावती ने जबावदेही के प्रश्न पर अधिकारियों से कोई समझौता नही किया। कोई भी चूंक सामने आई तो उन्होंने उच्चाधिकारियों को नापने में कोई रियायत नही बरती। मायावती के कानून व्यवस्था के इस अंदाज के कायल भाजपा के लोग तक हैं। इसलिए होना तो यह चाहिए कि यक्ष किन्नरों यानी अधिकारियों की प्रजाति के प्याले के तूफान को योगी सरकार कतई गंभीरता से संज्ञान न ले और मुस्तैदी से लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के मोर्चे पर डटी रहे। तो डैमेज कंट्रोल का जो प्रयास वह कर रही है उसमें उसे कामयाबी मिलने के निश्चित आसार हैं। लेकिन लगता है कि योगी सरकार शायद ऐसा साहस दिखा नही पायेगी। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल की शिकायत करने की वजह से आरएसएस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के परिवार के युवक अभिषेक गुप्ता का जो हश्र हुआ उससे भी झलकता है कि उच्च नौकरशाहों के ग्लेमर के आगे योगी सरकार भी कांग्रेस सरकार की तरह ही हीन भावना से ग्रसित है।

हमने शुरूआत की थी यह बताते हुए कि माननीय जनभावनओं के संवाहक नही है क्योकि उनके मशविरे और आग्रह व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रेरित होते हैं। इसलिए योगी सरकार को ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिससे यह विश्वास पैदा हो कि सीधी जनभावनाओं की जानकारी के आधार पर कार्य करने की उसकी मंशा है। फतेहपुर और गोंडा के मामलों में बहुत कुछ इसी तरह हुआ। मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल को इसके लिए एक आधार बनाया जाना चाहिए जहां प्रदेश भर से आने वाली कम से कम एक दर्जन शिकायतों पर रोजाना उदाहरण के तौर पर कार्रवाई करने की नीति अपनाई जाये। अगर यह अभियान एक महीने भी चल जाये तो अधिकारियों के रवैये में पूरी तरह परिवर्तन लाया जा सकता है। उन्हें लगेगा कि पता नही उन्ही की चूक मुख्यमंत्री के हाथ में पड़ जाये और उसमें उनका कैरियर चैपट करने वाला एक्शन मुख्यमंत्री कर डालें। अभिसूचना, सतर्कता और भ्रष्टाचार निवारण जैसे पुलिस संगठन शासन के बहुत उपयोगी अवयव हैं। अभिसूचना के डीजी से मुख्यमंत्री को रोजाना अलग से एक घंटे मिलना चाहिए। जिसमें उनसे जानकारी की जाये कौन से अधिकारी और नेता गलत काम कर रहे हैं। अतीत में कुशल मुख्यमंत्री इस तरीके को अपनाते रहे हैं। स्वच्छ सरकार और प्रशासन का विश्वास दिलाये बिना योगी सरकार उप चुनावों में हुई हार से उनकी जो साख गिरी है उसकी रिकवरी नही कर सकती।


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