न्यायपालिका में छिड़ा महाभारत.... बता रहे, प्रधान संपादक के.पी.सिंह

By: jhansitimes.com
Jan 15 2018 06:50 pm
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उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ उनके चार वरिष्ठ सहयोगियों की प्रेस कांफ्रेंस के मामले को लेकर छिड़ी बहस ने विचित्र मोड़ ले लिया है। यह संयोग रहा कि पिछले कुछ समय से मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के रहते उच्चतम न्यायालय ने लगातार ऐसे फैसले दिये थे जिनसे सरकार को राहत मिली थी। नतीजतन लोगों निजी बातचीत में इंदिरा गांधी के समय दिये गये प्रतिबद्ध न्यायपालिका के नारे की अनुगूंज महसूस की जाने लगी थी। लेकिन यह सिर्फ अटकलबाजी थी। पर चार जजों की पत्रकार वार्ता को लेकर भक्त पलटन की प्रतिक्रिया ने इसे कही न कही विश्वास का रूप देने काम किया है। जजों की लड़ाई में सरकार कहां से आ गई। भक्त पलटन के पास इसका कोई उत्तर नही है। एक बार फिर राष्ट्रवादी उन्माद पूरे देश में छा गया है जिससे जीएसटी, नोटबंदी, गिरती विकास दर और रोजगार सृजित न होने जैसे सरकार को परेशान करने वाले विषय नैपथ्य में चले गये हैं।

क्या न्यायपालिका को सरकार के विरोध में होना चाहिए। इसका उत्तर नही ही होगा क्योंकि व्यवस्था का एक पहिया सरकार है तो न्यायपालिका भी एक पहिया ही है। अल्पमत सरकारों के युग में शक्तियों के विकेंद्रीयकरण के संवैधानिक सिद्धांत को बाईपास किये जाने का आभास मिला। न्यायपालिका जिस तरह से कार्यपालिका को नियंत्रित और निर्देशित करने की उत्कट प्रवृति अपना रही थी उससे बदलते समय के साथ तालमेल के लिए व्यवस्था और अवधारणाओं में बदलाव की राजनैतिक तंत्र की भूमिका पंगु हो रही थी। संविधान दिवस पर मुख्य न्यायाधीश के सामने ही विधि मंत्री ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि बाद में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन की बारी आई तो उन्होंने कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों को व्यवस्था का अंग बताकर सामंजस्य बनाने की कोशिश की।

समस्या यही रही कि हाल के दौर में न्यायपालिका व्यवस्था के एक अंग की बजाय स्वंतत्र परमसत्ता के रूप में आचरण करने पर आमादा हो गई। जिसे लेकर राजनीतिक तंत्र में विवाद और क्षोभ स्वाभाविक रहा। जब जस्टिस ठाकुर प्रधान न्यायाधीश थे उन्होनें तो इस मामले में बहुत ही उग्र तेवर अख्तियार कर रखे थे। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के सरकार के प्रस्ताव पर न्यायपालिका का अड़ियल रुख इसी की परिणति थी। मजेदार बात यह है कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ झंडा उठाने वाले जजों में जस्टिस जे चैलमेश्वर भी शामिल हैं जिन्होंने एनजेएसी के मामले में सरकार के रुख का साथ दिया था। जबकि आज यह साबित करने की कोशिश की जा रही है जैसे वे वर्तमान सरकार को अस्थिर करने की साजिश करने वाले किसी गिरोह का शुरू से हिस्सा हों। यह देश में पिछले कुछ समय से सिर उठाती जा रही असहिष्णुता की खतरनाक प्रवृति की एक मिसाल है।

मुख्य न्यायाधीश के प्रति क्यों इतनी हमदर्दी

जस्टिस दीपक मिश्रा पर भक्त पलटन की इतनी आस्था क्यों हो गई कि उसने उच्चतम न्यायालय के आतंरिक विवाद को राजनीतिक रंग देने की हिमाकत करते हुए विद्रोही जजों को देश द्रोही और हरामजाद जैसी गालियों से नवाजने तक में संकोच नही किया। जिन मुददों पर राजनैतिक नेतृत्व जनादेश लेकर पदारूढ़ होता है उन पर कार्य करने की स्वतंत्रता उसे होनी चाहिए। इसमें न्यायपालिका की तकनीकी आधार पर अड़ंगेबाजी अवांछनीय है। क्योकि इससे उत्पन्न गतिरोध लोकतंत्र के उददेश्य को ही विफल कर देगा। लेकिन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय के अनुकूलन का रुख इसका दूसरा पहलू है। जिसमें सरकार की सुविधा का नाजायज ख्याल जाहिर सा हुआ। एक मामला था सीबीआई के निदेशक पद पर विवादित पृष्ठभूमि के अधिकारी की नियुक्ति का। उन पर जो आरोप थे उनके मददेनजर उनकी नियुक्ति रोकने की गुजारिश उच्चतम न्यायालय से की गई लेकन खारिज हो गई। तीन तलाक के मामले में सरकार द्वारा लाये जा रहे कानून के न्यायिक प्रक्रिया के पचड़े में फंसने के अंदेशे के बीच दहेज उत्पीड़न के आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक की। दो सदस्यीय पीठ की काफी सूय पहले दी गई व्यवस्था को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह सिद्धांत स्थापित करने के लिए पलट दिया कि विधायिका द्वारा बनाये गये कानूून को संसोधित करने का अधिकार न्यायपालिका को नही होना चाहिए। इसी तरह गुजरात विधानसभा चुनाव की मतगणना वीपी पैड की पर्चियों के मिलान के बाद शुरू कराने के आग्रह को भी खारिज करने में उच्चतम न्यायालय ने फुर्ती बर्ती। इन फैसलों में हो सकता है कि जजों का अपना निष्पाप न्यायिक दृष्टिकोण हो। लेकिन भक्त पलटन में इसी वजह से मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के लिए आस्था की हद तक हमदर्दी उपजा दी है। 

गलत ट्रैक पर मुड़ी बहस

बहस के गलत ट्रैक पर मुड़ जाने से न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को लेकर काफी पहले से उठ रहे सवालों के समाधान की गुंजाइश पर विराम लग गया है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने कहा था कि उच्च न्यायपालिका में संदिग्ध निष्ठा वालें लोग पहुंच गये हैं। उन्होंने इसकी कुछ मिसाले भी दी थी। उच्चतम न्यायालय के एक पूर्व जज रूमा पाल कह चुकी हैं कि अपनी अनुशासनहीनता और नियम कायदों के उल्लघन को ढकने के लिए उच्च न्यायपालिका द्वारा सर्वोच्चता और स्वातंत्रता का दावा किया जाता है। खैर भक्त पलटन प्रशात भूषण को देश द्रोही जमात का हिस्सा ठहरा रही है लेकिन उन्होंने 2009 तक नियुक्त 10 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट होने के अपने दावे की पुष्टि में उच्चतम न्यायालय में हलफनामा तक दिया था जिसे नजरंदाज नही किया जा सकता। समस्या यह है कि आज सोच के क्षितिज का बहुत विस्तार हुआ है जिसमें समग्र मानवता के आधार पर चीजों को परखने के लिए राष्ट्र नश्ल आदि की परिधियों को ध्यान में रखना संभव नही होता। पूरे विश्व में एक नई किस्म की परिपक्वता आई है तभी तो आजादी की लड़ाई के समय ब्रिटेन के कई बुद्धिजीवी सामाजिक और राजनैतिक नेता भारत के स्वाधीनता सेनानियों का समर्थन कर रहे थे। लेकिन वहां किसी ने उनको देश द्रोही नही ठहराया। खुद भक्त पलटन की पार्टी ने आतंकवादियों और अलगाववादियों की पैरवी के लिए अपना वकालत नामा लगाने में अग्रणी रहने वाले रामजेठ मलानी को पोषित किया। आज भी अकाली दल स उसका गठबंधन है। जिसमें एक बड़ा वर्ग अभी भी अलगाववादियों से सहानुभूति रखता है। कश्मीर में तो वह उस पार्टी के सहयोग से सरकार चला रही है जिसके विधायक मारे गये आतंकवादियों को बाकायदा सदन के अंदर शहीद का दर्जा देने में गुरेज नही करते। यह देश विरोधाभासों का समुच्य है। यहां राष्ट्रवाद के नाम पर छुई-मुई संवेदनशीलता व्यवहारिक नही हो सकती। इसलिए वे द्रोही जजों और प्रशांत भषण के लीक से हटकर कायों के उदाहरण ढ़ूढ़कर उन देश द्रोह का ठप्पा लगा देना कटटरता की इंतहा है। असली मुददा यह है कि हाल के वर्षों में मीडिया ने राजनैतिक तंत्र को साफ्ट टारगेट समझकर अपने पराक्रम प्रदर्शन के लिए उसकी धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नही छोड़ी। जबकि अवमानना के अधिकार से रक्षित न्यायपालिका की मीमांसा कोई नही कर सका। इसलिए न्यायपालिका के खाते में मसीहाई आती चली गई। लेकिन हर तंत्र में समय लंबा खिच जाने पर जंग लगती है। जिसके शोधन होता रहना चाहिए। न्यायपालिका इसका अपवाद नही है। इसलिए विद्रोही जजों की असाधारण पहल कदमी को न्यायपालिका में व्यक्तित्वों के टकराव को परे करके न्यायिक तंत्र में आई कमियों में सुधार का अवसर माना जाना चाहिए। तांकि यह परिघटना किसी सार्थक परिणति पर पहुंच सके।


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