उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में उलटफेर की ये रहीं मुख्य वजहें, ... बता रहे, प्रधान सम्पादक केपी सिंह

By: jhansitimes.com
Mar 14 2018 10:39 pm
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में उप चुनाव के नतीजे स्तब्ध करने वाले हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा खाली की गई गोरखपुर लोकसभा सीट और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या द्वारा छोड़ी गई इलाहाबाद जिले की फूलपुर लोकसभा सीट, दोनों जगह भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। गोरखपुर में 1989 से लगातार योगी आदित्यनाथ जीत रहे थे। इसलिए यहां भाजपा की उनके मुख्यमंत्री रहते हार भौचक कर देने वाली है। किसी ने वर्तमान माहौल में दोनों सीटों पर विपक्ष की कामयाबी की आशा नही की थी।

भाजपा के नेता तात्कालिक प्रतिक्रिया में सपा और बसपा के बीच हुए गठबंधन को इसकी वजह ठहरा रहे हैं जबकि इस गठबंधन के बावजूद चुनाव अभियान के दौरान योगी आदित्यनाथ बेहद आत्मविश्वास में दिखे थे। उन्होंने गठबंधन का मजाक उड़ाते हुए इसे सांप-छछूंदर का गठबंधन बताया था। कहां योगी आदित्यनाथ को सारे देश में मोदी के बाद भाजपा के सबसे बड़े तारणहार के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा था और कहां उनकी अपनी मांद में ही किरकिरी हो गई। उप चुनाव के परिणाम इतने अप्रत्याशित रहे हैं कि शायद समाजवादी पार्टी के नेता तक अपनी सफलता की बहुत ज्यादा आशा नही कर रहे थे।

भाजपा इसे अपने खिलाफ प्रतिद्वंदी दलों के एक होने को वजह बताकर अपनी हार के कारण का सरलीकरण कर रही है। गठबंधन तो सपा और कांग्रेस ने भी विधान सभा चुनाव में किया था लेकिन क्या हुआ। दोनों पार्टियों के मतदाता इसके कारण अपनी निष्ठा भूलकर भाजपा में शिफ्ट हो गई थी। इस आधार पर माना जा रहा था कि 1993 के बाद सपा और बसपा के बीच इतनी ज्यादा तल्खी रही कि उसे भुलाया नही जा सकता। इसलिए यह गठबंधन भी कामयाब नही होगा। लेकिन कांग्रेस और सपा के गठबंधन में कोई तार्किक और वैचारिक समीपता नही थी। जबकि सपा और बसपा का वोट बैंक समानधर्मा था। हिन्दुत्व के जिस कालीन के नीचे वर्ण व्यवस्था की गंदगी को दबाने में भाजपा कामयाब रही थी। उस कालीन में गठबंधन ने छेद कर दिया। सपा और बसपा गठबंधन के बाद वर्ण व्यवस्था के खिलाफ ओबीसी और दलित समाज के घाव फिर हरे हो गये। यह भाजपा के लिए बहुत ही विपत्ति कारक सूचना माना जाना चाहिए। इसके नतीजे निश्चित रूप से दूरगामी होगें। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसके बाद भाजपा के लिए राह आसान नजर नही आ रही है।

वैसे भी मोदी सरकार के सुशासन के खोखलेपन से उत्तर भारत के राज्यों में मोहभंग के लक्षण नजर आने लगे थे। जिसकी झलक मध्यप्रदेश और राजस्थान के उपचुनावों में भाजपा की हार से देखने को मिल गया था। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में मिली कामयाबी को बहुत बढ़ाचढ़ा कर दिखाया गया तांकि उप चुनावों के परिणाम के प्रभावों को बेअसर किया जा सके। पर यह उददेश्य सफल नही हुआ। गोरखपुर और फूलपुर दोनों संसदीय क्षेत्रों में मतदान के प्रतिशत में भारी गिरावट से जाहिर हो गया था कि लोगों में भाजपा के प्रति जो विश्वास था उसमंे उनके लचर शासन से धक्का पहुंचा है। इसलिए मतदाताओं में भारी उदासीनता घर कर गई है। भाजपा को तभी सतर्क हो जाना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार के अररिया लोकसभा उप चुनाव का नतीजा भी खुला है। जिसमें तमाम बदनामी के बावजूद लालू यादव ने फिर अपने को महाबली साबित किया है। इसके निहितार्थ समझे जाने चाहिए। लालू अपनी राजनीति में अपने वोट बैंक के लिए कन्फ्यूजन की गुंजाइश नही रहने देते। वर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए उनकी स्पष्ट दिशा से उनका मतदाता भी दुविधा रहित रहता है। मोदी लहर के समय बिहार के विधान सभा चुनाव में उनके इस रुख की वजह से ही भाजपा को धूल चाटनी पड़ी थी। नीतिश के साथ गठबंधन की सफलता में नीतिश का या प्रशांत किशोर का कोई बहुत बड़ा योगदान नही था। भले ही अपने पूर्वागृहों और कुटिल इरादों की वजह से इनको श्रेय देने वाला प्रस्तुतीकरण उस समय राजनैतिक विशेषज्ञों ने किया हो। इसलिए बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों जगह राजनीति एक दिशा की ओर बढ़ती देखी जा सकती है। भाजपा ने चूंक पर चूंक की है।

उत्तर प्रदेश में कामयाबी बहुजन समाज के समर्थक से हासिल की। लेकिन चुनाव के बाद मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही पदों पर वर्ण व्यवस्था के पैमाने लागू कर दिये। अधिकारियों की नियुक्ति में योग्यता की फर्जी दुहाई देकर प्रशासन के सर्व समावेशी स्वरूप को तांक पर रख दिया। अधिकांश जिलों में डीएम और एसपी के पद अघोषित रूप से सवर्णों के लिए आरक्षित कर दिऐ गये। जिसमें यह संदेश निहित था कि ओबीसी और एससी के अधिकारी न योग्य होते है और न सक्षम। हेमवती नंदन बहुगुणा भी सवर्ण थे लेकिन प्रशासन में सर्व समावेशी प्रतिनिधित्व का महत्व उसकी कामयाबी के लिए समझते हुए उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में तय किया कि हर जिले में डीएम, एसपी में से एक पद पर अनुसूचित जाति का अधिकारी होगा। चूंकि उस समय ओबीसी के अधिकारी थे नही। यह नीति उनके बाद भी चलती रही। लेकिन योगी ने यह नीति पूरी तरह समाप्त कर दी और प्रशासन का स्वरूप ऐसा बना दिया जिसमें वे अधिकारी महत्वपूर्ण स्थानों पर पहुंच गये जो प्रोफेशनल नही जातिगत दृष्टिकोण से काम करते हैं। इससे ओबीसी और एससी के उनके कार्यकर्ता तक अपनी ही सरकार में अपने को बेगाना समझने को मजबूर हो रहे थे। इन नीतियों का बहुत ही कसैला स्वाद उनको मिला है। क्या पार्टी के राजनैतिक सर्वाइवल के लिए बहुजन समाज के समर्थन की अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए योगी और भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनी रीति-नीति बदलेगें।


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