लुप्त हुआ नौरता पर्व, अब बुंदेलखंड की गलियों में नहीं गूंजते बालिकाओं के तोतले स्वर

By: jhansitimes.com
Sep 29 2017 06:57 pm
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(रिपोर्ट-नितिन गिरि/कृष्णा) ललितपुर। बुन्देलखण्ड का प्रमुख पर्व श्नौरता्य खत्म होने की कगार पर है। अब कहीं भी बालिकायें प्रातरू से नौरता गीतों को नहीं गातीं और न ही भूत से सुरक्षा के लिए निवेदन करती हैं। चंद गांव में कहीं-कहीं बालिकायें नौरता का व्रत करते देखी जा रही हैं, लेकिन इस महत्वपूर्ण प्रथा को बचाने के लिए यह आयोजन अपर्याप्त हैं। इसके अलावा भी अनेक प्रथायें समाप्त हो चुकी हैं।

 बुन्देलखण्ड की संस्कृति इतनी कमजोर है जितना कि यह देश। चूंकि यह क्षेत्र भारतवर्ष के बीच में पड़ता है। इस वजह से यह क्षेत्र पुरानी संस्कृत विरासतों का धरोहर बना हुआ है। इस क्षेत्र में अब भी कई प्रथायें प्रचलित हैं जो न केवल स्वस्थ मनोरंजन करती हैं वरन लोगों को बीमारी मुक्त बनाने में भी सहायक हैं। कुछ दशक पूर्व तक नवरात्र के साथ ही नौरता पर्व शुरू हो जाता था। बालिकायें इस व्रत को सुबह से ही करना शुरू कर देती थीं। गलियों, मोहल्लों में बालिकायें तोतले मुंह से श्बाबुल जू की कुंअर लड़ायेतू नारे सूवटा्य गीत गाना शुरू कर देती थीं।


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